लेखक परिचय
Dr. Seema Johari Academic Qualification-M.A., NET, Ph.D., D.Litt. (Music). Throughout First Divisioner and rank holder. Author of several books on music (Hindi). Contributed to research joumals with published articles. Programme Officer (Music&Dance) Jawahar Kala Kendra, Jaipur (1997-1998). Lecturer(Music), Savitri Girls College, Ajmer (1998-2000). Lecturer(Music) Dr. B.R. Ambedkar University, Agra (2003-2009). Working as Associate Professor, Music, Indira Gandhi National Open University since 2009. All India Radio and Television artist Cassettes of songs released by T-series and other leading music companies. Aptitude for stage performance and compering.
पुस्तक परिचय
संगीत की उत्पत्ति, ध्वनि और संगीत, कंठ साधना, संगीत व धर्म, संगीत एवं भारतीय संस्कृति, संगीत के कृत्य, कला, ललित कला व संगीत, सौंदर्यबोध-भारतीय व पाश्चात्य विचारधारा, कलागत सौन्दर्य तथा उसके तत्व, संगीत कला एवं सौंदर्यबोध, संगीत कला के माध्यम से भाव्यभिव्यक्ति, संगीत व रस, लोक संगीत तथा शास्त्रीय संगीत, उत्तरी व दक्षिणी संगीत पद्धतियों के विविध पक्ष, रागदारी संगीत में कल्पना और सृजन की भूमिका, संगीत कला व श्रोता, संगीत व मंच प्रदर्शन, सांगीतिक मंच-प्रदर्शन के आवश्यक घटक, संगीत कला एवं समीक्षक, संगीत में परंपरा और परिवर्तन, वर्तमान बदलते शैक्षणिक मूल्यों में उच्च शिक्षा एवं संगीत, शिक्षा, शिक्षक एवं संगीत, आधुनिक काल में संगीत का विकास, संगीत शिक्षण की सुविधाएँ, त्रिमूर्ति आदि विषयों को पुस्तक में समाहित करने की कोशिश की गई है। नई शिक्षा नीति 2020 में समाज में रोजगारमूलक महत्व के कारण आने वाले बदलावों को देखते हुए समाहित शिक्षा पर जोर दिया गया है। शिक्षक की शिक्षा और प्रशिक्षण प्रक्रियाओं के सुधार पर बल दिया गया है। हमारे देश के विश्वविद्यालयों के स्नातक व स्नातकोत्तर श्रेणियों के पाठ्यक्रमों में ऐसे सभी बिंदुओं का समावेश किया गया है। अतः संगीत विषय के छात्रों को विषय की पर्याप्त जानकारी होने के साथ संगीत से जुड़े अन्य पहलुओं से भी अवगत होना चाहिए। इन्हीं बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए मैंने इस पाठ्य पुस्तक को प्रस्तुत करने का विनम्र प्रयास किया है।
प्रस्तावना
साहित्य, संगीत और कला तीन ऐसे प्रमुख क्षेत्र हैं जो मानव के व्यक्तित्व को महानता प्रदान करते हैं। तीनों क्षेत्रों का अपना-अपना स्थान व महत्व है। लेकिन जब हम संगीत के क्षेत्र को लेते हैं तो इसके अनेक पक्ष उजागर होते हैं इस विषय के अन्तर्गत हम केवल उसके सैद्धान्तिक पक्ष को नहीं लेते, बल्कि व्यवहारिक पक्ष को भी गहराई से देखते हैं। ऐसा करने पर इसमें गायन, वादन और नृत्य के तीन आयाम हो जाते हैं। ललित कलाओं में संगीत का विषय अपनी विशेषता लिए हुये है। इसके गहन अध्ययन के लिये ये जरूरी है कि इस विषय का छात्र इसकी उत्पत्ति, इसके लोक व शास्त्रीय पक्षों, समय-समय पर इसके बदलते आयामों व सौन्दर्यबोध के बारे में, भारतीय व पाश्चात्य विचारधाराओं आदि के बारे में न्यूनाधिक जानकारी प्राप्त करे। इतना ही नहीं, संगीत ऐसा विषय है जिसका दर्शन, धर्म व संस्कृति से निकट संबंध है। जब हम संगीत कला की बात करते हैं तो उसमें भावों की भूमिका, रसानुभूति तथा श्रोताओं पर उसके प्रभाव की जानकारी भी समाहित हो जाती है। हमारे देश में अनेक अति प्रसिद्ध विभूतियां भी हुई है जिनके अमर योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। इसमें दक्षिण भारत की "त्रिमूर्ति" के अद्वितीय योगदान की भी संक्षिप्त चर्चा अपेक्षित है। ये भी ध्यान देने योग्य बात है कि यदि इस विषय के छात्र इतना सब ज्ञान प्राप्त करने के बाद मंच प्रदर्शन के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहता है तो उसे प्रदर्शन के आवश्यक घटकों की भी जानकारी होनी चाहिये। साथ ही शिक्षण के क्षेत्र में संगीत शिक्षक की भूमिका से भी सुपरिचित होना चाहिये।
हमारे देश के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में स्नातक व स्नातकोत्तर श्रेणियों के पाठ्यक्रमों में इन्हीं सभी बिन्दुओं का समावेश किया गया है। अतः विषय के छात्रों को इन सबकी पर्याप्त जानकारी होनी चाहिये। लेकिन उनमें समीक्षा करने की क्षमता भी होनी चाहिये ताकि वे तुलनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर संगीत की किसी विशेष शैली या किसी प्रसिद्ध कलाकार के योगदान का मान्य मूल्यांकन कर सकें। इन्हीं विन्दुओं को ध्यान में रखते हुए मैंने इस पाठ्य पुस्तक को प्रस्तुत करने का विक्रम प्रयास किया है। बिखरी हुई सामग्री को इस प्रकार संजोया है ताकि उसे सरल व रोचक रूप में देखा व समझा जा सके। मैंने अनेक उपलब्ध मानक संगीत रचनाओं से स्रोत प्राप्त किये हैं और में उनके लेखकों के प्रति अपना आभार प्रकट करती हूं। इस संबंध में अपने उन गुरुजनों के प्रति आभार व्यक्त करूंगी जिन्होंने मेरा स्नातक, उत्तरोस्नातक एवं शोध स्तर पर मार्गदर्शन किया और इस संबंध में समय-समय पर प्रेरणा व प्रोत्साहन दिया। मुझे अपनी मां (श्रीमती सरोज रानी) व पिता (श्री जगदीश चन्द्र जौहरी) से सदैव प्रेरणा व आशीर्वाद प्राप्त हुआ है जिससे प्रेरित होकर में इस बिन्दु पर पहुंच सकी हूं। अन्त में, मैं अपने प्रकाशक के प्रति आभार व्यक्त करना चाहूँगी जिन्होंने इस रचना को सराहा और इसके प्रकाशन में विशेष रूचि ली। मुझे आशा है कि पाठकगण इस रचना से लाभान्वित होंगे
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