लेखक परिचय
डॉ धर्मचन्द चौबे की विद्यालयी शिक्षा क्वींस इंटर कॉलेज से और उच्च शिक्षा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी से हुई। आपका शोध, 'Indian Images of China: A Sino-Indian Historical contacts between 18th and 20th Centuries" विषय पर प्रोफेसर विमा उपाध्याय के निर्देशन में राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से पूर्ण हुआ। आपने अप्रैल 1999 से मार्च 2022 तक राजस्थान उच्च शिक्षा में इतिहास अध्यापन का कार्य किया है। वर्तमान में आप इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली में स्थित 'बृहत्तर भारत एवं एरिया स्टडीज' पीठ में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं। आपने बृहत्तर भारत का संक्षिप्त इतिहास, भारतीय संस्कृति की मूल प्रवृत्तियां एवं धाराएं, इतिहास के सिद्धांत, प्रवृत्तियां एवं इतिहासकार, China Through Indian Eyes, Economic and Social Institutions In Ancient India, भारत-चीनः कितने पास कितने दूर, सन सत्तावन की शौर्य गाथा, प्राचीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था और अलवर मेवात का इतिहास जैसे पुस्तकों की रचना की है। आपके शोधपत्र नागरी प्रचारिणी पत्रिका, जिज्ञासा, सांस्कृतिक प्रवाह, इतिहास दर्पण, इतिहास दिवाकर और कलाकल्प में प्रकाशित है। आप भारतीय संस्कृति के विश्व में प्रसार, भारतीय संस्कृति का वैशिष्ट्व एवम् उत्तरजीविता के अध्येता हैं। आपने ढेर सारी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में सत्राध्यक्ष और विषय विशेषज्ञ के रूप में सहभागिता की है। आप अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रांत के कार्यकारी अध्यक्ष है। भारत की नई संसद में भारत लोकतंत्र की जननी है नामक आर्ट गैलरी के आप पटकथा लेखक और प्रभारी थे।
पुस्तक परिचय
सीता भारत की दिव्य नारी एवं भूमिसुता है, जो जनक को अत्यंत प्यारी हैं। समाज, परिवार, बंधु-बांधवों, सखियों के साथ उनका व्यवहार अत्यंत सौम्य और प्रियकर है। सीता का बरित्र जितना सौम्यता से पूर्ण है. उतना ही तेजस्विता युक्त है। सीता जहाँ एक ओर अत्यंत कमनीय हैं, अत्यंत सेवा भावी है, अत्यंत त्यागी हैं वहीं दूसरी ओर वे अत्यंत दृढ, अत्यंत चेतना युक्त, परम विदुषी और तेजस्विनी हैं। प्रस्तुत पुस्तक में उनकी बुद्धिमता एवं तेजस्विता का प्रसंगसहित वर्णन किया गया है। सीता का जन्म और लालन-पालन राजा जनक के यहाँ हुआ और पति रूप में उन्हें रघुकुल तिलक राजा राम मिले पर प्रारब्ध के कारण उन्होंने बहुत संघर्ष किया और भीषण कष्ट चठाये परन्तु सीता ने अपने चरित्र को झुकने नहीं दिया। सीता के आराध्य राजा रामचन्द्र ने भी उनके साथ कई बार कठोर व्यवहार किया परन्तु सीता ने अपनी सौम्यता और तर्क से उन्हें अविभूत कर दिया। विचार करने पर अनुभव होता है कि सीता की समता कोई नहीं कर सका। सीता ने वाल्मीकि और व्यास की तरह कोई काव्य या ग्रंथ नहीं लिखे, कोई युद्ध नहीं जीता और ना हि कोई बड़ा साम्राज्य खड़ा किया। उन्होंने रावण का भी सामना किया और उसे पराजित किया, उन्होंने राम के लोकापवाद के दंश को भी झेला और राम को पराभूत किया। सीता न रावण के आगे झुकीं और न ही राम के आगे। कितनी सहद्याब्दियों बीत गई परन्तु भारत के इतिहास के गगनाकाश में उनकी अक्षयकीर्ति की पताका आज भी फहर रही है। कितनी आआंधियाँ आई, कितने भूकम्प आये और भारत भू पर कितने ही विधर्मियों और आततायियों ने हमले किए परन्तु उनका स्थान आज भी ज्यों का त्यों बना हुआ है। कितनी क्रांतियों हुई, संसार चलकर कहाँ से कहाँ पहुँचेगा पर सीता का सर्वोत्तम नारी का सिंहासन सृष्टि के अंत तक अविचल रहेगा। उनके चरित्र की सुगंध से सातों महासागरों का जल सुवासित हो रहा है। आशा है पाठकों को इस पुस्तक में प्रस्तुत सीता का तेजस्वी रूप पसंद आयेगा।
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