।। श्री सद्गुरूवे नमः ।।
मेरे मन में बार-बार विचार आया कि गुरु महाराज जी के लिए कुछ तो लिखा जाए। उनके जन्म शताब्दी वर्ष हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण वर्ष है। क्योंकि शिष्य का यह कर्तव्य होता है कि अपने गुरु महाराज जी का गुण-गान करे, उनके प्रति भावपूर्ण श्रध्दांजली अर्पण करे, उनको बार-बार प्रणाम करे, उनका चिंतन करे। उनके बतलाये हुए उपदेश को जीवन में धारण करने का प्रयास करे। इस मायामय संसार में गुरु से बढ़कर शिष्य का हितैशी दूसरा कोई नहीं है।
गुरु ही ऐसा दीपक है जो शिष्य को प्रकाश देकर जगत के महान अंधकार से बाहर निकालकर मोक्ष तक ले जा सकते हैं। गुरु ही ऐसा फूल है जो शिष्य के जीवन में खुशबू और और खुशियाँ खुरि भर देते हैं। गुरु ही ऐसा शिल्पकार है जो पत्थर रुपी शिष्य को मूर्ति का रुप प्रदान कर जगत में में पूज्य बना लेते हैं। शिष्य गुरु का कितना भी गुण-गान करे, उनकी सेवा-पूजा करे, उतना ही कम है। क्योंकि गुरु के महान उपकार के मूल्य को चूकाने के लिए शिष्य के पास कुछ है ही नहीं तथा न ही गुरु ऋण से उऋण हुआ जा सकता है। संत कबीर दास जी महाराज कहते है -
शिश उतारे भूई धरे तो भी सस्ता जान अर्थात गुरु के अनंत उपकार के बदले शिष्य यदि अपना सिर काट कर गुरु के श्रीचरणों में अर्पण कर दे तो भी यह सौदा सस्ता है। मैं तो कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति नहीं हूँ तथा न हीं मुझे संगीत का ज्ञान है। बस ! गुरु महाराज जी के प्रति भाव उत्पन्न हुआ कि कुछ लिखा जाए। गुरुदेव जन्म शताब्दि के उपलक्ष्य में यह लिखा-
परमपूजनीय सद्गुरूदेवा, शिवोम तीर्थ मेरे गुरुदेवा । यह भजन लिखने के पश्चात, हमारे श्री. श्रेयश गोवित्रीकर, जो कि गुरुदेव के भजनों को प्रेम से गाते हैं, कहा- इस को गाकर देखो तो कैसा लगता है। उन्हों ने गाया तो अच्छा लगा। उसके पश्चात मेरे मन में उत्साह आया, गुरुदेव के प्रति भाव उत्पन्न हुआ तथा एक के बाद एक कई भजन लिखते गया। लिखते समय ऐसा लगता था मानो श्री गुरुदेव ही प्रेरणा दे रहे हैं, लिखवा रहें हैं तथा अंदर से शब्द भी वे ही उभार रहे हैं। मैं तो केवल माध्यम था, कलम और कागज लेकर बैठ जाता था। गुरुदेव प्रवचन में कहा करते थे साधक का कत्तर्व्य है कि वह साधना हॉल में जा कर आसन में बैठ जाए, आगे का काम गुरु महाराज, गुरु शक्ति का है, आपको कुछ करना नहीं है।
अध्यात्म क्षेत्र में गुरु ही सर्वोपरी हैं, अध्यात्म का आधार ही गुरु कृपा है। गुरु ही सब कुछ है। गुरुदेव के प्रति भाव उदय हुआ -गुरु ही भक्ति गुरु ही शक्ति, गुरु ही ईश्वर ।
गुरु ही श्रध्दा गुरु ही निष्ठा, गुरु परमेश्वर ।।
शिष्य के लिए तीनों लोकों में गुरु से बढ़कर दूसरा कोई नहीं है, गुरु को ही सर्वस्व मानकर अपने-आप को गुरु चरणों में समर्पित कर देता है।
गुरुदेव आश्रम को कितना सुंदर नाम से अलंकृत करते हैं। गुरु धाम, गुरु द्वार, गुरु आश्रम आदि। गुरु आश्रम में शिष्य खुशियाँ मनाता है, आनंद मानता है, तो भाव उत्पन्न हुआ-
सद्गुरू द्वारे खुशियाँ मनाए जो गुरुमुखी शिष्य होय।
मनमुखी तो भटके जग में, ठौर ठिकाना न पाय।।
जो शिष्य गुरु के आदेश-उपदेश के अनुसार चलता है, अपने मन को गुरु चरणों में अर्पित कर देता है, मन के कहे अनुसार नचलता है, गुरु आज्ञा का पालन करता है, गुरु आज्ञा को शिरोधार्य करता है, उसको गुरुमुखी कहा जाता है। इसके विपरित जो शिष्य अपने मन का सुनता है, मन का ही मानता है, उसको मनमुखी कहा जाता है। वह गुरु की आज्ञा का अवहेलना करता है। गुरु का अनादर करता है। गुरु के आदेश-उपदेश का उसके जीवन में कोई स्थान नहीं होता, ऐसा शिष्य जगत में भटकता फिरता है, ठोकरें खाता है और अपने जीवन को दुःखमय बना लेता है। वह कभी भी सुख-शांति को प्राप्त नहीं कर सकता।
अध्यात्म कृपा साध्य है, प्रयत्न साध्य नहीं। अतः साधक-शिष्य का एकही कत्तर्व्य है, एक ही धर्म है कि गुरु कृपा प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्नशील रहे। गुरु को प्रसन्न करने के लिए, संतुष्ट करने के लिए सेवा ही सब से उत्तम उपाय है। जिस कार्य से, जिस सेवा से गुरु प्रसन्न हो जाते हैं, वह ही श्रेष्ठ, उत्तम सेवा है।
सोई सेवा उत्तम है सब से, जो गुरुदेव को भावे।
जो सेवा से गुरु संतोष न हो, वह ही विरिथा जावे ।।
अंत में गुरुदेव से नम्र निवेदन है कि इस अनाथ को आश्रय देकर अब तक अर्थात सैतीस साल हो गये हैं, संभाला है। आगे भी ऐसी कृपा बनाकर रखिए कि बाकि का जीवन आपके श्रीचरणों में रहकर सेवा-साधन करते हुए निकल जाए। आपके श्री चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।
इस पुस्तक के प्रकाशन में श्री. अनिल गोसावी और सौ. कृष्णा रैना के असाधारण सहयोग रहा है। देवात्मशक्ति सोसायटी आश्रम इनको आभार व्यक्त करती है।
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