भूमिका
म *ध्यकाल में संगीत जगत में धूमकेतू की तरह उदित हुए विलक्षण गायक तानसेन की कहानी हमारे ऐतिहासिक द्वंद के कोलाहल में ठीक से ना तो कही गई और ना ही लिखी गई। मुगल शासनकाल के दौर में जन्मे और मुगल दरबार की शोभा रहे रामतनु पाण्डेय जो बाद में तानसेन के नाम से प्रसिद्ध हुए, मात्र संगीत की महफिलों और किस्से, कहानियों में समेट दिए गए। तानसेन की संगीतविधा का तो खूब गुणगान किया गया, लेकिन स्थिर संगीत वाले संगीतज्ञ का जीवन कितना भटकावपूर्ण रहा, उस पर रोशनी डालने पर परहेज किया गया।
पद्मश्री के. के. मुहम्मद प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार, पुरातत्वविद्, क्षेत्रीय निदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) समकालीन इतिहासविदों ने भारतीय संस्कृति के निरंतर निखरते स्वरूप का अपने अनुसार चित्रण किया। मुगल दरबार के अपने गुण-दोष हो सकते हैं। हम उसे नजरअंदाज भी कर दें तो भी समकालीन और आधुनिक इतिहास के वक्ता इस जवाबदेही से नहीं बच सकते कि ऐतिहासिक विमर्श में देश की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान क्यों नहीं किया गया? क्या, महज इसलिए कि देश की संस्कृति सैकड़ों वर्ष के इस्लामिक आक्रमण के बाद भी अपना भारतीय चरित्र बरकरार रखने में सफल रही है। हमारा संगीत महाकाव्य, साहित्य से लेकर चित्रकला, वास्तुकला, स्थापत्य और हस्तशिल्प को सहेजे हुए है। कितना दुखःद है कि सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उत्तरदायित्व का कार्य न्यायपूर्वक नहीं किया गया। इसके सबसे बड़े उदाहरण तानसेन हैं। जिनके संगीत का रस खूब निचोड़ा गया। उसे इस तरह से परोसा गया जैसे मुगलों से पहले भारत में संगीत के कद्रदान ना के बराबर थे। संगीत और संगीतकारों की समझ मुगल शासनकाल में ही विकसित हुई। लेकिन इतिहास की वीथिका (मार्ग) कभी सदा के लिए बंद नहीं रहती। लोगों की जिज्ञासा और अन्वेषण एक ना एक दिन इतिहास के धुंधले पर्दे में ढंके गए सत्य को खोजकर समाज के सामने रख ही देता है। तानसेन का ताना-बाना पुस्तक इसकी बानगी है। मेरा मध्यप्रदेश से जुड़ाव 20 वर्षों से लगातार बना हुआ है। वहां काम के सिलसिले में मैंने कई वर्ष गुजारे हैं। मेरा उस ग्वालियर से भी गहरा रिश्ता है, जहां तानसेन ने अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण समय बिताया है। मेरा सौभाग्य रहा कि तानसेन के समाधि स्थल का जीर्णोद्धार कराने का अवसर मिला। ग्वालियर किला, बटेश्वर मंदिर, गढ़ी पढ़ावली जैसे महत्त्वपूर्ण पुरातन स्थलों को फिर गरिमा प्रदान का अवसर मिला। मेरे समय पर आरंभ कराया गया बटेश्वर विष्णु मंदिर तथा आसपास के अन्य स्थलों के जीर्णोद्धार का काम अभी भी चल रहा है। यह सच है कि तानसेन जैसे पथिक विरले होते हैं। वामपंथी इतिहासकारों द्वारा तानसेन की जीवन यात्रा को वास्तविक स्थान देने में कोताही बरती गई। इस कदम ने कई पीढ़ियों को विरासत की जानकारी से वंचित रखने का काम किया। जिस दौर में तानसेन बांधवगढ़, वृंदावन, ग्वालियर और फिर मुगल बादशाह अकबर के दरबार में भारतीय शास्त्रीय संगीत का जादू बिखेर रहे थे, वह काल भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में भारी उथल-पुथल और झंझावातों का था। तानसेन के स्वर लहरी की गूंज जितनी विस्तृत होती गई, उनका जीवन उसी तरह से लगातार सिमटता चला गया। प्रतिकार के भाव से अछूता उनका मन हर तरह की परिस्थिति में स्वयं को ढाल लेता था। संगीत ही उनका धर्म था और साधना ही उनकी पूजा थी। हर क्षण संगीत में स्वयं को डुबा देने वाले तानसेन को प्रसिद्धि तो खूब मिली, लेकिन इसके साथ उनका जीवन नदी की धारा की तरह प्रवाहमान रहा।
लेखक परिचय
तानसेन का ताना-बाना" राकेश शुक्ला की दूसरी पुस्तक है। जब उनके सामने काम के तमाम अच्छे अवसर थे, तब उन्होंने पत्रकारिता को चुना। पिछले 29 वर्ष से वह सतत् लेखन कार्य कर रहे हैं। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र के अलावा समसामयिक और राजनीतिक क्षेत्र की खबरों पर अपनी अलग पहचान बनायी है। उनकी पौराणिक और पुरातन स्थलों में विशेष रुचि है। इसी के चलते देशभर के पौरणाकि महत्व के लगभग 800 शिवालयों की तथ्यात्मक जानकारी एकत्र करने की उपलब्धि उनके साथ जुड़ गई है। 2020 में दर्शनम् संस्था बनाकर वह भारत की सांस्कृतिक विरासत पर काम कर रहे हैं। 1995 में उनका सतना से पत्रकारिता का सफर आरंभ हुआ जो अनवरत चल रहा है। 2003 में वह दिल्ली आ गए और कई प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में कार्य करने के बाद अब स्वदेश समूह से जुड़े हुए हैं। मध्यप्रदेश के सतना जिले में जन्में और पले बढ़े राकेश शुक्ला बी. एससी, एल.एल.बी. और बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में स्नातक हैं। उनके पिता स्वर्गीय श्री भूपदेव शुक्ला शिक्षक थे और माता स्वर्गीय श्रीमती विभा शुक्ला गृहणी। 2022 में उनकी पहली पुस्तक "दिल्ली में हिन्दू राजवंश का स्वर्णिम काल" आई। सुरुचि द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में दिल्ली का पांच हजार वर्ष का इतिहास वर्णित है।
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