भारतीय आध्यात्मिक विचारधारा के आध्यात्मिक क्षेत्र में सत्संग की महिमा का विशेष स्थान है। हर मानव को सत्संग की आवश्यकता है। जीवन को सुधारने के लिए तथा परिवर्तन लाने के लिए सत्संग ही एकमात्र उपाय है। मानसिक शांति के लिए भी सत्संग की बहुत ही आवश्यकता है। जीवन यात्रा में भटका हुआ राही सत्संग को प्राप्त करके अपने सही मार्ग पर आ जाता है। जगत रुपी घोर अरण्य-अंधःकार में सत्संग से ही प्रकाश पा करके बाहर निकला जा सकता है। इस जगत में जिसका भी जीवन उजागर हुआ है, प्रकाशित हुआ है, वह सत्संग के द्वारा हुआ है। दुःख रुपी महा नरक से छुटकारा पाने के लिए सत्संग ही सहारा हो सकता है। जीवन रुपी बुझते हुए दीपक को सत्संग ही प्रकाशित कर सकता है। अशांत मन को प्रसन्न रखने के लिए सत्संग की शरण में जाना चाहिए। परमपिता परमात्मा को प्राप्त करने के लिए सत्संग ही अमोघ उपाय है।
भगवान ने स्वयं अपने श्रीमुख से कहा है-
नाहं वसामी वैकुंठे योगिनां हृदये नच।
मद् भक्त्या यत्र गायंति तत्र तिष्ठामी नारद ।।
यहाँ भगवान कह रहे हैं कि, "हे नारद ! मैं वैकुंठ में नहीं रहता हूँ, न ही योगियों के हृदय में बसता हूँ। मैं तो वहाँ रहता हूँ जहाँ मेरा भक्त मेरा गुणगान कर रहा है, मेरा कीर्तन कर रहा है, मेरा नाम जप किया जा रहा है और सत्संग हो रहा है। प्रभु का गुणगान, प्रभु के चरित्र का बखान सत्संग में संभव है। प्रभु के गुणगान से हृदय भाव विभोर हो जाता है, आँखो से प्रेमाश्रु बहता है, वाणी गद्गद् हो जाती है। मन के सब पाप धुल जाते हैं। छल-कपट सत्संगी के शरीर रुपी घर को छोड़कर कोसों दूर भाग जाते हैं। यह सब सत्संग का प्रताप है। सत्संग से मन की गाँठ खुल जाती है।
कहा जाता है कि जहाँ भी श्रीराम कथा होती है वहाँ वीरवर हनुमानजी उपस्थित रहते हैं। हनुमान जी ज्ञान के सागर, गुणों की खान हैं, अमर हैं। सभी प्रकार की सिद्धियाँ उनके पास है फिर भी राम कथा सुनिबे को रसिया। प्रभु राम की कथा, लीला का वर्णन ही तो सत्संग है। प्रभु की कथा के रसपान से हृदय निर्मल हो जाता है। बाह्य सत्संग लंबे समय तक करते-करते एक दिन आंतरिक सत्संग घटित होता है। वास्तव में सत् का संग करना ही सत्संग है और सत् क्या है, जो तीनों काल में एक-रस रहता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता, उसका कभी नाश नहीं होता है, वही सत् वस्तु है। उसी सत् तत्व को प्राप्त करने के लिए सत्संग की आवश्यकता है। सत्संग के बिना हमको सही रास्ता नहीं मिलता। सत् का संग करने के लिए असत् का परित्याग करना पडता है। यह दृश्यमान जगत परिवर्तनशील, नाशवान है, इसका कोई भरोसा नहीं। यह असत् है, मिथ्या है, यह ज्ञान हमको सत्संग से प्राप्त होता है और शनैः शनैः हमारा मन जगत से ऊपर उठ जाता है तथा सत् का संग हो जाता है। यह है असली सत्संग। और अधिक क्या कहूँ, मेरे जीवन में जो परिवर्तन हुआ है उसका कारण सत्संग ही है।
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