लेखक परिचय
दिनेश कुमार माली जन्म-तिथि: 09.11.68, जन्म-स्थान: सिरोही, राजस्थान) शिक्षा: बी.ई. (आनर्स) (माइनिंग) (1992), (एम.बी.एम. इंजिनीयरिंग कॉलेज, जोधपुर), पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन एकोलोजी एंड एनवायरनमेंट (1996), एम.बी.ए. (ऑपरेशन) (1999), एम.ए. (हिंदी) (2017), एम.ए. (अंग्रेजी) (2019), फट क्लास सर्टिफिकेट ऑफ कोम्पेटेंसी (2000) दिनेश कुमार माली राजस्थान साहित्य अकादमी से डॉ. देव राज उपाध्याय आलोचना पुरस्कार, मध्य प्रदेश राष्ट्र भाषा समिति द्वारा भोपाल में राज्यपाल के कर कमलों से स्व. हजारीमल जैन स्मृति वांग्मय पुरस्कार, साहित्य शोध संस्थान, दिल्ली की तरफ से आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी पुरस्कार, फिरीदाबाद में राष्ट्रीय प्रज्ञा संस्थान द्वारा प्रोफेसर सरयू कृष्णमूर्ति', भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली द्वारा प्रोफेसर गार्गी गुप्ता राष्ट्रीय द्विवागीश अनुवादक सम्मान, बीजिंग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन 'सृजनगाथा' सम्मान, हलघर नाग की जन्मस्थली घेस गाँव में अभिमन्यु सम्मान जैसे महत्वपूर्ण सम्मानों के अतिरिक्त जबलपुर, रायपुर, नासिक, रोहतक, चरखा-दादरी, भोपाल, शिमला, मदुरै, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर, भुवनेश्वर, कटक, महँगा बड़चना, चंडीखोल, अंगुल, तालचेर की अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित हो चुके हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट, साहित्य अकादमी और राजपाल एंड संस जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशकों से प्रकाशित आपकी कृतिया देश-विदेश में बहुचर्चित रही है। अर्द्ध शताधिक कृतियों में 31 कृतियाँ ओड़िया और अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद और 25 से अधिक मौलिक कृतियों हैं, जिसमें यात्रा-संस्मरण, आलेख-संग्रह, समीक्षा, साक्षात्कार, आलोचना, उपन्यास आदि शामिल है। पद्म श्री हलधर नाग पर लिखी आपकी रचनाओं पर पांडिचेरी विश्वविद्यालय ने चार बार अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों आयोजित की एवं हलधर नाग पर लिखे आलेखों को इग्नू एम.ए. के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
पुस्तक परिचय
बहुमुखी प्रतिभाशाली प्रसिद्ध साहित्यकार दिनेश कुमार माली के अद्यतन उपन्यास 'शहीद बिका की खोज' में तालचेर प्रजामंडल आंदोलन के प्रथम शहीद बिका के जीवन-संघर्षों, उसकी शहादत और तत्कालीन सामाजिक विद्रूपताओं-विसंगतियों को लिपिबद्ध करने के बहाने ब्रिटिश उपनिवेशवाद और तत्कालीन राजाओं द्वारा प्रजा पर किए जा रहे दुर्दात अत्याचार और शोषण के विरुद्ध तालचेर गडजात में उठी आवाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में बखूबी उजागर किया है। इस रचना की औपन्यासिक संरचना में विक्रम-बेताल की जुगल-जोड़ी जैसे मिथकीय पात्रों के प्रश्नोत्तरी-वार्तालाप वाले अनोखे अंदाज में कायरों को देशभक्त शूरवीरों में बदलने वाले गांधीवाद पर गहन-विमर्श किया गया है। इसे परतंत्र भारत में ओड़िया जीवन के मार्मिक सामाजिक और राजनैतिक क्रांति के सूत्रपात का आधिकारिक दस्तावेज और दलित विमर्श का प्रतिनिधि उपन्यास माना जा सकता है। इस उपन्यास में नव कृष्णा चौधुरी, मालती चौधुरी, पवित्र मोहन प्रधान, फ्रीड़ा दास, गड़जात ओड़िशा के गांधी नाम से विख्यात सारंगधर दास के अतिरिक्त लब्ध-प्रतिष्ठित जैसे साहित्यकारों राधामोहन गडनायक, सच्चिदानंद राउतराय और अनेक राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय नेताओं ठक्कर बापा, मिस अगाथा हैरिसन आदि के अभूतपूर्व योगदान का उल्लेख हैं। इसके अतिरिक्त, श्री माली ने अपने उपन्यास में अनेक गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों की मार्मिक जीवन-गाथाओं के साथ-साथ उनकी यथार्थ जीवन-शैली, देश प्रेम और समाज में प्रचलित दंत-कथाओं के विभिन्न पहलुओं की जटिलताओं को गूँधकर एक उत्कृष्ट साहित्यिक कृति की रचना की है। शहीद बिका ने वेताल के रूप में न केवल अपनी हरिजन जाति का प्रसंग उठाकर तत्कालीन समाज की विसंगतियों, बल्कि समकालीन परिप्रेक्ष्य में भी समाज को दीमक की तरह चाटकर जर्जरित करने वाले जातिवाद पर कठोर प्रहार किया है। मगर इस उपन्यास का अंत आशावादी है, जो युवा-पीढ़ी के जाति, धर्म और नस्ल से ऊपर उठकर अपने जीवन के इप्सित लक्ष्यों को प्राप्ति हेतु सामाजिक लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनाने की अपील करता है। इस दिशा में सर्वप्रथम कदम उठाने वाले श्री माली को हार्दिक धन्यवाद देते हुए उनकी उन्मुक्त कंठ से सराहना करता हूँ, जो अपने सपनों को साकार होने का ख्वाब ही नहीं देखते, बल्कि सपने देखने का अप्रतिम साहस भी रखते हैं। "शहीद विका नायक की खोज" एक ऐसा उपन्यास है जो अपने अद्वितीय कथ्य और अनूठी शैली के माध्यम से इतिहास, समाज और मानवीय संवेदनाओं के विभिन्न आयामों का अन्वेषण करता है। लेखक ने इस उपन्यास के माध्यम से न केवल तालचेर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को सजीव किया है। तालचेर, जो अपने कोयला खदानों, उद्योगों और पर्यावरणीय जटिलताओं के लिए प्रसिद्ध है, लेखक की दृष्टि में मात्र एक भूगोल नहीं, बल्कि जीवंत समाज और इतिहास का एक प्रतीक है। इस पृष्ठभूमि में, बिका नायक जैसे शहीदों की गाथा लिखना एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है, जिसे लेखक ने विक्रम-बेताल की शैली में प्रस्तुत कर इसे रोचक और प्रासंगिक बना दिया है। उपन्यास में कल्पना और इतिहास का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। उपन्यास का कथानक, 1893 से 2024 तक के इतिहास को समेटे हुए, भारतीय समाज के दलित और शोषित वर्गों के संघर्ष को प्रतिबिंबित करता है। लेखक ने मार्मिकता के साथ इस बात को रेखांकित किया है कि स्वतंत्रता आंदोलन में निचले वर्ग के लोगों ने किस प्रकार त्याग और बलिदान किया, लेकिन आज भी उनके साथ न्याय नहीं हुआ है। यह प्रश्न पाठकों के मन में गहराई से उभरता है और उन्हें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता ह महिमा स्वामी और संत कवि भीम भोई के सामाजिक योगदान को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, लेखक ने ओड़िशा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को बड़े ही संवेदनशील तरीके से उभारा है। इसके साथ ही, विक्रम और वेताल के संवादों के माध्यम से आधुनिक समय की सामाजिक विसंगतियों पर भी गहराई से विचार किया गया है। विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेजों, लेखों, और स्वतंत्रता संग्रामियों के परिजनों से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर यह उपन्यास न केवल एक साहित्यिक कृति है, बल्कि इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है। यह उपन्यास हमें विका नायक और उनके जैसे अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए प्रेरित करता है। लेखक का यह प्रयास, कि उनके बलिदान को न केवल स्मरण किया जाए, बल्कि उनके आदर्शों को आत्मसात किया जाए, सराहनीय है। "शहीद बिका नायक की खोज" केवल एक उपन्यास नहीं है, यह एक संवेदनशील लेखक के हृदय की गहराइयों से उपजा हुआ एक ऐसा प्रयास है, जो हमारे राष्ट्रीय इतिहास और समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को जागृत करता है। इस प्रेरणादायी कृति के लिए लेखक को हार्दिक शुभकामनाएँ।p>
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