भूमिका
त्रिलोक मेहरा हिमाचल के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं जिनकी रचनाओं में पहाड़ी जीवन एवं वहाँ की लोक-संस्कृति, लोक-परंपरा का अद्भुत संवाद दिखता है। उनकी कृति 'पानी के चुभते कांटे' व्यास नदी पर आधृत महत्वपूर्ण उपन्यास है जिसमें व्यास नदी के उद्गम-प्रसार के साथ उस पर प्रस्तावित 'पौंग डैम' की त्रासद-गाथा है। लेखक ने उपन्यास के प्रारम्भ में व्यास नदी की व्युत्पत्ति कथा को कथा-सूत्र में बांधने का प्रयास किया है। रोहतांग के व्यासकुंड से निकलती हुई व्यास नदी के अपूर्व सौंदर्य के साथ लेखक ने पार्वती एवं मांजी नदी के नीले एवं डरावने जल का चित्रण भी मनोरम ढंग से किया है। यही नहीं लेखक ने व्यास नदी के हल्दून घाटी पहुंचने के बाद आ रहे परिवर्तनों को भी विविध दृश्यों एवं घटनाओं के साथ उकेरा है। व्यास नदी के जलोढ़ मैदान के कारण हल्दून घाटी अत्यंत उपजाऊ एवं उर्वर है। इस नदी के विषय में एक किंवदंती है कि यदि यहां किसी की बाजू काट कर फेंक दी जाए तो उसमें भी कोंपलें आ जाती हैं। लेखक का उद्देश्य नदी की कहानी कहना नहीं है अपितु नदी किनारे गुजर-बसर कर रहे लोगों की समस्याओं, चिंताओं को उद्घाटित करना है 'पानी के चुभते कांटे' कांगड़ा के स्थानीय निवासियों की मर्म-गाथा है जहां पानी के कारण उनका अस्तित्व धूमिल हो जाता है। इतिहास साक्षी है कि विश्व की सभी विकसित सभ्यताओं का विकास नदी के किनारे हुआ। नदियां जल आपूर्ति का माध्यम भर नहीं होतीं बल्कि आजीविका एवं उन्नति का माध्यम भी बनती हैं, किन्तु कांगड़ा की हल्दून घाटी में व्याप्त व्यास नदी लोगों के सुख-चौन एवं शान्तिपूर्ण जीवन का ग्रास बन जाती है। लेखक ने दर्शाया है कि 'पौंग डैम' के निर्माण से पूर्व यहां के लोग सुखी एवं आनंदित जीवन जीते थे किन्तु डैम के निर्माण के बाद इन डैमियों का जीवन दुःख की अनाविल गाथा में रूपांतरित हो गया। अपने घर, खेत-खलियान, मवेशी तक गंवाने वाले इन कांगड़ियों को न केवल अस्पृश्य समझा गया बल्कि विस्थापन के एवज में प्रदान की जाने वाली जमीनों के नाम पर कोरे आश्वासन ही दिये गए। स्वतंत्रता के बाद हल्दून घाटी में भारत सरकार द्वारा बांध बनाने की योजना तेज गति पकड़ती चली गयी। स्थानीय लोगों की चिंताओं को दरकिनार कर राजनीतिक लालसा पूर्ण करने वाले राजनेताओं ने मानवाधिकारों का जमकर हनन किया। उनके छद्म एवं स्वार्थी चरित्रों से उक्त उपन्यास भरा पड़ा है। लेखक ने हिमाचल, राजस्थान एवं केंद्र सरकार के ढुलमुल एवं अनिर्णीत निर्णयों के बीच हाशिए पर जीवन जी रहे कामगारों की वस्तु-स्थितियों को अद्भुत बानी दी है। यह उपन्यास 'ठाकरा दा पत्तन' नाम से चर्चित हिमाचल-पंजाब के उस समृद्ध भूभाग के विपन्न होने की कथा है जहां कभी दुःख-अदेश का नाम तक न था। किन्तु