हमारे पूर्ववर्ती ग्रन्थ "The History and Principles of Vedic Interpretation" में वेद-व्याख्यान के जिन सिद्धान्तों का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया गया है उन्हों के अनुसार इस ग्रन्थ में ऋग्वेद के बीस प्रसिद्ध सूक्तों के अर्थों का विवेचन किया गया है। इस विषय पर हमने अपने पूर्ववर्ती ग्रन्य "वैदिक-व्याख्या-विवेचन" की भूमिका में भी संक्षिप्त रूप से प्रकाश डाला है। अतएव इस ग्रन्थ की भूमिका में उन सब विचारों की पुनरावृत्ति अनावश्यक है। इस विषय के जिज्ञासु पाठक हमारे उपर्युक्त दोनों ग्रन्थों से धावश्यक सहायता ले सकते हैं।
इस ग्रन्थ की मुख्य विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय देना आवश्यक है। इस ग्रन्थ में व्याख्यात सभी बीसों सूक्तों की प्रत्येक ऋचा का संहितापाठ तथा पदपाठ सस्वर दिया गया है। वैदिक छन्द के मौलिक स्वरूप को ध्यान में रखते हुए ऋचाओं के प्रत्येक पाद को एक पृथक् पंक्ति में रखा गया है और उसके सम्मुख उसका पदपाठ दिया गया है ताकि पाठक को प्रत्येक पद का स्वरूप समझने में सुविधा हो। प्रत्येक पाद को एक पृथक् पंक्ति में रखने से ऋचाओं के अर्थ को समझने में भी सुविधा रहती है, क्योंकि अधिकतर ऋचाओं का प्रत्येक पाद अर्थ की दृष्टि से एक पृथक् इकाई है। इसके अतिरिक्त यह तथ्य उल्लेखनीय है कि प्रातिशाख्य, पाणिनि तथा आधुनिक विद्वान् भी वैदिक छन्द के प्रत्येक पाद को, स्वर तथा सन्धि की दृष्टि से, एक महत्त्वपूर्ण इकाई स्वीकार करते हैं।
प्रत्येक ऋचा के नीचे उसका अनुवाद दिया गया है और अनुवाद में हिन्दी शब्दों के सामने प्रकोष्ठ में महत्त्वपूर्ण तथा कठिन वैदिक शब्द दिये गये हैं। मन्त्रों के दुरूह भाव को स्पष्ट करने के लिए आवश्यकतानुसार अनूदित शब्दों के सामने उनका भावार्थ भी जोड़ दिया गया है। मन्त्र के अनुवाद के नीचे उसमें प्रयुक्त कठिन तथा महत्त्वपूर्ण वैदिक पदों पर विस्तृत टिप्पणियाँ प्रस्तुत की गई हैं। टि० में सर्वप्रथम कठिन वैदिक पद की व्याकरण-सम्बन्धी विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दिया गया है जिसके लिए हम ने हमारे ग्रन्थ वैदिकव्याकरण (वै० व्या०) की अनुच्छेद-संख्या का निर्देश किया है। इसके अतिरिक्त वैदिक पद के स्वराविषयक वैशिष्ट्य का भी परिचय दिया गया है। जिन वैदिक पदों के अर्थ के विषय में सन्देह तथा मतभेद है, टि० में उनके विभिन्न प्राचीन तथा अर्वाचीन व्याख्यानों का सम्यक् विवेचन किया गया है। उनमें से जो व्याख्यान वैदिक प्रयोग की कसौटी पर खरा उतरता है उसी का ग्रहण किया गया है। परन्तु यदि कोई भी उपलब्ध व्याख्यान वैदिक प्रयोग के अनुकूल नहीं है, तो हमने वैदिक प्रयोग के आधार पर अपना मौलिक तथा स्वतन्त्र अर्थ सुझाया है। जहाँ पर वेदार्य सन्दिग्व है, वहां पर हमने इस तथ्य को स्वीकार किया है और निराधार तथा मनमाना अर्थ लगाने का दुराग्रह नहीं किया है। हमारे पूर्ववर्ती ग्रन्य "वैदिक-व्याख्या-विवेचन" में जिन वैदिक शब्दों का व्याख्यान किया जा चुका है उनका व्याख्यान पुनः यहाँ पर नहीं दिया गया है और उनका केवल स्थल-निर्देश किया गया है। टि० के पश्चात् छ० में ऋचा की छन्दः सम्बन्धी विशेषता की ओर ध्यान आकृष्ट कराते हुए उसके छन्दोभंगत्व के निवारण के विषय में प्रस्तुत श्राधुनिक मतों का उल्लेख किया गया है। इस ग्रत्व में जिन वैदिक शब्दों का व्याख्यान किया गया है उन्हें ग्रन्थ के अन्त में "व्याख्यात-शब्दानुक्रमणी" में क्रमबद्ध किया गया है और वहाँ पर उनका केवल वही अर्थ दिया गया है जिसे हमने इस ग्रन्थ में स्वीकार किया है।
अब तक हम ऋग्वेद के चालीस सूक्तों के अर्थ पर अपना विस्तृत विमर्श प्रस्तुत कर चुके हैं। हमारी हार्दिक इच्छा है कि न केवल सम्पूर्ण ऋग्वेद का अपितु सभी वेदों का ऐसा विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि वेदाध्ययन को और अधिक प्रोत्साहन मिल सके ।
अन्त में मैं उन सभी मनीषियों के प्रति अपना आभार प्रकट करता है जिनके ग्रन्थों से मुझे वेदाध्ययन में सहायता मिली है। पञ्जाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़ ने इस ग्रन्थ के प्रकाशन के लिये मुझे जो सुविधाएं तथा अनुदान प्रदान किया है उसके लिये मैं आभारी हूँ। इस ग्रन्थ के सुन्दर तथा शुद्ध मुद्रण के लिये होशियारपुर का विश्वेश्वरानन्द-वैदिक-शोध संस्थान-प्रेस मेरे धन्यवाद का पात्र है।
Hindu (हिंदू धर्म) (13645)
Tantra (तन्त्र) (1007)
Vedas (वेद) (730)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2087)
Chaukhamba | चौखंबा (3184)
Jyotish (ज्योतिष) (1563)
Yoga (योग) (1166)
Ramayana (रामायण) (1336)
Gita Press (गीता प्रेस) (724)
Sahitya (साहित्य) (24710)
History (इतिहास) (9024)
Philosophy (दर्शन) (3633)
Santvani (सन्त वाणी) (2623)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist