पुस्तक परिचय
आप अखिल भारतीय संतमत सत्संग दिल्ली (रजि०) के संरक्षक हैं। आनन्द योग का प्रचार-प्रसार करते हुए अहर्निश मानवता की सेवा में समर्पित हैं जिससे असंख्य लोग अपने जीवन को तनावमुक्त बनाकर सफल गृहस्थ जीवन जीते हुए परमात्म-पथ पर अग्रसर हो रहे हैं। आपका शुभ जन्म परम सन्त महात्मा श्री वृजमोहन लाल जी की दया व दुआ से 17 अगस्त 1953 को जबलपुर में परम सन्त श्री यशपाल जी एवं परम सन्त श्रीमती रूपवती देवी जी के सुपुत्र रूप में हुआ। पूजनीय दद्दाजी महाराज ने आर्शीवाद दिया था 'भगवान् उसकी उम्र दराज करे और चिरंजीव व बड़ा ही बरकत वाला हो।' आप इण्डियन टेलीफोन इण्डस्ट्रीज के समन्वयन कार्यालय दिल्ली में प्रबन्धक के पद पर कार्य करते हुए अगस्त 2011 में सेवा निवृत्त हुए। आप अपने पूज्य सत्गुरुदेव जी के जीवन काल में ही 1994 से सत्संग कार्यों का संचालन करने लगे। सेवारत रहते हुए भी आपने अपने खाली समय तथा सभी अवकाशों का सदुपयोग ब्रह्मविद्या के प्रचार-प्रसार हेतु ही किया। आप वर्ष में राष्ट्रीय सत्संग के कार्यक्रम देश के विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न सत्संग केन्द्रों पर संचालित करते हैं तथा प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को अनंगपुर, फरीदाबाद (हरियाणा) में सत्संग कार्यक्रम का संचालन करते हैं। इन कार्यक्रमों से बचे हुए प्रत्येक रविवार एवं गुरुवार को मुख्यालय पर साप्ताहिक सत्संग आप स्वयं कराते हैं। श्रद्धालुओं और जिज्ञासुओं की साधना संबंधी शंकाओं का समाधान व व्यवधानों का निराकरण तथा सांसारिक जीवन की समस्याओं के निराकरण व मार्गदर्शन साधक की सुविधानुसार करते हैं जैसे दूरभाष, पत्र, मेल आदि द्वारा तथा आवश्यकतानुसार व्यक्तिगत संपर्क और सहयोग द्वारा भी।आप पाण्डित्य प्रदर्शन नहीं करते। साधना की उपयोगी बातें ही बताते हैं। कथनी की जगह करनी पर जोर देते हैं। उलझना नहीं है; अपना काम करना है; सेवा करनी है; सत् तो बिखरा पड़ा है; बस सेवा करके पा लेना है।
प्रकाशक की कलम से
परम सन्त महात्मा श्री यशपालजी महाराज, संस्थापक अखिल भारतीय सन्तमत सत्संग (रजि०) द्वारा प्रकाशित "सन्त सुधा" त्रैमासिक पत्रिका का शुभारम्भ जुलाई 1976 से हुआ। इस पत्रिका का ध्येय परमार्थ प्रेमियों हेतु उच्चतम आध्यात्मिक साधना के सरल सूत्र व संकेत एवं चरित्र गठन तथा शारीरिक एवं मानसिक सुधार के लिए पर्याप्त आध्यात्मिक साधना सम्बन्धी साहित्य सामग्री जुटाना हैं। इसमें समस्त लेखों व प्रलेखों के साथ-साथ "संरक्षक का सन्देश" का मुख्य उद्देश्य गृहस्थ आश्रम में रहते हुए मनुष्य सारे कर्म धर्म एवं शास्त्र के अनुरूप पूरा करते हुऐ सत्पुरुष के ध्रुव पद तक कैसे पहुँच सकते हैं - इस साधना हेतु मूलभूत सूत्रों व संकेतों को उपलब्ध कराना है। सद्गुरु, सत्नाम व सत्संग आध्यात्मिक जीवन निर्माण के स्तम्भ हैं। सद्गुरु का सान्निद्ध्य व सदुपदेश व संकेत इस परमार्थ मार्ग में सम्बल व दिशा निर्देशक होता है। इसी दृष्टिकोण से प्रत्येक "सन्त सुधा " के अंकों में “संरक्षक का सन्देश" के अन्तर्गत वेदशास्त्र, प्राचीन और अर्वाचीन ऋषिकृत ग्रन्थ, आप्त पुरुषों और सन्त महात्माओं की अनुभव सिद्ध वाणी, परम्परा के स्दगुरुओं परम सन्त महात्मा श्री रामचन्द्र जी महाराज, महात्मा श्री रघुवर दयाल जी महाराज परम सन्त महात्मा श्री बृजमोहन लाल जी महाराज, परम सन्त महात्मा श्री यशपाल जी महाराज व महात्मा श्रीमती रूपवती देवी जी से प्राप्त अनुभव सिद्ध संकेतों, सरल तरीकों व अभ्यास के सूत्रों का समुचित समावेश होता है।
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