शिक्षा चिन्तन की कोई पुस्तक शास्त्र न बन कर एक रम्य रचना बन जाए तो इसे घटना माना जा सकता है। शिक्षा की परीक्षा ऐसी ही एक पुस्तक है। शिक्षा सरोकारों को सर्वजनीन बनाने वाली पुस्तक। शिक्षा चिन्तन को सरल भाषा में व्यक्त करती पुस्तक। पढ़ने में बाँधने वाली पुस्तक। साथ ही समकालीन शिक्षा परिदृश्य की तमाम विडम्वनाओं को रेखांकित करने वाली पुस्तक । कोई क्या उत्तर दे कि शिक्षा बालक की प्रतिष्ठा क्यों नहीं कर सकी अब तक? शिक्षा क्यों प्रश्नों पर पहरे बिठाती रही अब तक? कैसे देखती रही शिक्षा कि हमारा वीज ही हमसे छिन जाए? क्या हुआ कि प्रेम का बीज बोने वाली शिक्षा हिंसक राज और समाज की हिंसा को जायज मानती रही? कई ज्वलन्त प्रश्नों पर भाषा एवं विचार की मौलिकता के साथ यह पुस्तक पाठकों से बात करती लगती है। यह पुस्तक समाज-परिर्वतन में पाठक की सक्रिय भूमिका में विश्वास करती है और हर पाठक को प्रेरित कर कुछ करने को कहती लगती है। यह पुस्तक पूरे विश्व के शैक्षिक परिदृश्य का एक शास्त्रीय विवेचन हो कर भी रम्य रचना है। सर्वथा पठनीय। हर घर के लिए अत्यन्त आवश्यक । आवश्यक इसलिए कि यह पुस्तक हर माता पिता की अनेक बालकों की शिक्षा में भागीदारी आमन्त्रित करती है। घर में बालक के सही स्वरूप की प्रतिष्ठा करती है। हर घर में पुस्तक की आवश्यकता एवं उपादेयता को रेखांकित करती है। जितनी पठनीय यह पुस्तक घर-घर के लिए उतनी ही अनिवार्य है यह हर शाला के लिए। हर महाविद्यालय व विश्वविद्यालय के लिए। हर पुस्तकालय के लिए संग्रहणीय भी।
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