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तंत्री वाद्य प्रयाण- Tantri Vadya Prayan

₽1932
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: GRACIOUS BOOKS
Author Priyanka Arora, Sandeep Kaur
Language: Hindi
Pages: 112
Cover: Hardcover
9.00x6.00 inch
Weight 254 gm
Edition: 2025
ISBN: 9789392058875
BA2497
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Book Description

 

पुस्तक परिचय


वाद्यों की विविध श्रेणियां अपने वैशिष्ट्य को संगति एवं एकल वाद्य के रूप में प्रतिपादित करती आई है, जिसमें तंत्री वाद्यों की सत्ता प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक क्रमशः आध्यात्मिक अनुष्ठानो, मंगल कार्यों एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों आदि में अपना सर्वोत्तम अवदान दे रही है। वाण, गोधा वीणा, गर्गर, कर्करी, काण्ड, अपघाटलिका, अलाबु, कपिशीर्णी, पिशील, क्षेणी, सप्ततन्त्री, वल्लकी, परिवादिनी, विपंची, कच्छपी, मतकोकिला, चित्रा, एकतन्त्री, रुद्रवीणा, सितार, सरोद, वॉयलिन आदि तंत्री वाद्य इसकी यात्रा की गाथा के प्रत्यक्ष साक्षी होने के साथ-साथ सूत्रधार भी हैं। अपनी इस यात्रा में तंत्री वाद्यों ने इतिहास के पन्नों को जीया है और कई परिवर्तनों से निकल कर नए रूपों में अपने अस्तित्व तक्षो सांगीतिक कला में स्वयं के महत्त्व को कायम रखा। 'तंत्री वाद्य प्रयाण' इसी यात्रा के विवेचन का प्रयास मात्र है, जिसे चार अध्यायों में अभिव्यक्त किया गया है।
पहला अध्याय वाद्यों के परिचयात्मक अध्ययन का है, जिसमें संगीत कला को विवेचित करते हुए वाद्य शब्द के अर्थ एवं उसके महत्त्व को दर्शाया गया है। वाद्य, संगीत की गायन और नृत्य कला में उतने ही उपयोगी तथा महत्त्वपूर्ण है, जितने शरीर के लिए प्राण। अतएव दोनों में संगति तथा सुर मिलान हेतु वाद्यों की भूमिका अत्यन्त आवश्यक है। इसका महत्त्व प्राचीन ग्रन्थों में कई प्रसंगों में आलोकित भी हुआ है। वाद्यों के महत्त्व से ज्ञात होने के लिए इसके विभाजन की चर्चा भी इसी अध्याय के अन्तर्निहित की गई है। तंत्री, अवनद्ध, सुषिर व घन वाद्यों की श्रृंखला में वर्णित वाद्यों के उद्भव, संरचना एवं वैशिष्ट्य को प्रस्तुत किया गया है।
दूसरा अध्याय तंत्री वाद्यों के आरम्भ तथा विकास से सम्बन्धित है। इसमें इतिहास के पन्नों को पलटते हुए प्राचीन काल के वाङमय में निहित तंत्री वाद्यों के क्रम को आबद्ध किया गया है। भारतीय जीवन, संस्कृति, साहित्य और कला को केवल वर्तमान-परिप्रेक्ष्य में नहीं देख जा सकता। चूंकि ये सभी अन्तर्सम्बन्धित हैं, अतः इनमें से किसी एक को भी जानने, समझने के लिए वेदों, पुराणों, महाकाव्यों जैसे ग्रन्थों का आश्रय लेना अभीष्ट होता है। चूंकि आधुनिकता कहीं न कहीं प्राचीनता की नींव पर स्थिर होती है अतः इतिहास के झरोखे में झांके बगैर वर्तमान या आगामी समय की संकल्पना नहीं की जा सकती। तंत्री वाद्यों का आधुनिक रूप उनके पुरातन स्वरूप से ही अभिप्रेरित रहा है।

 

 

