भूमिका
प्रस्तुत 'सुवर्ण-माला' नामक इस लघु ग्रन्थ में काग्युद परम्परा की चार प्रमुख व आठ लघु परम्पराओं में से एक 'ड्रगपा काग्युद' परम्परा एवं इसी परम्परा के सम्भार क्षेत्र में अन्तर्भुक्त प्रायः एक सौ नौ सिद्ध, साधक, योगी एवं विद्वानों की जीवनी तथा प्राणिकल्याण के लिए उनके द्वारा प्रदत्त योगदान का प्रतिबिम्ब स्वरूप संक्षिप्त विवरण विद्यमान हैं। उपरोक्त काग्युद परम्परा भी तिब्बत में विकसित चार प्रमुख बौद्ध परम्पराओं में से एक है। इस परम्परा का इतिहास प्रायः एक हजार वर्ष पुराना है और उसके मूल के इतिहास ढाई हज़ार वर्षों से भी अधिक प्राचीन है। यह पद्धति छठी शताब्दी से मध्य भारत में प्रारम्भ हुई जब एक युवा राजकुमार तप करने के लिए बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे बैठ गया था एवं बाद में बुद्ध बनकर उठ खड़े हो गये। उसी से ही इसका सूत्रपात हुआ अर्थात् एक सुखी राजकुमार से प्रव्रजित साधक एवं उससे जगत के परम गुरु- ज्योतिर्मय बुद्ध का जीवन। आत्म-रूपान्तर की यह मौलिक प्रक्रिया निरन्तर भारत, तिब्बत एवं सम्पूर्ण विश्व को प्रेरित करते आ रहे हैं। बुद्ध ने अपने प्रयास से जिस बोधि या परम ज्ञान का आविष्कार किया था, डुगपा काग्युद परम्परा के साधक एवं सिद्धगण भी उन इच्छुकों, जो उसीप्रकार अपनी मुक्ति एवं स्थायी सुख की कामना करते हैं, को उसी ज्ञान का मार्गदर्शन करते हैं। महायान परम्परा के अनुसार भावी बुद्ध ने अपने अन्तिम जन्म लेने के लिए राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के रूप में तुषित देवलोक से अवतरित होकर शाक्य राज्य की रानी महामाया के गर्भ में प्रवेश किया था। जिस रात्रि में उन्होंने गर्भ में प्रवेश किया, उसी रात को उनकी माता ने छः दाँत वाले एक सफेद हाथी का स्वप्न देखा। कालान्तर में एकबार जब रानी महामाया कपिलवस्तु में स्थित वासस्थान से पित्रालय की ओर जा रही थी, उन्होंने लुम्बिनी नामक जनपद के निकट एक बगीचे के पेड़ की शाखा पकड़कर बिना किसी कठिनाई से उस राजकुमार को जन्म दिया। तत्कालीन रीति-रिवाज के अनुसार बालक के भविष्य जानने के लिए उसका कायलक्षण के विश्लेषण हेतु ऋषि मुनिगण को आमन्त्रित किया गया। उन्होंने उस बालक के दो सम्भाव्य घटनाओं की भविष्यवाणी की। यथा- 1. यदि वे राजप्रासाद में रहते हैं, तो वे एक चक्रवर्ती सम्राट होंगे एवं राज्य की विस्तारता तथा यश में अपने पिता का भी अतिक्रम करेंगे । 2. बदि वे राजप्रासाद को त्यागकर प्रव्रजित मुनि हो जाते हैं, तो वे एक बुद्ध होंगे अर्थात् अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि को प्राप्त करने वाले बुद्ध। भविष्यवाणी के फलस्वरूप युवा राजकुमार के पिता राज्य का भविष्य निश्चित करने में चिन्तित हो गये। राजा ने राजकुमार को सभी प्रकार की अप्रिय अवस्थाओं एवं अनुभवों से दूर रखा ताकि वह राजकुमार राजकर्तव्य से विमुख न हो जाए। साथ ही युवा राजकुमार को राजकीय जीवन से आबद्ध रखने के लिए नानाप्रकार से तुष्ट करने लगे। राजप्रासाद की दीवार के बाहर स्थित संसार के सम्बन्ध में जानने के लिए वे राजकुमार उत्सुक हो उठे और सही अवसर को देखकर वे एकदिन नगर देखने के लिए निकल पड़े। उसके बाद वे रक्षक बिना ही निकल पड़ते थे। शीघ्र ही वे मानव जीवन के अविच्छिन्न अंग स्वरूप तीन महादुःख, यथा- रोग, जरावस्था एवं मृत्यु से अवगत हुए। तत्पश्चात् एक दिन एक प्रव्रजित साधु से उनकी भेंट हुई। उनके सान्निध्य से सिद्धार्थ के मन में एक नयी सम्भावना का जन्म हुआ अर्थात् वे अवगत