यशःशेष स्वनामधन्य परमार वंशीय अद्वितीय शक्तिशाली दुर्धर्ष योद्धा बाबू कुँवर सिंह क्षत्रिय कुलोद्भुत संपन्न 1857 के अमर सेना नायक थे, जिनकी चिन्तनगर्भित आभा सदियों बीत जाने के बाद आज भी बिल्कुल उसी रूप में देदीप्यमान दिखती है। जब हम बाबू कुँवर सिंह का नाम सुनते हैं या लेते हैं तो मन से आलस्य और कायरता वैसे ही भाग जाती है, जैसे सिंहराज की गर्जना सुनकर छोटे-छोटे पशु-गण भाग खड़े होते हैं। वस्तुतः अद्वितीय वीर स्वतंत्रता सेनानी, अप्रतिम त्याग की प्रतिमूर्ति, विशाल और विराट तथा अद्भुत वीरत्व भावना से परिपूर्ण बाबू कुँवर सिंह बिहार के एक ऐसे सबल सपूत हैं जिनकी ललकारती तलवार की छप-छप चाल और ताल के आगे दुश्मनों की एक नहीं चलती; वे भाग खड़े होते हैं और अपना पीछा छुड़ाने में ही अपनी भलाई समझते हैं।
1857 क्रांति के अग्रगण्य नेता बाबू कुँवर सिंह 80 वर्ष की उम्र में भी फुर्तीले और जवान दिखते थे । यह उस समय का दौर था, जब जन-आन्दोलन राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत एवं ब्रिटिश विरोधी आंदोलनों का सूत्रपात हो चुका था। इस आंदोलन का प्रभाव संपूर्ण भारतवर्ष में पड़ा था, जिसमें बिहार का नेतृत्व अकेले बाबू कुँवर सिंह कर रहे थे और उनका साथ दे रही थी झाँसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई। इन द्वय सेनानियों ने भारतीय धर्म, संस्कृति, विचारधारा एवं अध्यात्म के बल पर वह महनीय कार्य किया, जिसे अज भी हम याद करते नहीं अघाते। इनके संबंध में आज भी बच्चे, बूढ़े और जवान यह बात दुहराते हुए नहीं थकते कि-
'अस्सी वर्षों की बूढ़ी हड्डी में जागा-जोश पुराना था,
सब कहते हैं कुँवर सिंह जी बड़ा वीर मर्दाना था।'
वस्तुतः कुँवर सिंह पर पुस्तक लिखने वाले प्रसिद्ध विद्वान मथुरा प्रसाद दीक्षित ने न केवल इनके व्यक्तित्व की चर्चा की है, बल्कि इनके युगांतरकारी कृतित्व के बारे में भी अनेक दुर्लभ प्रसंगों की चर्चा की है, जिससे इस बात का पता चलता है कि बाबू कुँवर सिंह एक दयावान संकल्पशील, धर्मपरायण तथा ईमानदार व्यक्ति थे, जिनकी चिंता 'हिन्दुस्तान' के सम्मान तथा प्रभुत्व को बचाए रखने की अधिक थी और जिस कार्य में वे आजीवन संलग्न रहे, इसी के लिए वे जिए और इसी के लिए सर्वस्व न्योछावर करते हुए परलोक सिधारे। श्री दीक्षित ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'बाबू कुँवर सिंह' में बाबू कुँवर सिंह के जन्म एवं उनकी वंश परम्परा का विशद् वर्णन प्रस्तुत किया है, जो इस बात का प्रतीक है कि परमार वंशीय क्षत्रिय कुँवर सिंह के पूर्वज भी विभिन्न रूपों में समाज को शोषण-उत्पीड़न से बचाए रखने के लिए युद्ध करते रहे थे तथा समाज में अमन-चैन लाने के लिए दृढ़तापूर्वक संकल्प रत थे।