लेखक परिचय-1


डॉ. प्रिंयका अरोड़ा ने अपनी सम्पूर्ण शिक्षा अमृतसर से पूरी की है, जहां उन्होंने स्नातक की उपाधि के बाद बी.एड की डिग्री प्राप्त की। संगीत में रुचि को आगे बढ़ाते हुए इन्होंने दो विषयों सितार और तबला में स्नातकोत्तर किया। पी. एच.डी. की उपाधि के लिए भी तबला को ही विषय के रूप में चुना। अकादमिक प्राप्तियों के मार्ग में इनके हिस्से में कई सांगीतिक शोध पत्रों का और संगीत सम्बन्धी तीन पुस्तकों का लेखन एवं प्रकाशन आता है। इसके अतिरिक्त एक अन्य पुस्तक पर काम चल रहा है। इन्होंने कई संगोष्ठियों, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के सेमिनारों में हिस्सा लिया है तथा कई सांगीतिक प्रतियोगिताओं में निर्णायक की महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है। इनके परिवार में यह पहली सदस्य एवं महिला हैं, जिन्होंने संगीत को चुना और तबला और सितार वादन की विधिवत शिक्षा भी ली जो अभी भी जारी है। गुरु के आशीर्वाद, प्रतिभा तथा अभ्यास में निरन्तर परिष्कार करते हुए डॉ. प्रिंयका अरोड़ा ने देश के कई प्रतिष्ठित मंचो पर एकल वादन किया है। वर्तमान में वह गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के संगीत विभाग के अन्तर्गत असिसटेंट प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दे रही है।

 

 

लेखक परिचय-2


संदीप कौर ने सितार वाद्य में स्नतकोत्तर करने के साथ-साथ यूजीसी नेट तथा बी.एड (पी.एस.टी.ई.टी), CTET (सी.टी.ई.टी) की परीक्षा उत्तीर्ण की है एवं विभिन्न राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय सेमीनारों, संगोष्ठियों में यह निरन्तर हिस्सा लेती रहती है। अकादमिक स्तर पर राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में संगीत विषयक शोध-पत्र तथा लेखों के प्रकाशन में भी यह सक्रिय है। इसके साथ संगीत सम्बन्धी प्रतियोगिताओं में निर्णायक की भूमिका में भी इन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। वर्तमान में यह एस.सी.डी. गर्वमैंट कॉलेज लुधियाना में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।

 

 

भूमिका


संगीत प्रकृति-जन्य अप्रतिम कला है। नदी, झरने, सागर, वर्षा, पंछियों आदि द्वारा निसृत ध्वनि सृष्टि की जीवंतता, उसके सौन्दर्य एवं उसकी विलक्षणता को प्रकट करती है। प्रकृति के नैसर्गिक सौन्दर्य में व्यवहृत चित्त को आनंदित एवं हर्षित करने वाली इस कलात्मक निधि को मानव ने अनुभव किया और उसी प्रकृति से प्रेरणा प्राप्त कर यह कला मनुष्य द्वारा विभिन्न विधाओं में रूपांतरित हुई, जो कालांतर में उसकी सांस्कृतिक पहचान बनी। मानव सभ्यता के विविध चरणों में संगीत उसका सहचर बना, भले ही इसका आरम्भ अपरिष्कृत रूप में हुआ हो। सभ्यता के आदिकाल में जहां भाषा का उद्भव अभी शेष था, तब गायन शब्दों पर नहीं हृदय के भावों को अभिव्यक्त करने वाले मुख से निकले अनगढ़ स्वरों पर आधारित था, पत्थर से निर्मित वाद्य गान में सहायक होते थे एवं मनुष्य नृत्य से अनभिज्ञ था। पक्षियों के स्वरों के अनुकरण ने आदि मानव को संगीत के विभिन्न पड़ाव से साक्षात्कार करवाया तथा धीरे-धीरे उसने सभ्यता के अगले चरण की ओर कदम रखे। नृत्य से भिज्ञ होने पर उसके मन की उमंग का कंठ के स्वर और वाद्य की ताल के साथ एक नवीन उजास के साथ मिलन हुआ। तत्पश्चात् भाषा के जन्म और विकास के साथ मानव की सभ्यता भी विकसित हुई और उसे सांस्कृ तिक सन्दर्भों का बोध हुआ। रहन-सहन, रीति-रिवाज़, ज्ञान, कला आदि के परिप्रेक्ष्य में मानव का आदिम सहचर उसकी तथा उसकी सीमाबद्ध घरा की पहचान बनकर प्रत्यक्ष हुआ। पहचान के यही मापदण्ड भारत की वैदिककालीन सांगीतिक कला से देखे जा सकते हैं।

 

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