सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की रचनाओं की प्रासंगिकता आनेवाले वर्षों में भी कम नहीं होगी और यह भी कि स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य के स्वरूप और विकास को ठीक-ठीक समझने के लिए भी उनकी रचनाओं से गुजरना अनिवार्य होगा। इस सच्चाई की लगभग अनदेखी करते हुए नयी कविता के प्रतिमान और मानदंड सुनिश्चित करनेवाले दिग्गज आलोचकों ने जैसी उपेक्षा, उदासीनता और दुराग्रही प्रवृत्ति दिखायी है, उससे दुःख, आश्चर्य और क्षोभहोना स्वाभाविक है। अपने सांगठनिक पूर्वाग्रहों और राजनीतिक हितों को सर्वोपरि माननेवाले आलोचकों ने सर्वेश्वर के साथ तो अन्याय किया ही, साथ ही साहित्य की उस जीवंत और स्वस्थ जनवादी परम्परा की भी मनमानी व्याख्या की, जिसे प्रेमचंद, निराला और मुक्तिबोध जैसे रचनाकारों ने प्राणपण से सींचा था। 'साम्यवाद और पूँजीवाद' पर एकसाथ थूकनेवाले सर्वेश्वर ने अपनी संपूर्ण रचनायात्रा में कभी भी किसी आयातित विचारधारा या संगठन को अपने सृजन पर आरोपित होने का अवसर नहीं दिया, बल्कि अपने समय में प्रचलित तथाकथित प्रगतिशील और जनवादी जुमलों की आलोचना ही की तथा उनपर आधारित साहित्य को घटिया माना। एक अद्भुत, अक्खड़ व्यक्तित्व के धनी सर्वेश्वर की ऐसी निर्भीक और बेबाक टिप्पणियाँ ही संभवतः आलोचकों के दुराग्रह के मूल में रही होंगी। लगभग चार दशकों तक अनवरत चलनेवाली अपनी रचना-यात्रा में सर्वेश्वर कभी भी ठहराव के शिकार नहीं हुए, हाँ समय-समय पर उनकी संवेदनाओं और वैचारिक आग्रहों में बदलाव अवश्य हुआ, जो प्रायः सकारात्मक है। हर तरह के शोषण से मानव-मुक्ति के स्वप्न और बेहतर समाज-निर्माण के संकल्प में अनवरत चलनेवाली जिस यात्रा का अंत हुआ, वह सचमुच सार्थक है और यह सार्थक अंत ही बाद की पीढ़ी के रचनाकारों के लिए प्रस्थान-विंदु बन जाता है। यात्रा अंततः उपलब्धि और विरासत में बदल जाती है।
छात्र-जीवन में सर्वेश्वर की रचनाओं में उत्पन्न रुचि यदि पुस्तक के रूप में सार्थक हो सकी, तो उसका अधिकांश श्रेय मैं डॉ० अमर कुमार सिंह को प्रदान करना चाहूँगा। उनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन से ही मुझमें वह आत्मविश्वास जगा। मैं उनका सचमुच कृतज्ञ हूँ।
और अंत में, मैं अपने बचपन के मित्र श्रीआनन्दवर्धन ओझा को भी धन्यवाद देना चाहूँगा, जिनके प्रयास और परामर्श से इसका प्रकाशन संभव हुआ ।
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