प्रस्तावना
किसी राष्ट्र के विकास में शिक्षा का अप्रतिम योगदान होता है। शिक्षा के स्वरूप पर राष्ट्र का उत्कर्ष निर्भर करता है। विशेषतः नैतिक एवं बौद्धिक उत्थान में उसका प्रत्यक्ष हाथ होता है। प्राचीन भारत में वैदिक युग से ही शिक्षा के आदर्श स्वरूप पर बल दिया जाने लगा था। उपनिषदों का युग तो शिक्षा की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व का माना जाता है। औपनिषद् धारा का प्रारम्भ और विकास एक प्रकार से प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के विकास की देदीप्यमान गाथा है। उपनिषदों के अध्ययन से केवल दार्शनिक प्रश्नों पर ही प्रकाश नहीं पड़ता, अपितु उस युग के आचार्य और शिष्य को अपूर्व परम्परा का भी सम्यक् ज्ञान होता है। शिक्षा का लक्ष्य गुरू-शिष्य का सम्बन्ध, कर्त्तव्य-उनकी जीवनचर्या, पढ़ाये जाने वाले विषय, विद्या संस्थान आदि विषयों का वर्णन उपनिषदों में मिल जाता है। इनके अवलोकन से तत्कालीन शिक्षा का यथासम्भव सम्पूर्ण चित्र हमारे समक्ष उपस्थित हो जाता है। उपनिषत्कालीन विशिष्टाचार्यों के व्यक्तित्त्व एवं उपलब्धियों से भी हम परिचित होते हैं। आचार्य एवं आचार्यकुलों ने शिक्षार्थियों के चरित्र एवं अनुशासन पर आश्चर्यजनक प्रभाव डाला था। निश्चय ही इस प्रभाव के पीछे आचार्य के चरित्र का महान् उत्कर्ष छिपा हुआ है। आचार्य कुलों के आदर्श वातावरण के दूरगामी प्रभाव को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। शिक्षा में आचार्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। गुरू-शिष्य के सम्बन्ध पर ही शिक्षासंस्थान के आदर्श एवं अनुशासन का मौलिक आधार निर्भर रहता है। इसके आलोक में आधुनिक शिक्षा की मूलभूत कमियों को पहचानने और उनको दूर करने में हमें प्रभूत सहायता प्राप्त होंगी ।
प्रस्तुत पुस्तक में उपनिषत्कालीन शिक्षा के विविध पक्षों के अध्ययन के परिणामों को उपनिबद्ध किया गया है। शोध-प्रबन्ध नौ अध्यायों में विभक्त है।
प्रथम अध्याय में वैदिक साहित्य में प्राप्त शिक्षा विषयक उल्लेखों को अंकित किया गया है। इसमें वेदों, वेदेतर साहित्य एवं उपनिषदों में उपलब्ध होने वाली शिक्षा के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है। यह अध्याय एक प्रकार से शोध प्रबन्ध की पृष्ठ भूमि का कार्य करता है।
द्वितीय अध्याय में उपनिषद् शब्द का अर्थ, महत्त्व आदि की चर्चा करते हुए प्रसिद्ध उपनिषदों की कथावस्तु को प्रस्तुत किया गया है। इसके अनन्तर उपनिषद्कालीन शिक्षा के आदर्श का विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है।
तृतीय अध्याय 'शिक्षण संस्थाएँ' के अन्तर्गत शाखा एवं चरण, राजसभा परिषदें तथा विद्वगोष्ठियाँ आदि पर प्रकाश डाला गया है।
चतुर्थ अध्याय में उपनिषत्कालीन शिक्षकों के आदर्श, लक्षण, गुण एवं स्वभाव, शिक्षक की आजीविका के साधन, शिक्षक का उत्तरदायित्व समाज में शिक्षक का स्थान आदि की चर्चा की गयी है।
पंचम अध्याय में आदर्श विद्यार्थी का लक्षण गुण एवं स्वभाव, छात्र के विविध कर्म और कर्त्तव्य, शिक्षक-शिक्षार्थी सम्बन्ध, विद्या अध्ययन की अवधि, शिक्षा प्राप्ति की अवस्था, नारी शिक्षा आदि का उल्लेख किया गया है।
