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समालोचक (हिन्दी की पहली आलोचना पत्रिका): Samalochak (The First Hindi Literary Criticism Journal)

$32
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: ADWAIT PRAKASHAN, DELHI
Edited By Gopalram Gahmari
Language: Hindi
Pages: 216
Cover: Hardcover
9.0x6.0 Inch
Weight 360 gm
Edition: 2026
ISBN: 9789347029189
BA3447
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Book Description
भूमिका

अपने साहित्यिक पारिवारिक वातावरण के कारण बचपन में ही पहले मेरा साहित्यिक संस्कार हुआ। यज्ञोपवीत संस्कार तो बाद में हुआ। मेरे दोनों अग्रज ब्रजकिशोर सिन्हा (भागलपुर विश्वविद्यालय) एवं नंदकिशोर नवल (नामदशत्तेर आलोचना के अग्रणी जालोचक) हिंदी साहित्य में आकंठ डूबे हुए थे। घर पर पत्र-पत्रिकाएँ एवं साहित्यकारों के पत्र तथा नई-नई पुस्तकें वी. पी. पी. से प्रायः आया करती थीं। शायद आप विश्वास न करें, जब में मिडिल स्कूल का विद्यार्थी (1953-1956) था, मैं 'कल्पना' (हैदराबाद), 'आलोचना' (दिल्ली) ही नहीं, अन्य पत्रिकाएँ 'अजन्ता', 'नया समाज', 'पाटिल', 'अवंतिका', 'नई धारा' उलटता-पलटता रहता था। समझता खाक था, लेकिन कुछ लेखकों के नाम अब भी मेरी स्मृति के किसी कोने में दर्ज हैं। कहने की जरूरत नहीं, भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के दो पक्ष थे- राजनीतिक एवं सांस्कृतिक नवजागरण । इसी कारण 1933 ई. में मेरे गाँव में सुंदर मिडिल इंगलिश स्कूल और 1936 ई. में नवयुवक पुस्तकालय की स्थापना हुई। उम्र बढ़ने के साथ मेरी साहित्यिक समझ के साथ रुचि भी विकसित हुई। दिलचस्प बात यह है कि डॉ. रामविलास शर्मा के प्रधान संपादकत्व में, आगरा से प्रकाशित 'समालोचक' ('हिंदी का प्रतिनिधि आलोचनात्मक मासिक पत्र') की जानकारी मुझे पहले हुई और गोपालराम गहमरी एवं पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा संपादित आलोचना की पहली पत्रिका 'समालोचक' की बाद में। मैं पूरे विश्वास के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन डॉक्टर शर्मा द्वारा संपादित 'समालोचक' का 'यथार्थवाद विशेषांक, फरवरी 1959 मेरे पास उपलब्ध है और 'समालोचक' के सारे अंक तीन-चार खंड में जो प्रकाशित हैं, देखने से लगता है, उनके पूर्व प्रकाशित 'समालोचक' पत्रिका की उन्हें जानकारी नहीं थी, अन्यथा वे अवश्य इसका उल्लेख करते। 'समालोचक' के बारे में आधी-अधूरी सूचनाएँ कई स्रोतों से मुझे मिलीं, लेकिन प्रामाणिक जानकारी पहली बार 'साहित्य अकादेमी द्वारा 'प्रकाशित भारतीय साहित्य के निर्माता' सीरीज के अन्तर्गत 'अयोध्याप्रसाद खत्री', लेखक रामनिरंजन परिमलेन्दु मोनोग्राफ) से 2004 में मिली। इसके बाद भारतीय पत्रकारिता कोश खंड-दो (1901-1947) लेखक विजयदत्त श्रीधर, प्रकाशक वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2008 के दोनों खंड से जो मुझे 2010 में प्रकाशक के सौजन्य से मुझे मिले थे। 'समाचार पत्रों का इतिहास' पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी पहला संस्करण 1953 मैंने प्रेमचन्द जन्म शताब्दी के क्रम में, उनके गाँव लमही की यात्रा के दौरान, 1980 में बनारस में खरीदी थी, लेकिन इस पुस्तक में 'समालोचक' का उल्लेख नहीं है। 'समालोचक' को देखने की मेरे मन में गहरी ललक, उत्सुकता और बेचैनी थी। 'निराला रचनावली' के लिए सामग्री जुटाने के क्रम में, कलकत्ता की अपनी दो बार की यात्रा में मैं नेशनल लायब्रेरी में 'उदंत मार्तण्ड' (1826 ई.) देख चुका था, लेकिन तब मुझे 'समालोचक' की जानकारी नहीं थी। भला हो लेखक-पत्रकार संजय कृष्ण का, जिन्होंने मेरी उत्सुकता और बेचैनी को दूर किया। मासिक 'आजकल' (नई दिल्ली) के अप्रैल 2020 अंक में संजय कृष्ण का 'समालोचक' और उसके संपादक गोपालराम गहमरी पर जानकारी से भरपूर विस्तृत लेख छपा। इस लेख को पढ़ने से मुझे यह विश्वास हो गया कि उनके पास 'समालोचक' के अंक जरूर उपलब्ध होंगे। और सचमुच उन्होंने मेरे विश्वास की रक्षा की, जिसकी परिणति है यह पुस्तक। यह तो मुझे बाद में, उनके प्रकाशक 'विकल्प प्रकाशन' द्वारा भेजी गई पुस्तक 'हिंदी के पहले जासूसी कथाकार गोपालराय गहमरी के संस्मरण'- संपादक संजय कृष्ण, प्रथम संस्करण-2015 से मालूम हुआ कि संजय उसी उत्तर प्रदेश, गाजीपुर जनपद के हैं, जहाँ के गहमरी जी थे। पुस्तक की प्रस्तावना में संजय जी ने विस्तार से 'समालोचक' के वर्षभर के अंकों को गंभीरतापूर्वक पढ़ने के बाद पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं, नियम, साहित्य आलोचना, गद्य की भाषा पर टिप्पणी की है। यही नहीं, उपलब्ध अनेक पत्र-पत्रिका कोश एवं पुस्तकों का भी उल्लेख किया है। यह मात्र संयोग है कि उनके द्वारा उल्लिखित अधिकांश पत्रकारिता कोश मेरे पास उपलब्ध हैं। 'आलोचना' का प्रवेशांक भी। 'कल्पना' की अनुक्रमणिका मैं तैयार कर रहा हूँ। भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावाद युग और स्वातंत्र्यातेतर अधिकांश महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्रकारिता से गुजरने के बाद मुझे इस बात का शिद्दत से अहसास हुआ कि भारतेन्दु युग से खड़ी बोली के विकास में तथा विचारों को अभिव्यक्त करने में क्या आरंभिक कठिनाइयाँ थीं। 'उदंत मार्तण्ड' से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक तक लगातार अनेक शब्दों के रूप बदलते गए हैं। 'समालोचक' के पहले वर्ष (अगस्त 1902-जुलाई 1903) में प्रयुक्त कुछ शब्द-जैपुर (जयपुर), सभ्य (सदस्य), मनोर्थ (मनोरथ), तय्यार, (तैयार), उठावेंगे (उठाएँगे)- देखें। आज हिंदी-अंग्रेजी के प्रमुख समाचार-पत्रों के मुखपृष्ठ पर धड़ल्ले के साथ झूठे-सच्चे विज्ञापन छप रहे हैं,

