पुस्तक परिचय
"सरात समवा स्वदेशों से स्पष्ट होता है कि स्वदेशी का अर्थ अपने मूल्यों के साथ विश्व से सवाद करना है। यहाँ स्वदेशी को किची संकीर्ण वा आत्मकेंदित राष्ट्रवादी अवधारणा के स्य में प्रस्तुत पी किया गया, बरिक इसे आरसगिर्भरता, आत्मविश्वास और विवेकपूर्ण वैश्विक सहभागिता के संतुलित नॉडल के रूप किया गया है। वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में यह सोच बनकालीन भारत की नीतिगत और सामाजिक आवश्यकतसयों के अनुरूप है।
'सरत समया स्वदेशी' की सबसे बड़ी विशेषता इसका समता दृष्टिकोण है, जिसमें आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और रणनीतिक आयामों का एक सूत्र में पिरोया गया है। स्वदेशी को केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित न रखकर इसे जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इससे पाठक को यह समझने में सहायता मिलती है कि राष्ट्र निर्माण बहुआयामी प्रक्रिया है। यह समन्वित दृष्टि पुस्तक को वैचारिक रूप से सशक्त बनाती है।
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