षष्ठ अध्याय में उपनिषत्कालीन अध्ययन के विषय पर प्रकाश डाला गया है।
सप्तम अध्याय में शिक्षण विधि के अन्तर्गत अध्यापन पद्धति, परीक्षा की पद्धति. दीक्षान्तसमारोह आदि पर विचार किया गया है।
अष्टम अध्याय में उपनिषत्कालीन प्रमुख आचार्य यथा जनक, श्वेतकेतु सनत्कुमार, आरूणि, याज्ञवल्क्य, अजातशत्रु, अश्वपति कैकेय, रैक्व, गार्गी आदि विशिष्टाचार्यों का संक्षिप्त रूप में वर्णन किया गया है।
प्रस्तुत पुस्तक की परिणमति में जिन दैवी विभूतियों का योगदान रहा है, उनमें माँ सरस्वती की अहैतुकी कृपा सर्वोपरि है। अतएव सर्वप्रथम मैं उस विद्या की अधिष्ठात्री देवी को पुनः पुनः प्रणाम निवेदन करता हूँ, जिसकी कृपा से इस चराचर जगत् के सभी मांगलिक कार्य सम्पन्न होते रहते हैं, उनका शिवत्व समस्त जीवलोक के कल्याण का कारण बने, यह मेरी कामना है।
मेरे इस पुस्तक के निर्देशक आचार्य प्रवर स्वर्गीय डॉ० छविनाथ मिश्रजी, एम० ए० (द्वय) पी-एच० डी०, डी० लिट्०, भूतपूर्व स्नातकोत्तर संस्कृत विभागाध्यक्ष, मगध विश्विद्यालय, बोध गया थे। मैं इनके प्रति चिरकृतज्ञ हूँ। मैं इनके बताये गये रास्ते पर चलकर माँ भारती की सेवा में सततरत रहकर गुरू-कृपा से उऋण होने की कोशिश करता रहूँगा। इसके लिए मैं प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि भगवान मुझे इसके लिए निरन्तर शक्ति और साहस का संचार करते रहें।
इस पुस्तक के निर्माण में अवकाशप्राप्त डॉ० रायअश्विनी कुमार स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग, मगध विश्वविद्यालय, बोध गया के नाम विशेष उल्लेखनीय है, जिन्होंने समय-समय पर सत्परामर्श दिया है और अपनी सत्प्रेरणा से मुझे आप्यायित भी किया है। मैं हृदय से इनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।
इस पुस्तक के निर्माण में अवकाशप्राप्त डॉ० नन्द किशोर तिवारी स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, एस० डी० जैन कॉलेज, सासाराम को मैं विशेषतः धन्यवाद देता हूँ, जिनके चरण कमलों में बैठकर मैंने बहुत कुछ सीखा ।
इस पुस्तक के निर्माण में दिवंगत डॉ० सत्य नारायण चौधरी जी, डॉ० देवकान्त झा, प्रो० मारूति नंदन पाठकजी का भी योगदान रहा है। अतएव मैं इनलोगों के प्रति भी आभारी हूँ।
मैं श्री पं० शारदा निवास तिवारीजी, व्याकरणाचार्य, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय; अवकाशप्राप्त डॉ० युगल किशोर मिश्र, एम० ए०, पी-एच० डी० स्नातकोत्तर प्राचीन भारतीय एवं एशियाई अध्ययन विभाग, मगध विश्वविद्यालय, बोध गया, स्वर्गीय श्री कमलेश कुमार मिश्र, प्राचार्य श्री गणेश गिरिवरधारी संस्कृत महाविद्यालय, बख्तियारपुर का विशेष आभार व्यक्त करता हूँ जिनकी प्रेरणा से मुझे इस के लेखन से प्रकाशन तक सहयोग मिला।
पूज्य मामा अवकाशप्राप्त श्री शिवकुमार मिश्र, असिस्टेण्ट सेक्रेटरी बिहार इन्टरमिडियट एजुकेशन कौंसिल, पटना, बिहार का मैं हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने मुझे सतत् इस ग्रन्थ के प्रकाशन के लिये उत्प्रेरित करते रहे हैं।
अन्त में, मैं उस परम पिता परमेश्वर के प्रति सादर शीश झुकाता हूँ जिनकी अहैतुकी कृपा से इस चराचर विश्व का योगदान निरन्तर संघटित होता रहता है।
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