वस्तुतः ऐसे अशेष भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर योद्धा का जन्म बलिया जिले के सहतवार कस्बे में फसली सन् 1189 (1782 ई.) को हुआ था। इनकी माता का नाम 'पंचरतन' तथा पिता का नाम 'साहबजादा सिंह' था। इनका पारिवारिक जीवन बेहद सुखमय नहीं रहा। बचपन में आर्थिक संकटापन्न की स्थिति ने इन्हें और भी जुझारु चरित्र का व्यक्ति बना दिया। कहा जाता है कि इनके जन्म के समय अनेक तरह के पारिवारिक मुकदमें चल रहे थे, जिनके लिए रोजाना तारीखें पड़ती थीं तथा पैसे व्यर्थ में बर्बाद हो रहे थे। इसके साथ-साथ जगदीशपुर के भूपनारायण सिंह के साथ कथित दुर्व्यवहार के कारण भी इन्हें अपना पैतृक गाँव छोड़कर दलीपपुर रहने को विवश होना पड़ा था।
यद्यपि ये पढ़ने-लिखने में कुशाग्र बुद्धि के थे, तथापि पढ़ने-लिखने में इनका मन नहीं लगता था। उस समय आज की भाँति स्कूल-कॉलेज नहीं खुले थे, फलतः उनको पढ़ाने के लिए उनके पिता ने अपने घर एक 'मौलवी' को रख लिया था। एक बार की घटना है। एक दिन पाठ याद नहीं कर पाने के कारण मौलवी साहब ने बालक कुँवर सिंह का कान उमेठा तथा थोड़ी डाँट पिलाई। इस पर कुंवर सिंह नाराज हो गए और घर के कोने में पड़ी तलवार उठाकर मौलवी साहब को मारने दौड़ पड़े। डर से मौलवी साहब इधर-उधर भागने लगे। दौड़ते हुए वे झटपट उनके पिता की दालान पर जा पहुँचे जहाँ उनके पिता कोई जरूरी काम में मशगूल थे। उनके पिता ने मौलवी की इस शिकायत को सुनकर फौरन जवाब दिया- 'वाह मौलवी साहब, आप भी कमाल के आदमी हैं। लड़के ने पहली बार तलवार चलाकर आपके ऊपर वार किया और वह 'वार' आपने खाली जाने दिया। आप पढ़ाने लायक मौलवी नहीं ठहरे। आप उसे नहीं पढ़ा सकते । अब आप अपनी राह पकड़े, अब मेरे घर दूसरा मौलवी पढ़ाने आएगा। बाबू कुँवर सिंह के बचपन के इस प्रसंग से इस बात का पता चलता है कि वे शुरु से ही विद्रोही प्रकृति के व्यक्ति थे, जिन पर किसी का वश नहीं चलता था।
इसी तरह उनके व्यक्तित्व के कई पहलू थे, जो लोगों को बेहद प्रभावित करते थे। एक ओर कुसुम से भी अति कोमल थे, तो दूसरी ओर वज्र से भी अधिक कठोर थे। उन पर महाकवि कालिदास की ये पंक्तियाँ अक्षरशः चरितार्थ होती थीं- 'वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि ।' जहाँ वे कविवर निराला की तरह दानी थे, वहीं महामना मदन मोहन मालवीय की तरह सच्चे और ईमानदार। लेकिन अपने वजूद के लिए लड़ना उनकी आदत थी और जीवन का एक लक्ष्य भी था। प्रारंभ में उनकी शिक्षा-दीक्षा उर्दू में ही हुई साथ-साथ फारसी भी पढ़ी। आगे रुचि बढ़ी तो हिन्दी (देवनागरी) के प्रति भी रुझान हुआ और धीरे-धीरे संस्कृत की ओर भी उन्मुख हुए। इस तरह उनकी पढ़ाई-लिखाई मिली-जुली भाषाओं में हुई। वे हिन्दी भी अच्छी बोल लेते थे। फारसी की 'गुलिस्ताँ' उन्हें कंठाग्र थी। संस्कृत के श्लोक याद थे तथा उन पर सांस्कृतिक चिंतन एवं विचारधारा की स्पष्ट छाप देखने को मिलती है।
लेकिन इतना तो सत्य है कि बचपन की अनेकशः घटनाओं से यह पता चलता है कि उनमें पढ़ाई से अधिक रुचि घुड़सवारी, कुश्ती तथा खेलकूद में अधिक थी। पढ़ाई के समय में वे मल्ल-युद्ध तथा घुड़सवारी करते थे, किशोरावस्था में चितौड़ के जंगल में फूस का बँगला बनाकर रहते थे तथा सारा दिन आमोद-प्रमोद तथा शिकार खेलने में लगा देते थे।
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