लेखक परिचय
डॉ० ओम प्रकाश लाल श्रीवास्तव जन्म- ग्राम एवं पोस्ट-खगवल, जिला-वाराणसी (चन्दौली), उत्तर प्रदेश, भारत। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से 1973 ई. में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व में एम. ए.। 1980 ई. में काशी हिन्दू विश्वविधालय से 'उत्तर भारत में अंकों का विकास' विषय पर पी-एच. डी.। भारत कला भवन वाराणसी में 'संग्रहालय विज्ञान' तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में 'जर्मन भाषा' का अध्ययन। 1993 ई. में गोरखपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम. ए.। 1977 ई. में उत्तर प्रदेश शासन के अन्तर्गत 'संस्कृति विभाग' में 'रजिस्ट्रीकरण अधिकारी, पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति' पद पर नियुक्त। निदेशक, राजकीय संग्रहालय झाँसी तथा राजकीय बौद्ध संग्रहालय गोरखपुर (अतिरिक्त प्रभार)। प्राचीन इतिहास विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी द्वारा 1980 में पी-एच.डी. पर 'पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा स्वर्ण पदक' घोषित। उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी ने 1986 ई. में इसके प्रकाशन पर 'विशेष पुरस्कार' प्रदान किया। चन्ददास साहित्य शोध संस्थान बाँदा द्वारा भारतीय इतिहास में नवीन शोध के लिए वर्ष 1989 का 'सर्वोच्च ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक सम्मान' प्रदत्त। अवध मुद्रा परिषद एवं राष्ट्रीय मुद्रा परिषद द्वारा मुद्राशास्त्रीय योगदान के लिए वर्ष 2019 में 'विशेष सम्मान'। अवध मुद्रा परिषद द्वारा 2021 ई. में 'लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड' प्रदत्त। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सी.एम.पी. पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, प्रयागराज द्वारा 2024 से 'पुरातत्त्वविद् डॉ. ओम प्रकाश लाल श्रीवास्तव स्वर्णपदक' प्रदान किया जाता है। एच होली महोत्सव 2026 में 'एरच रत्न सम्मान' प्राप्त।
पुस्तक परिचय
इस पुस्तक में अनेक अज्ञात शासकों एवं राजवंशों के प्राप्ति स्थल 'एरच' के पुरावशेषों का अध्ययन एवं विश्लेषण किया गया है, जिसमें एरच के नगर सिक्कों, एरच पर शासन करने वाले शासकों एवं उनके द्वारा सम्पादित वैदिक यज्ञों-पुण्डरीक, अश्वमेध एवं सर्वमेध के अतिरिक्त ईसा की प्रारम्भिक शताब्दी में 'जल संरक्षण' आदि की चर्चा की गयी है। इस क्रम में एरच से प्राप्त अभिलेखों, सिक्कों एवं मुद्रा आदि के आधार पर संस्कृत के महाकवि कालिदास का समय ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी तथा सेनापति पुष्यमित्र का वंश 'शुंग' के स्थान पर 'बैम्बिक' प्रमाणित होता है। परिव्राजक सम्राट् महाराज हस्तिन गुप्त शासकों का 'सामन्त' न होकर एक स्वतन्त्र शासक भी प्रमाणित, जिसका राज्य मात्र मध्यप्रदेश के बघेलखण्ड तक ही सीमित न होकर उत्तर प्रदेश के एरच (बुन्देलखण्ड) तक विस्तृत था। इस प्रकार एरच का इतिहास मात्र एरच, झाँसी, उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे भारत वर्ष के प्राचीन इतिहास की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।
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