यदि गौर ना हइत, तबे कि हइत, केमने धरिताम दे।
राधार महिमा, प्रेमरस सीमा, जगते जानात के।।
यदि इस कलियुग में भगवान् गौर के रूप में प्रकट नहीं हुए होते तो हमारा क्या होता? हम कैसे जीवन धारण करते। श्रीराधारानी की महिमा व प्रेम रस के उच्चतम सीमाओं को जगत् के लोगों को कौन बताता? अर्थात् प्रेम-रहस्य को कौन प्रकट करता?
(वासुघोष रचित गीति)
जैसे परम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण सभी भगवत स्वरूपों के स्रोत हैं, उसी प्रकार राधारानी भी लक्ष्मी, रुक्मिणी, सत्यभामा इत्यादि देवियों के उत्स (उद्गम) हैं। अर्थात् वे मूल (आदि) प्रक्ति हैं।
परन्तु इस पृथ्वी पर श्रीचैतन्य महाप्रभु के प्राक्टय के पूर्व सामान्यतया लोगों को राधारानी के विषय में बहुत कम जानकारी थी। उन्होंने साधारण लोगों के बीच श्रीमती राधारानी की महिमा का प्रसार किया। राधारानी का तत्त्व अत्यन्त गोपनीय है। यहाँ तक कि वेदों में भी श्रीराधारानी के विषय में संक्षेप में ही उल्लेख किया गया है। इसी कारण स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण सर्व साधारण के लिए राधा तत्त्व व श्रीमती राधारानी की लीलाओं का वर्णन करने इस पृथ्वी पर आये।
परन्तु सभी श्रीमती राधारानी के विषय में सुनने व बोलने के अधिकारी नहीं हैं। श्रीचैतन्यमहाप्रभु के परम्परा में जुड़े हुए प्रामाणिक वैष्णव आचार्यों से ही श्रीमती राधारानी के विषय में श्रवण करना चाहिये। तभी हम श्रीमती राधारानी के विषय में समझ पायेंगे।
हमने श्रीमती राधारानी के लीलाओं का यह संग्रह विभिन्न प्रमाणिक शास्त्रों में वर्णित एवं वृन्दावन के गोस्वामियों द्वारा व्याख्यायित राधारानी के विचित्र लीलावली से तैयार किया है। कुछ लीलायें व्रज-मण्डल परिक्रमा के पुस्तकों से भी एकत्रित की गयी है। जिनका उल्लेख किसी भी शास्त्र में नहीं है; परन्तु व्रजवासियों या व्रज के महान साधकों द्वारा वर्णित है।
श्रीमती राधारानी के लीलाओं का वर्णन करने से पहले यह ग्रन्य राधातत्त्व और श्रीकृष्ण के प्रति राधारानी के प्रेम को पवित्रता का वर्णन करता है। सम्बन्धित तथ्य श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी कृत श्रीचैतन्य चरितामृत से लिया गया है एवं जिनका अनुवाद व व्याख्या श्रील प्रभुपाद द्वारा किया गया है।
यह ग्रन्थ पढ़ने से पहले प्रत्येक को पूर्णतया विश्वस्त होना चाहिये कि श्रीकृष्ण ही परम पुरुषोत्तम भगवान् हैं और श्रीमती राधारानी हैं उनकी नित्य लीला संगिनी। वे श्रीकृष्ण के आनन्द-दायिनी (हादिनी) शक्ति के मूर्त विग्रह स्वरूपिणों हैं। वे कोई साधारण स्वी नहीं है। यह ग्रन्थ भगवान् श्रीकृष्ण के उन भक्तों के लिये है जो श्रीचैतन्य महाप्रभु, षड्गोस्वामीगण, इस्कॉन के पूर्ववर्ती आचार्यों एवं हमारे संस्थापकाचार्य श्रील प्रभुपाद के निर्देशन में श्रीकृष्ण के भजनानुशीलन में संलग्न हैं।
राधारानी की अनन्त लौलायें हैं। उनमें से कुछ यहाँ संकलित किया गया है। हम आशा करते हैं कि जो भक्तगण इस ग्रन्थ का अध्ययन करेंगे वे विशेष आनन्द की अनुभूति करेंगे एवं श्रीमती राधारानी के चरण कमलों में अधिकाधिक भक्ति विकसित कर पायेंगे। हमारे लिए श्रीमती राधारानी की सेवा करना बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि केवल उनकी कृपा द्वारा ही हम कृष्ण का प्रेम प्राप्त कर सकते हैं।
श्रीमती राधारानी के लीलाओं का वर्णन करने वाले विभिन्न शास्त्रों का मैं अनुसंधात्मक अध्ययन किया। गुरु-गौराङ्ग की कृपा से मैं जो उचित समझा, उसे सरल भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया हूँ। मैं ऐसा दावा तो नहीं कर सकता कि जो कुछ भी मैंने लिखा है वह सब त्रुटिहीन है। यदि किसी को कोई भूल-भ्रांति (त्रुटि) नजर आवे तो कृपया योग्य (समर्थ) वैष्णवों से चर्चा कर अपना संदेह दूर कर लें।
मैं आशा करता हूँ इस ग्रन्थ को प्रकाशित करके यदि मैंने कोई घोर अपराध किया है तो श्रीमती राधारानी मुझे क्षमा कर देंगी। मैं जानता हूँ कि राधारानी पर ग्रन्थ प्रकाशित करना अतिसंवेदनशील कार्य है। साथ-ही-साथ मैं ऐसा अनुभव करता हूँ कि श्रीमती राधारानी के लीलाओं के विषय में पुस्तक प्रकाशित करने की प्रेरणा मेरे हृदय में राधारानी से ही आयी है। नहीं तो कैसे में इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने का प्रयास करता। में इस अनुभूति के साथ इस ग्रन्थ का प्रकाशन कर रहा हूँ कि श्रीमती राधारानी अवश्य इस प्रवास के प्रेरणा दात्री हैं। उनके अनुमति के विना उनके सम्बन्ध में कैसे कुछ भी लिखा जा सकता है?
श्रीमती राधारानी की और भी कई लीलायें हैं। यदि वे चाहें और मुझे अपना कृपाशीर्वाद दें तो शायद भविष्य में उसे भी प्रकाशित कर सकें।
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