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सूरसागर के बिम्ब: Sursagar Ke Bimb

$16
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: RACHNAKAR PRAKASHAN, PURNIA
Author Kavita Sinha
Language: Hindi
Pages: 192
Cover: HARDCOVER
9.0x6.0 Inch
Weight 330 gm
Edition: 2004
ISBN: 818776113
HCA796
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Book Description

पुस्तक परिचय

 

सूरसागर के बिम्ब कविता सिन्हा ने साहित्य तथा संस्कृति कर्मी के रूप में अपना एक अलग ही स्थान बनाया है। कविता, कहानी, आलोचना तथा फिल्मों के लिए पटकथा लेखन, सभी में ये समान अधिकार रखती हैं। सूरसागर के बिम्ब इनकी अद्यतन खोजपरक रचना है। वैसे तो सूरसागर में ही डुबकी लगा पाना अपने आप में एक जटिल कार्य है, लेकिन सूरसागर से बिम्बों की तलाश तथा उन बिम्बों को सरलीकृत करके पाठकों तक पहुँचाना ठीक वैसे ही है, जैसे समुद्र में डुबकी लगा कर पहले सीपियों की तलाश, फिर एक-एक सीपी से ढूँढ़ ढूँढ़कर मोतियों को निकाल लाना। लेकिन जिस कुशलता के साथ इन्होंने इस दुरुह कार्य को भी अंजाम दिया है. वह निश्चित तौर पर पाठकों को बहुत कुछ दे पाने में समर्थ है। सूरदास को समझने के लिए तूरसागर को तथा खास तौर पर उसके बिम्बों को समझना अनिवार्य है। और जिसके लिए यह कृति पूर्णतः उपयुक्त है। खास तौर पर उन शोधार्थी छात्रों के लिए, जिन्हें 'सूरदास' में रुचि है।

 

लेखक परिचय

 

डॉ० कविता सिन्हा जन्म : 11-08-1963 शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिन्दी) एवं पी. एच. डी प्रकाशन विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ, गीत, गजलें, कहानियों एवं आलेख प्रकाशित ।अभिरुचि निर्माण। लेखन, नृत्य, अभिनय एवं फिल्म पुरस्कार : सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए अनेक पुरस्कार। अन्य : दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण 'हमारे लोक नृत्य', 'मियां निखट्टू, 'अनजाने-जाने-पहचाने', 'एक व्यक्तित्व-ब्लू इमाम (डॉक्युमेन्ट्री). 'मीर कल्लू की गवाही' आदि टेलीफिल्मों का निर्माण एवं उनमें अभिनय । सम्प्रति : एस. मूवी की संस्थापिका एवं निर्मात्री तथा आकाशवाणी, हजारीबाग में उद्घोषिका ।

 

प्रस्तावना

 

भारतीय वाड्.मय में कृष्ण की सर्वाधिक व्याप्ति है। संस्कृत साहित्य का एक बहुत बड़ा भाग श्री कृष्ण के चरित्र से आच्छादित है। श्री मद्भागवत् के दशम् स्कंध की कथा से प्रेरित होकर कृष्ण भक्ति के प्रति अनेक आचार्य आकर्षित हुए। उन्हीं में एक प्रसिद्ध नाम वल्लभाचार्य का है। उन्होंने 'अष्टछाप' की स्थापना कर साहित्यिक रचनाओं के द्वारा कृष्ण भक्ति के प्रचार-प्रसार के लिए अपने दार्शनिक सिद्धान्त की छाया में सूरदास, नंददास आदि आठ कवियों को दीक्षित किया, जिनमें सूर की प्रधानता सर्वोपरि है। सूर की रचनाओं में सूरसागर अपने विशाल आकार और साहित्यिक प्रौढ़ता तथा रसमयता के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध है। सूरदास और 'सूरसागर' पर जितने शोध कार्य हुए हैं, उनमें अभी तक बिम्ब की दृष्टि से कार्य नहीं हुआ था। बिम्ब का प्रचलन और उसकी साहित्यिक स्थापना में पर्याप्त विलंब हुआ। इसे पाश्चात्य वस्तु मानकर, इमेज का पर्याय मानकर, इस पर आलोचकों ने विशेष ध्यान नहीं दिया। बीसवीं शताब्दी के तीन-चार दशक बीतते-बीतते आचार्य शुक्ल ने अपने लेखों में इसकी चर्चा की। कविता में विम्ब पर एक निबंध भी लिखा। परिणामतः केदारनाथ सिंह जैसे कवि का आविर्भाव हुआ। सूरदास और 'सूरसागर' पर अनेक शोध कार्य हुए हैं। डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा, डॉ. मुंशीराम वर्मा, डॉ. जगदीश गुप्त आदि ने इनके साहित्यिक और साधना पक्ष पर शोध कार्य सम्पन्न किया है। डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा ने तो 'सूरसागर' के लिए अपना जीवन ही अर्पण कर दिया। सूर संबंधी शोध ग्रंथों, आलोचना और सूर के अनेक पदों को पढ़ने के बाद इनकी सहजता और भक्तिपूर्ण रचनाओं से मेरा आकर्षण बढ़ता गया। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है  श्रृंगार भक्ति, दर्शन, अध्यात्मवाद, काव्यशास्त्रीय रस आदि पर कार्य हो चुके थे। किर भी. महाकवि के सूरसागर में असंख्य काव्यशास्त्रीय उपकरणों के मोती है, जो प्राप्त किये जा सकते हैं। सूरसागर के बिम्ब इस विषय के चयन से 'सूरसागर' के साहित्यिक पक्ष का विम्बात्मक अध्ययन परिलक्षित होता है। सूर जन्मांध थे, फिर भी उनके चाक्षुष बिम्व अत्यन्त सहज एवं प्रभावशाली है। बिम्बों की विचारधारा के मध्य सूरसागर को रखकर इस दृष्टि से उस पर विचार करना एक नवीन कार्य है। ऐसा इसलिए कि संवेदनाओं के विचार से, आधारभूत प्रकृति के विचार से सूरसागर में बिम्बों को ढूंढ़कर निकालना, उसका विश्लेषन करना नितांत एक गंभीर और प्रेरणात्मक कार्य है। विद्यालय के पाठ्यक्रम से ही सूरदास के पदों के प्रति मेरा आकर्षण रहा, उनकी सहज और भावुकतापूर्ण काव्य शैली की और मेरा रुझान रहा, यही कारण है कि स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में, मैंने विशिष्ठ पत्र के रूप में सूरदास का विशेष रूप से अध्ययन किया। इस कम में सूर काव्य के अनेक पक्षों से मेरा गहन परिचय हुआ। भक्ति, दार्शनिकता, श्रृंगार, वात्सल्य आदि विभिन्न क्षेत्रों में सूरदास के प्रति उपजे श्रद्धा भाव और आकर्षण के कारण अपने शोध के लिए सूरसागर के बिम्ब विषय चुनना इसी की परिणति है। इस अध्ययन की रूप रेखा बनाते समय यह सुविधाजनक लगा कि कविता में बिम्ब विधान के संबंध में एक सैद्धांतिक भूमिका प्रस्तुत कर दी जाए, यह इसलिए भी सुविधापूर्ण है कि इससे अध्ययन के ब्यौरे में विचार सूत्र आधारभूत रूप में कारगर है।

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