गीता सर्वशास्त्रमयी है । गीतामें सारे शास्त्रोंका सार भरा हुआ है । इसे सारे शास्त्रोंका खजाना कहें तो भी अत्युक्ति न होगी । गीताका भलीभांति ज्ञान हो जानेपर सब शास्त्रोंका तात्त्विक ज्ञान अपने -आप हो सकता है, उसके लिये अलग परि श्रम करनेकी आवश्यकता नहीं रहती ।
महाभारतमें भी कहा है -' सर्वशास्त्रमयी गीता ' ( भीष्म० ४३ । २) परन्तु इतना ही कहना पर्याप्त नहीं है । क्योंकि सारे शास्त्रोंकी उत्पत्ति वेदोंसे हुई, वेदोंका प्राकट्य भगवान् ब्रह्माजीके मुखसे हुआ और ब्रह्माजी भगवान्के नाभि -कमलसे उत्पन्न हुए । इस प्रकार शास्त्रों और भगवान्के बीचमें बहुत अधिक व्यवधान पड़ गया है । किन्तु गीता तो स्वयं भगवान्के मुखारविन्दसे निकली है, इसलिये उसे सभी शास्त्रोंसे बढ़कर कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी । स्वयं भगवान् वेदव्यासने कहा है -
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै शास्त्रसंग्रहै: ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिसृता ।।
'गीताका ही भली प्रकारसे श्रवण, कीर्तन, पठन -पाठन, मनन और धारण करना चाहिये, अन्य शास्त्रोंके संग्रहकी क्या आवश्यकता है? क्योंकि वह स्वयं पद्मनाभ भगवान्के साक्षात् मुखकमलसे निकली हुई है।
गीता गंगासे भी बढ़कर है । शास्त्रोंमें गंगास्नानका फल मुक्ति बतलाया गया है । परन्तु गंगामें स्नान करनेवाला स्वयं मुक्त हो सकता है, वह दूसरोंको तारनेका सामर्थ्य नहीं रखता । किन्तु गीतारूपी गंगामें गोते लगानेवाला स्वयं तो मुक्त होता ही है, वह दूसरोंको भी तारनेमें समर्थ हो जाता है । गंगा तो भगवान्के चरणोंसे उत्पन्न हुई है और गीता साक्षात् भगवान् नारायणके मुखारविन्दसे निकली है । फिर गंगा तो जो उसमें आकर स्नान करता है उसीको मुक्त करती है, परन्तु गीता तो घर-घरमें जाकर उन्हें मुक्तिका मार्ग दिखलाती है । इन्हीं सब कारणोंसे गीताको गंगासे बढ़कर कहते हैं ।
गीता गायत्रीसे भी बढ़कर है । गायत्री-जपसे मनुष्यकी मुक्ति होती है, यह बात ठीक है; किन्तु गायत्रीजप करनेवाला भी स्वयं ही मुक्त होता है, पर गीताका अभ्यास करनेवाला तो तरन-तारन बन जाता है । जब मुक्तिके दाता स्वयं भगवान् ही उसके हो जाते हैं, तब मुक्तिकी तो बात ही क्या है। मुक्ति उसकी चरणधूलिमें निवास करती है । मुक्तिका तो वह सत्र खोल देता है ।
गीताको हम स्वयं भगवान्से भी बढ़कर कहें तो कोई अत्युक्ति न होगी । भगवान्ने स्वयं कहा है-
गीताश्रयेऽहं तिष्ठामि गीता मे चोत्तमं गहम् ।
गीताज्ञानमुपाश्रित्य त्रीँल्लोकान् पालयाम्यहम् । ।
'मैं गीताके आश्रयमें रहता हूँ गीता मेरा श्रेष्ठ घर है । गीताके ज्ञानका सहारा लेकर ही मैं तीनों लोकोंका पालन करता हूँ ।
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