पुस्तक परिचय
मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूँ," आचार्य चतुरसेन ने वैशाली की नगरवधू पूरा करने के उपरांत कहा था अर्थात् अपनी इस कृति के सम्मुख उन्हें अपनी बाकी रचनाएँ बिल्कुल हल्की लगीं। लेखक की यह स्वीकृति इस उपन्यास के महत्त्व को बयां करती है। इस कालजवी उपन्यास के केन्द्र में है, आज से 2500 वर्ष पूर्व के वैशाली गणतंत्र की राजनर्तकी अम्बापाली। वैशाली में उन दिनों नियम था कि नगर की सबसे सुन्दर नर्तकी को पूरे नगर की वधू माना जाता था। इसीलिए अम्बापाली को नाम दिया गया वैशाली की नगरवधू । इस उपन्यास को लिखने के लिए आचार्य चतुरसेन ने तत्कालीन हिन्दू, जैन और बौद्ध साहित्य का अध्ययन किया और गहन शोध करने के उपरांत ही इस कृति की रचना की। अपने अप्रतिम सौन्दर्य और अंतरंग राजसी संबंधों के कारण शक्ति का केन्द्र रही अम्बापाली बौद्ध धर्म के प्रभाव में आकर अध्यात्म के मार्ग पर चल पड़ती है। एक तरफ़ राजपाट और दूसरी तरफ़ आत्मिक यात्रा इन्हीं दो कथाओं का ताना-बाना है इस उपन्यास में। आचार्य चतुरसेन हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं जिन्होंने सैकड़ों कहानियाँ और कई चर्चित उपन्यास लिखे हैं। उनका रचनात्मक फ़लक बहुत विशाल था जिसमें उन्होंने धर्म, राजनीति, समाजशास्त्र, स्वास्थ्य और चिकित्सा आदि विषयों पर लिखा। उनकी 150 से अधिक प्रकाशित रचनाएँ हैं जो अपने में एक कीर्तिमान हैं। ऐतिहासिक उपन्यासों के लेखक के रूप में उनकी विशेष प्रतिष्ठा है।
Hindu (हिंदू धर्म) (13513)
Tantra (तन्त्र) (1007)
Vedas (वेद) (715)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2083)
Chaukhamba | चौखंबा (3186)
Jyotish (ज्योतिष) (1553)
Yoga (योग) (1159)
Ramayana (रामायण) (1338)
Gita Press (गीता प्रेस) (724)
Sahitya (साहित्य) (24649)
History (इतिहास) (8977)
Philosophy (दर्शन) (3613)
Santvani (सन्त वाणी) (2621)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist