"सूरदास के काव्य में शुद्धाद्वैत" बंधुवर जयकिशनदासजी सादानी का हाल ही में लिखा ग्रंथ है। उनका आग्रह है कि मैं उसके संबंध में दो-शब्द लिख दूँ । उनका आग्रह शिरोधार्य है ।
श्री सादानीजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। व्यवसाय से कपड़े के व्यापारी होते हुए भी वे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के साहित्यकार हैं। हिन्दी सेवियों से अधिक उन्हें अंग्रेजी साहित्य के प्रेमी जानते और मानते हैं क्योंकि 'कामायनी', 'आँसू' और 'सूर' के पदों का अंग्रेजी में काव्यानुवाद प्रस्तुत करके उन्होंने देश में ही नहीं विदेशों में भी कीर्ति अर्जित की है। डॉ. प्रभाकर माचवे के साथ भारतीय संस्कृति (दो भाग) और प्रज्ञा-प्रदीप (एक भाग) जैसे वृहद् ग्रंथों का संपादन करके उन्होंने भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति को विश्व में उजागर किया है । आजकल वे 'एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डियन कल्चर' का आठ भागों में संपादन कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने भारतीय शिल्पकला और भारतीय चित्रकला पर भी हिन्दी में बोधवर्धक ग्रंथों की रचना की है।
संगीत उन्हें जन्मघूंटी में मिला है। ऐसे एक बहुज्ञ, बहुश्रुत एवं मेधावी लेखक के द्वारा 'सूर काव्य में शुद्धाद्वैत' का प्रणयन मेरी दृष्टि से हिन्दी जगत के लिए एक महत्त्वपूर्ण घटना है।
प्रत्येक ग्रंथ के प्रणयन के पीछे लेखक का कोई न कोई प्रयोजन अवश्य होता है। विश्व साहित्य के अध्येता सादानीजी ने इस विषय को क्यों चुना यह जिज्ञासा स्वाभाविक है । बंधुवर सादानीजी को मैंने सूरदास और शुद्धद्वैत पर व्याख्यान देने के लिए दिनांक ११ नवम्बर, १९९७ को भारतीय भाषा संस्कृति केन्द्र में आमंत्रित किया था। यह ग्रंत उसी व्याख्यान परिवर्धित लिखित रूप है। इस व्याख्यान के पूर्व उन्होंने सूरपदावली का अंग्रेज़ी में 'रोज़री ऑफ़ हिम्स्' नाम से अनुवाद किया था। सूरदास की पदावली का अंग्रेजी में अनुवाद करते समय उन्होंने निश्चय ही सूरसागर का मंथन करके कतिपय पद-रत्नों का संकलन किया होगा। अनुवाद करते समय, पुनः सूर-पदावली में निहित गहन दार्शनिकता, अगाध भक्तिभावना, अप्रतिम चित्रात्मकता और मनोमुग्धकारी संगीतात्मकता से उनका साक्षात्कार हुआ होगा, जिसे व्यक्त करने की बलवती इच्छा ने उन्हें इस ग्रंथ के प्रणयन के लिए बाध्य किया होगा । प्रयोजन चाहे जो रहा हो, यह ग्रंथ सूर-साहित्य के रसिक-मधुप का मधुर गुंजार है, जिससे सूरकाव्य के अध्ययन की कई नई दिशाएँ उद्घाटित हुई हैं ।
हिन्दी में सूरदास पर लिखे गए ग्रंथों की कमी नहीं है, किन्तु उनमें से अधिकांश ग्रंथ या तो उपाधियों के लिए लिखे गए शोध-प्रबंध हैं या फिर छात्रोपयोगी समीक्षात्मक ग्रंथ हैं। स्वांतःसुखाय ज्ञान के विकास हेतु लिखे गए ग्रंथों की संख्या सीमित है, इसीलिए एतद्विषयक भारी भरकम ग्रंथों की भीड़ में इस नातिदीर्घ ग्रंथ का अपना वैशिष्ट्य एवं महत्त्व है ।
महाकवि सूरदास का काव्य भारतीय साहित्य की विशिष्ट एवं अद्वितीय उपलब्धि है। यह तो काव्याकाश में चमकता हुआ जाज्वल्यमान सूर्य है। महाप्रभु श्री वल्लाभाचार्य से मिलने एवं शिष्यत्व ग्रहण करने के पश्चात् उनकी काव्य प्रतिभा आध्यात्म के चरम शिखर पर पहुँच गई। महाभारत लिखने के पश्चात् व्यासदेव ने समाधि में, भगवान की जिन-जिन लीलाओं का दर्शन किया उन सब को उन्होंने समाधि भाषा में श्रीमद्भागवत पुराण में निरूपित किया है। यह तो विद्वजनों की परीक्षा का ग्रंथ है 'विद्यावन्तं भागवते परीक्षा' । यह ज्ञान और भक्ति के समन्वय का अनन्यतम ग्रंथ है। इसी महान ग्रंथ को महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य ने अपने "सुबोधिनी" टीका सहित सूरदास को सुनाया। इसके पूर्व सूरदास को भगवद्लीलाओं की जानकारी नहीं थी। श्रीमद्भागवत सुनने के बाद ही वे इनसे परिचित हुए। कवि सूरदास पर इन लीलाओं का बड़ा प्रभाव पड़ा। उनकी आंधरी आँखों को दिव्य ज्योति प्राप्त हुई । उन्हें भगवान की लीलाओं का साक्षात् दर्शन होने लगा। वे तादृशी कवि हो गए। गुरु आज्ञा के अनुरूप श्रीमद्भागवत को आधार बनाकर सूरदास ने "सूरसागर" के रूप में विशाल काव्य की संरचना की। यह उनका अत्यन्त मौलिक कृतित्व है जिसमें उनकी उत्प्रेक्षाएँ, भाव प्रवणता, अनुपम उपमाएँ प्रतीक एवं बिम्ब योजना का दर्शन होता है।
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