पुस्तक परिचय
सुशीला टाकभौरे दलित साहित्य में संस्थापित एक ऐसा स्वनाम धन्य हस्ताक्षर हैं; जिसने दलित विमर्श को नई धार प्रदान करके नारी मुक्ति का द्वार खोल दिया है। लेखिका द्वारा विभिन्न विधाओं में लिखा गया मूल्यवान साहित्य दलित विमर्श के गंभीर अध्येताओं के लिए प्रेरक पाठशाला सदृश है। परिवार, समाज और व्यवस्था के निर्मम शिकंजे में कराहते दलित समाज के दर्द का बूंद-बूंद करके रिसने का अहसास करना हो तो सुशीला-साहित्य की सम-वेदना का संस्पर्श अनिवार्य है। साक्षात्कार विधा आधुनिक गद्य साहित्य की लोकप्रिय विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। साहित्य और साहित्येतर विषयों पर विचार-मंथन के लिए साक्षात्कार एक सशक्त विधा है। इस सशक्त माध्यम का सुशीला जी ने प्रस्तुत ग्रंथ में सर्वश्रेष्ठ सदुपयोग किया है। साक्षात्कार में सफलता का मूलमंत्र दोनों पक्षों के दायित्वबोध पर निर्भर करता है। यदि प्रश्नकर्त्ता जिज्ञासु है और साक्षात्कार देने वाला अभिव्यक्ति की पारदर्शी ईमानदारी रखता है, तो साक्षात्कार की सुखद परिणति सहज संभाव्य है। इस सुखद परिणति की सुगंध पाठकों को पुस्तक में संगृहीत साक्षात्कारों में निश्चित रूप से मिलेगी। संवाद के इसी द्वैत-भाव के कारण सुशीला जी का यह प्रयास स्तुत्य है। अर्थात् संवाद जारी है...। सुशीला टाकभौरे के विविधआयामी साहित्य का केन्द्र दलित विमर्श और नारी विमर्श रहा है। कभी-कभी साहित्यकार के समूचे साहित्य में कुछ प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं,लेकिन साक्षात्कार के माध्यम से चिरप्रतीक्षित उत्तर सहजता से सुलभ हो जाते हैं। इसी बिन्दु विशेष पर आकर साक्षात्कार की उपादेयता स्वयंसिद्ध हो जाती है। पुस्तक में विदुषी लेखिका द्वारा दिये गये साक्षात्कार दलित और नारी विमर्श का नूतन वातायन खोल कर अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के चक्रव्यूह को ध्वस्त करेंगे - ऐसी मेरी अटूट आस्था है।
लेखक परिचय
जन्म : 4 मार्च, सन् 1954, बानापुरा (सिवनी मालवा) जि. होशंगाबाद (म.प्र.)। शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी साहित्य), एम.ए. (अम्बेडकर विचारधारा), पी-एच.डी. (हिन्दी साहित्य)। सुशीला टाकभौरे • यह तुम भी जानो (काव्य संग्रह) 1994 तुमने उसे कब पहचाना (काव्य प्रकाशित रचनाएँ : स्वाति बूँद और खारे मोती (काव्य संग्रह) 1993 संग्रह) 1997 हिन्दी साहित्य के इतिहास में नारी (विवरण) 1995 भारतीय नारी समाज और साहित्य के ऐतिहासिक संदभों में (विवरण) 1996 टूटता वहम (कहानी संग्रह) 1997 अनुभूति के घेरे (कहानी संग्रह) 1997 हमारे हिस्से का सूरज (कविता संग्रह) 2005 • संघर्ष (कहानी संग्रह) 2006 रंग और व्यंग्य (नाटक संग्रह) 2006 नंगा सत्य (नाटक) 2007 शिकंजे का दर्द (आत्मकथा) 2011 • हाशिए का विमर्श (लेख संग्रह) 2012 नीला आकाश (उपन्यास) 2013 तुम्हें बदलना ही होगा (उपन्यास) 2015 मेरे साक्षात्कार 2015 जरा समझो (कहानी संग्रह) 2015 दलित साहित्य एक आलोचना दृष्टि 2016 दलित लेखन में स्त्री चेतना की दस्तक (समीक्षा) 2016 कैदी नं. 307 सुधीर के पत्र 2016 संवादों के सफ़र (मेरा पत्र संचयन) 2017 कारवाँ बनता गया... 2018 साक्षी है संवाद (साक्षात्कार) 2020 धन्यवाद के बहाने 2020 1 सम्मान एवं पुरस्कार : मध्य प्रदेश दलित साहित्य अकादमी विशिष्ट सेवा सम्मान एवं पुरस्कार 11000/- रमणिका फाउण्डेशन से सावित्री बाई फुले सम्मान एवं पुरस्कार 11000/- महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी की ओर से डॉ. ऊषा मेहता हिन्दी सेवा सम्मान एवं पुरस्कार 51000/- विहार सरकार के राजभाषा हिन्दी विभाग द्वारा बी.पी. मंडल सम्मान एवं पुरस्कार 200000/-1 संपर्क : शील-2, गोपालनगर, तीसरा बस स्टॉप, नागपुर-22, महाराष्ट्र। मो. 09588442591, 09422548822, 0712-2230444
मनोगत
मेरे जीवन और लेखन के क्रम में अनेक प्रश्न हैं, जिनके उत्तर स्वरूप मेरे साक्षात्कार हैं। जो बातें मैं सहज ही नहीं कह सकी, वे सभी शब्दों में चित्रित होकर इन साक्षात्कारों में आई हैं। कितने लोगों ने मुझे प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करके, सच बोलने के लिए प्रेरित किया है। मेरा लेखन विशेष रूप से दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को केंद्र में रखकर हुआ है। मैं दलित जागृति एवं स्त्री मुक्ति आंदोलन से जुड़कर काम कर रही हूँ, जिसका प्रभाव मेरे लेखन पर भी है। दलित आंदोलन एवं दलित साहित्य लेखन से प्राप्त पहचान के फलस्वरूप मेरा सम्पर्क क्षेत्र भी बढ़ा है। देश के सभी प्रांतों से शोधार्थी, प्राध्यापक वर्ग, पाठक-समीक्षक और आलोचक सभी से लगातार संवाद चल रहा है। मैं आशा करती हूँ कि यह संवाद आगे भी जारी रहेगा। बाबासाहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की विचारधारा से प्रेरणा पाकर ही यह संभव हो सका है। सामाजिक जागृति, समता, एकता, मानवता और बन्धुत्व भाव के लिए मेरा लेखन और मेरा जीवन समर्पित है। मेरे साक्षात्कारों की श्रृंखला में 'मेरे साक्षात्कार' नाम से पहली पुस्तक सर्वप्रथम 2016 में शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुई है। इसकी अगली कड़ी के रूप में 'साक्षी है संवाद' 2018 में अमन प्रकाशन, कानपुर से प्रकाशित हुई है। इसके बाद भी संवाद लगातार जारी हैं। इसलिए मैंने अपने साक्षात्कारों के इस संकलन को नाम दिया है-'संवाद जारी है...'। इस पुस्तक को सहर्ष प्रकाशित करने के लिए मैं समकालीन प्रकाशन, नई दिल्ली की आभारी हूँ।
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