संपादक परिचय

गोपाल राम गहमरी जन्म : पौष कृष्ण, आठ, गुरुवार, संवत् 1923, सन् 1866, बारा, जिला गाजीपुर, उत्तर प्रदेश पिता : रामनारायण शिक्षा : नार्मल परीक्षा, प्रथम श्रेण संपादन भारत भूषण बंबई साप्ताहिक, 1893, सहकारी संपादक साहित्य सरोज मेरठ, पाक्षिक, एक दिसंबर 1895, गुप्तकथा प्रथम हिंदी जासूसी मासिक पत्र, मेरठ, बिहार बंधु पटना, 1907 से 1909 तक स्थानापन्न संपादक भारत मित्र, कलकत्ता, साप्ताहिक में 1899 में कुछ माह तक। सहकारी संपादक: वेंकटेश्वर समाचार पत्र बंबई 1897 से 1899 दैनिक हिन्दोस्थान कालाकांकर, 1889 से 1890, व्यापार सिंधु मासिक बंबई। 1892 में पुनः बंबई गए और इस पत्र का केवल एक मास तक संपादन किया। जासूस मासिक पत्र, 1900 से 1939 तक, गहमर अपने गांव से प्रकाशित किया। हिंदी में जासूसी उपन्यासों के जनक । रचनाएं : दो सौ से ऊपर मौलिक जासूसी, सामाजिक उपन्यासों का सृजन। करीब इतने ही बांग्ला से अनुवाद। बांग्ला से पहली बार कहानी हीरे का मोल का अनुवाद। रवींद्रनाथ टैगोर की कृति चित्रांगदा का भी हिंदी में सबसे पहले अनुवाद। नाटक देश दशा, जन्मभूमि, वभ्रू वाहन और वनवीर। काव्य सोना शतक व वसंत विलास। व्यंग्य विनोद : प्लेग का वक्तव्य और रंग की बातें। भाषा ज्ञान हिंदी, उर्दू, फारसी, संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी। निधन: 20 जून, 1946, बनारस ।

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