प्रस्तावना
वृक्षायुर्वेद आधारित कृषि ज्ञान का उल्लेख भारतवर्ष के विभिन्न स्थानों के प्राचीन मनीषियों ने भिन्न-भिन्न समय पर 400 वर्ष ईसा पूर्व से 1725 ई. तक भिन्न-भिन्न पाण्डुलिपियों के माध्यम से किया है। ये तकनीकियां सम्पूर्ण रूप से जैविक हैं। खेती की इन टिकाऊ तकनीकियों के माध्यम से हजारों वर्ष तक एशिया का दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र कुछ सूखे प्रभावित वर्षों को छोड़कर समृद्ध था। 1725 ई. के उपरान्त वृक्षायुर्वेद का ज्ञान एवं उसका अभ्यास ब्रिटिश राज के कारण सर्वसधारण के मध्य न उपलब्ध होने के कारण खेती किसानी का धीरे-धीरे क्षरण हुआ और शनैःशनैः भारत जो खेती के कई उत्पादों का विश्व के कई भागों में निर्यात करता था उसे भरण-पोषण हेतु अनाज के लिए भी दूसरे देशों पर निर्भर रह आयात करना पड़ा। वर्ष 1965 तथा उत्तरोत्तर वैज्ञानिकों, योजनाकारों, नीतिकारों के अथक प्रयासों से हरित क्रान्ति का प्रादुर्भाव हुआ और कृषि उत्पादन व उत्पादकता में आशातीत वृद्धि हुई और भारतवर्ष में खाद्यान्न सुरक्षा प्राप्त की।
हमें आभास है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य के जलवायु परिवर्तन, कम होती जैव विविधता, ग्लोबल वार्मिंग, कृषि संसाधनों के लगातार क्षरण के साथ-साथ खेती के दिन प्रतिदिन महंगे होने एवं कृषि लाभांश में लगातार कमी आने से कृषकों द्वारा खेती के प्रति उदासीनता एक चुनौती है। अतएव आज की वर्तमान आवश्यकता को देखते हुए पुनः वृक्षायुर्वेद आधारित जैविक कृषि की विभिन्न तकनीकियों पर वर्तमान व्यवहारिक परिप्रेक्ष्य में शोध तथा उनको लोकप्रिय बनाने हेतु एशियन एग्री-हिस्ट्री फाउण्डेशन (ए ए एच एफ) दृढ़संकल्प है।
उल्लेखनीय है कि एशियन एग्री हिस्ट्री फाउण्डेशन ने भारतवर्ष के विभिन्न स्थानों के प्राचीन मनीषियों द्वारा भिन्न-भिन्न समय पर संस्कृत तथा अन्य भाषाओं में लिखे गये कृषि तथा कृषि से संबंधित ज्ञान को हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी तथा कुछ स्थानीय भाषाओं में अनुवाद किया तथा साथ ही विषय को वर्तमान समय में लागू किये जाने की महत्ता को देखते हुए इस प्राचीन परन्तु महत्तवपूर्ण ज्ञान को भारतवर्ष के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने की संस्तुति की जिसके आधार पर वर्तमान में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा भारतवर्ष के प्रत्येक कृषि विश्वविद्यालयों में "एग्रीकल्चरल हेरिटेज" का पाठ्यक्रम लागू कर दिया गया है। यहां पर ये भी उल्लेख करना तर्क संगत है कि भारतवर्ष के विभिन्न मनीषियों द्वारा लिखे गये व एशियन एग्री-हिस्ट्री फाउण्डेशन द्वारा अनुवादित वृक्षायुर्वेद के सिद्धान्तों के आधार पर की गई जैविक खेती से उत्तर-पूर्वी भारत के चाय बागानों के अतिरिक्त अनेक अन्य स्थानों पर सफलता प्राप्त हुई है।
वृक्षायुर्वेद सिद्धांतों पर आधारित कृषि के ज्ञान में वृक्षायुर्वेद ग्रंथ में वैद्य सुरपाल द्वारा वर्णित जैविक किण्वित तरल फर्टिलाइजर, कुणपजल, का विशेष योगदान रहा है। हम ए ए एच एफ के अनुभव के आधार पर यह कह सकते हैं कि केवल हर्बल कुणपजल में जैविक खेती को सफल बनाने की अद्भुत क्षमता है।
आशा है कि यह व्यवहारिक पुस्तिका वैज्ञानिकों, कृषकों, विद्यार्थियों, बागवानों तथा खेती से जुड़े हर व्यक्ति के लिए लाभप्रद होगी तथा भारतवर्ष का वृक्षायुर्वेद आधारित कृषि का प्राचीन ज्ञान सफलता पूर्वक जैविक खेती के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सहजता से सर्वसाधारण के मध्य सुलभ हो सकेगा।
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