आभार
धरती पर मनुष्य का अस्तित्व अनगिनत शरीरी, अशरीरी शक्तियों के अनुदान का प्रतिफल है। उसमें भी सार्थक जीवन व्यतीत कर पाना तो वन्दनीयों की उदार कृपावृष्टि का साक्षात् पर्याय है। ऐसे में कैसे और किसका-किसका आभार व्यक्त किया जाय? सोचते हुए बुद्धि चकराने लगती है। "को बड़ छोट कहत अपराधू।" माँ का किन शब्दों में आभार व्यक्त किया जाय, समझ से परे है। यही बात पिता पर भी लागू होती है। एक धरती है तो दूसरा अनन्त आकाश। श्रीगुरु एवं गुरु परम्परा की बात करें, तो स्वात्म स्वरूप होकर निज अस्तित्व का अविभाज्य अंग बन चुके हैं। जो कुछ भी खाया-पीया सप्तधातु में परिणत हो शरीर का हिस्सा बन गया। जो गुरुजनों से सुना-गुना, मन-मस्तिष्क और आत्मा का हिस्सा बन गया। अन्यता हो तब तो आभार प्रकटन हो। अन्यता तो विगलित होकर अनन्यता बन गयी। भला अनन्यचित्तत्व की दशा में आभार संभव हो भी कैसे सकता है? वैसे भी श्रीगुरु स्वयम् मंत्र रूप हो शिष्य की सुप्त आत्मा में प्रवेश कर उसे जगाने का पुरुषार्थ घटित करते हैं। निज गुरु से महाषोडशी की दीक्षा मिली। द्वारिका शारदापीठाधीश्वर जगत्गुरु शंकराचार्य महाभाग से इससे भी पूर्व पंचदशी की बीजात्मक दीक्षाप्राप्ति का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त जगन्नाथपुरी पीठाधीश्वर जगत्गुरु शंकराचार्य महाभाग के चरणों में बैठकर बहुत कुछ जानने, समझने का सुअवसर प्राप्त हुआ। छात्र जीवन में दर्शन एवं अन्यान्य विषयों के अनेकानेक उद्भट विद्वानों का गुरु-स्वरूप में आशीर्वाद प्राप्त हुआ। ऐसे में यदि कोई गुरुजन छूट गये तो बहुत बड़ा अपराध होगा।
भूमिका
सच्चिदानन्द रूपोऽहं प्रकाशः परमार्थतः। इच्छा ज्ञान क्रिया शक्त्या विभामि विश्व रूपकम् ।। एकमात्र परब्रह्म सच्चिदानन्द ही परात्पर तत्त्व है। वही इच्छा, ज्ञान, क्रिया रूप त्रिगुणात्मिका शक्ति के प्रताप से विश्व रूप में भावित होता है। इच्छा मन की एक तरंग है। मन का एक भाव है। मन ज्ञानात्मक है। विषय संसर्ग से ज्ञान ही वृत्तिरूपता ग्रहण करता है। वृत्तियाँ ही भाव अथवा विचार हैं। अतः विचार, एक अर्थ में ज्ञानांश हैं, सीमित ज्ञान हैं। विचार अव्यक्त हैं। व्यक्त विचार ही ध्वनि अथवा शब्द हैं। शब्दना से पूर्व ज्ञान अव्यक्त है। अव्यक्त से व्यवहार नहीं चलता। व्यवहार और व्यक्तता अभेदार्थक है। वृत्ति शब्द वर्तन के अर्थ में प्रयुक्त होता है, जिसको सरल शब्दों में व्यवहार भी कहते हैं। ज्ञान में वृत्यात्मकता न हो तो व्यवहार संभव नहीं हो सकता। समस्त मातृकाजाल वृत्तियों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। वृत्तियाँ वायु की क्रीड़ा हैं यह भी सुचिन्तित है।
जो परम अव्यक्त है वह अद्वैत है। जो प्रथम व्यक्त है वही लिंग है। अव्यक्त का पहला उपलब्ध चिन्ह लिंग संज्ञक हुआ। यही अर्धनारीश्वर है क्योंकि व्यक्त वही हो सकता है जो उपाधि से युक्त हो। उपाधि से युक्त होते ही द्वैत आ गया। एक उपाधि और दूसरा उपाधेय। शब्दध्वनि उपाधि है। ज्ञान उपाधेय है। यही भर्तृहरि का "अनुविद्धमिवज्ञानं" है जो कि प्रकट होने के लिये अनिवार्यतः शब्दों की सहायता लेता है। जब संसार बनता है तो अद्वैत सत्ता एक तक सीमित नहीं रहती। वह अनेक बन जाती है।
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