जैसे-जैसे भूमि अधिग्रहण एवं बाँध निर्माण की परियोजना बलवती होती है 'ठाकरा दा पत्तन' आंसुओं में डूबे हुए द्वीप की शक्ल ले लेता है। लेखक ने 'पानी के चुभते काटे' उपन्यास के बहाने जीवनदायी जल को जीवन का ग्रास करने वाले शत्रु रूप में चिन्हित किया है। भारत में सदैव नदियों को मोक्षपुरियों की तरह पवित्र समझा जाता रहा है। इस संसार-सागर से पार उतारने में नदियां भी कम महत्वपूर्ण नहीं। त्रिलोक मेहरा ने अप्रैल माह में स्त्रियों द्वारा नदी-पूजन एवं नदी के बहाने भवसागर से पार उतरने की अभ्यर्थना को भी दर्शाया है। उपन्यास पानी के बीच विकसित-परिवर्धित होती हुई मानव-सभ्यता की कहानी है जिसमें फूल भी हैं और शूल भी। जिसमें प्रकृति की महत्वपूर्ण सहचरी नदी के साथ बोलने-बतियाने का बोध भी है और नदी के बीच अपनी कार्य-संस्कृति के तिरोहण का क्षोभ भी है। उपन्यास के प्रमुख पात्र वैद्य आत्मा राम, नवीन, कविता, हंसराज, जगत राम, हेमराज गर्ग आदि यथार्थ के सुन्दर प्रतिरूप हैं जिनमें उपन्यास की विविध एवं बहुस्तरीय झांकी मिलती है। ये सभी पात्र कथा-तत्व को विस्तार देने एवं जीवन के विरूपित सत्य को भीतर से उघाड़ने का कार्य करते हैं। वैद्य आत्मा राम पुराने जमाने के वैद्य हैं जिनका, अपनी पुश्तैनी जमीन एवं घर से लगाव है वहीं उनका पोता नवीन पढ़ा-लिखा आधुनिक युवक है जो शिक्षा के द्वारा समाज में बदलाव का पक्षधर है। वैद्य आत्मा राम के चरित्र में परम्परा एवं नवीन के व्यक्तित्व में आधुनिकता के दिग्दर्शन होते हैं। परम्परा और आधुनिकता दोनों ही समाज को चाहिए। इन दोनों के मेल से, साहचर्य से, समाज पुष्ट होता है और उसमें प्रगतिशीलता एवं नूतनता की खिलावट आती है।
लेखक परिचय
जन्म : 7 मई 1951, गांव-बीजापुर, तहसील-जयसिंहपुर, जिला-क्रांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) के मध्यमवर्गीय परिवार में। शिक्षाः एम. ए. (राजनीतिशास्त्र) डिपलोमा तमिल, बी. एड. । त्रिलोक मेहराय गत तीन दशकों से कहानियां भारत की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित। कहानी 'भ्यागड़ा' विपाशा के अखिल भारतीय प्रतियोगिता में पुरस्कृत । प्रकाशित कहानी-संग्रह 'कटे-फटे लोग' 1991, 'मम्मी को छुट्टी है' 2006 और 'अन्तिम राय का सच' 2019। उपन्यास 'बिखरते इंद्रधनुष' 2009, 'मुंडू' 2020 में प्रकाशित । हिमाचल प्रदेश की भाषा एवं संस्कृति के सर्वेक्षण से सम्बद्ध और कई शोधपरक लेख प्रकाशित। रेडियो स्टेशन और टीवी से कहानियां और वार्ता प्रसारित । रचना-साहित्य एवं कला मंच, पालमपुर के सक्रीय सदस्य । मेहरा की कहानियों पर हिमाचल विश्वविद्यालय से अनुसंधान / शोध सम्पन्न । सम्पर्क : ग्राम व पोस्ट-भवारना, तहसील-पालमपुर, जिला कांगड़ा.
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