मनुष्य होने के नाते हम कितनी ही चीज़ों का स्मरण करते हैं। हम अपने सुख के समय को याद करते हैं और अपने दुःख के समय को भी। हम अपने यथेष्ट कर्मों को याद करते हैं और उन कर्मों को भी जिन्होंने हमें पश्चाताप से भर दिया। हम अपने प्रियजनों को याद करते हैं और यहाँ तक कि उन अजनबियों को भी, जो गुज़रते हुए एक पल में, जीवन के बारे में हमें कुछ दिखा गये। स्मरण किए बिना हम जी ही नहीं सकते। जब ऐसी बात है तो उन चीज़ों को क्यों न याद करें जो हमारा उत्थान करती हैं, जिनके कारण हम संसार को अपना सर्वोत्तम योगदान दे पाते हैं?
अनौपचारिक प्रवचनों के इस प्रणोदित संग्रह में, गुरुमाई चिद्विलासानन्द हमारा ध्यान हमारे जीवन की उन महान चीज़ों की ओर आकृष्ट करती हैं जो स्मरण किये जाने योग्य हैं। श्री गुरुमाई हमें हमारी अपनी ही जन्मजात अच्छाई की याद दिलाती हैं, प्रेम देने और पाने की हमारी सुपात्रता की याद दिलाती हैं; वे हमें याद दिलाती हैं उन असाधारण आशीर्वादों की जो वसन्त ऋतु में महासागर की ओर तेज़ी से बढ़ती हुई उल्लसित सरिताओं की भाँति हमारे जीवन में प्रवाहित होते हैं। यह पुस्तक जपमाला के समान है और हमारे जीवन में जो कुछ सुन्दर व पावन है, यह उसका स्मरण करने की शक्ति को धारण किये हुए है।
लोग कहते हैं कि जब वे चमेली के पुष्पों की सुगन्ध लेते हैं तो वह उन्हें एक मनोरम लोक में पहुँचा देती है, सिद्धयोग ध्यान के मूल आश्रम, गुरुदेव सिद्धपीठ जैसे स्थान में पहुँचा देती है। वहाँ के भरे-पूरे उद्यानों में, चमेली की सुगन्ध वातावरण को अपनी मादकता से भर देती है। यह पुस्तक वैसी ही है। यह हमें उच्चतम के स्मरण तक पहुँचा देती है।
इस संग्रह में वे प्रवचन हैं जो वर्ष १९९७ के ग्रीष्मकाल में, श्री मुक्तानन्द आश्रम में सिद्धयोग ध्यान रिट्रीट के दौरान दिये गये थे।
पहले दो प्रवचन, गुरुपूर्णिमा सप्ताहान्त से हैं; गुरुपूर्णिमा, जुलाई माह में पूर्ण चन्द्र का समय होता है जब अनुग्रह के परम तत्त्व, श्री गुरु का सम्मान किया जाता है। तीसरा प्रवचन, रक्षाबन्धन यानी रक्षा के दिवस पर दिया गया था जो अगस्त माह में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। और अन्तिम प्रवचन, सितम्बर माह की अमावस्या पर, स्वामी मुक्तानन्द की दिव्य दीक्षा की पचासवीं वर्षगाँठ के सम्मान में दिया गया था
यह वह दिन है जब स्वामी मुक्तानन्द को अपने गुरु, भगवान नित्यानन्द से दीक्षा प्राप्त हुई थी।
श्री मुक्तानन्द आश्रम के बृहत् हॉल, शक्ति मण्डप में जब श्री गुरुमाई ने ये प्रवचन दिये तो उस समय जो अनेकानेक लोग वहाँ उपस्थित थे, उन्होंने यह आग्रह किया कि इन प्रवचनों को प्रकाशित किया जाये। अन्य बहुत से लोग, जिन्होंने इन प्रवचनों के बारे में सुना, उन्होंने भी यही गहन इच्छा प्रकट की। इन आग्रहों का सम्मान करने के लिए, और जो पाठक इन शब्दों को पहली बार पढ़ रहे हैं, उनकी ओर से भी, हमें अत्यन्त हर्ष है कि हम ऐसे ऐतिहासिक प्रवचनों को प्रकाशित कर उपलब्ध करा पाये हैं। ये प्रवचन अनेक लोगों के जीवन में कल्याणकारी रूपान्तरण पहले ही ला चुके हैं और निश्चित रूप से ऐसा आगे भी होता रहेगा। ऐसी शुभकामना है कि हर बार जब आप इन शब्दों को पढ़ें, तो इनसे आपको ठीक वही प्राप्त हो जिसकी आपको आवश्यकता है।
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