हुए कि जो इच्छुक है उनके लिए इस दुःख कष्ट का समाधान हो भी सकता है। इसके बाद एक रात अन्तःपुर में आमोद-प्रमोद के बाद उनके मन में निस्सार रूपी आनन्द को परित्याग करने की तीव्र भावना जागी। उन्होंने उसी रात गृहत्याग करने का संकल्प ले लिया। रात के अन्धेरे में निष्क्रमण हेतु वे सारथि की सहायता से निर्विघ्न होकर निकल पड़े। कोई भी उन्हें नहीं देखा। घोड़े के क्षरों की आवाज़ कोई न सुन ले, उसके लिए देवतागण उनके क्षुरों को उठाकर रखे। उन्होंने कपिलवस्तु की ओर अन्तिम बार के लिए देखा और प्रतिज्ञा की कि जबतक वे इस जन्म-मृत्यु की श्रृंखला से सम्पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो जाते तबतक वे नहीं लौटेंगे।
About The Author
Born in a middle class family in West Bengal, Professor (Dr.) Sanjib Kumar Das was educated at Chandpara Nimna Buniyadi Vidyalaya (Amtalå) and then in Gobardanga Khantura High School. Later, he went to Darjeeling and took shelter in a Buddhist Monastery (Thupten Sanga Choling Monastery) where he worked as a helper of mason for about a year. In course of time, he was admitted in the branch school of the monastery where he studied upto standard VIIL Subsequently, he was sent to CIHTS, Sarnath 1989 for higher studies. Getting admission, he obtained B.A. and M.A., pursuing upon Tibetan Buddhism, Tibetan Language, Sanskrit and other prescribed subjects. In 1998, he was awarded with the Kashi Naresh Gold Medal for being the best student of 1998. After completing M.A., he started doing his Ph.D. which he completed in 2002. In 1999, he was invited to Taiwan as a Translator from Tibetan into English where he stayed for about five months. In 2002, he got a temporary job in the Translation Department in the CIHTS, Sarnath and simultaneously a permanent in CIBS, Leh where he worked for about six years. In 2008, he got a new job in Visva-Bharati, Santiniketan where he is working now on the post of Professor in the Department of Indo-Tibetan Studies. He was awarded with Bharat Siksa Puraskara' in 2002. Prof. Das served as a Vice-Principal, Bhasha-Bhavana, Visva-Bharati for two years, Head of the Department (HoD) for more than six years and Director Incharge of the Centre for Buddhist Studies, Visva-Bharati for three years. He is also associated with several institutions as its member. He translated, edited, restored, compiled and composed more than twenty-five books which have been published by different universities, institutions and publishers in India. Similarly, his more than thirty research papers have been published in different national and international journals, his Bengali translations of more than hundred articles on Buddhist Studies are uploaded in a website (studybuddhism.com) as well as his English translation of two Prajñápáramitä Texts are uploaded by 84000, USA. Apart from translation, compilation, restoration and editing work, Prof. Das attended numbers of Local, National and International seminars, and presented papers.
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