भूमिका
वैदिक युगीन शासन-व्यवस्था का अब तक आंशिक विवेचना ही हुआ है। जीमर की प्रसिद्ध जर्मन पुस्तक आल्ट इंडिशेश लेबेन में इस विषय पर एक वृहत् अध्याय है।
लुडविग के ऋग्वेद के जर्मन अनुवाद और भाष्य में भी एक अध्याय है। मैकडोनल और कीथ के वैदिक इंडेक्स में भी कुछ विवेचन हैं। पाश्चात्य शोधकार्यों का आधार ग्रहण करती हुई प्रफुल्लचंद्र बसु की पुस्तक इंडो-आर्यन पालिटी ऋग्वेद की राजनीतिक संस्थाओं का सम्यक् संक्षिप्त विवेचन करती है। उपेन्द्रनाथ घोषाल की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ इण्डियन पब्लिक लाइफ (प्रथम खंड) संहिताओं, ब्राह्मणों, आरण्यकों आदि में वर्णित राजनीतिक संस्थाओं का अच्छा विवेचन प्रस्तुत करती है। प्राचीन भारतीय राज्यशास्त्र के विद्वानों की पुस्तकों के आरंभिक अध्यायों में वैदिक शासन व्यवस्था का कुछ समीक्षण प्रस्तुत रहता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि पूर्व में किये गये कार्यों में वैदिक युगीन शासन-व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर पर्याप्त कार्य नहीं हो सका है। अतः मैंने प्रस्तुत विषय का चयन कर इस पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डालने का प्रयास किया है।
वैदिक युग का अभिप्राय :
भारत के इतिहास में वैदिक युग का स्थान अत्यन्त महत्त्व का है। इस देश के बहुसंख्यक निवासी ऐसे धर्मों एवं सम्प्रदायों के अनुयायी हैं, जो अपने मन्तव्यों, दार्शनिक सिद्धान्तों, पूजा-पाठ की विधि और आचरण के नियमों आदि के लिए वेदों से प्रेरणा प्राप्त करते हैं और उन्हें प्रमाण रूप से स्वीकार करते हैं। भारत के इतिहास की यह अनुपम विशेषता है कि अत्यन्त प्राचीन काल में वैदिक ऋषियों ने जिस संस्कृति का सूत्रपात किया था, हजारों साल बीत जाने पर भी वह अब तक कायम है। उनमें कुछ परिवर्तन अवश्य हुए हैं, पर उनके "नैरन्तर्य" में कोई बाधा नहीं पड़ी है।
यह बात निर्विवाद है कि वेद विश्व साहित्य के सबसे पुराने ग्रन्थ हैं। आर्य लोग उन्हें अनादि, अपौरुषेय और ईश्वरकृत मानते हैं। शतपथ ब्राह्मण में लिखा है, कि प्रारम्भ में केवल एक प्रजापति की ही सत्ता थी। उसने प्रजा उत्पन्न करने की कामना की और इस प्रयोजन से तप किया, जिसके परिणामस्वरूप पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यु-ये तीन लोक उत्पन्न हुए। इन तीन लोकों को अभितृप्त कर प्रजापति ने अग्नि, वायु और सूर्य को उत्पन्न किया और फिर उनके द्वारा तीनों वेदों की उत्पत्ति प्रजापति द्वारा की गई, अग्नि द्वारा ऋग्वेद की, वायु द्वारा यजुर्वेद की और सूर्य द्वारा सामवेद की। एक अन्य प्रसंग में शतपथ ब्राह्मण में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को 'महान् भूत' (परमेश्वर) का निःश्वसित कहा गया है। वेदों की अन्तःसाक्षी द्वारा भी यह सूचित होता है, कि वह जो अशरीरी, शुद्ध, निष्पाप, सर्वव्यापक, स्वयम्भू, मनीषी, परमेश्वर है, जनता के लिए सब पदार्थों व विषयों का यथातथ्य रूप से ज्ञान उसके द्वारा प्रदान किया गया था। आर्य चिन्तकों के अनुसार यह यथार्थ ज्ञान वेद ही हैं, जो ईश्वरकृत हैं और जिनका प्रकाश ईश्वर द्वारा सृष्टि के प्रारम्भ में अग्नि, वायु और आदित्य नामक ऋषियों द्वारा किया गया था।
आधुनिक विद्वान् वेदों के इस स्वरूप को स्वीकार नहीं करते। वे उन्हें मनुष्यकृत मानते हैं। वेदों के प्रत्येक सूक्त व ऋचा (मन्त्र) के साथ उसके 'ऋषि' और देवताओं के नाम दिये गये हैं। वैदिक सूक्तों व मन्त्रों की रचना इन ऋषियों द्वारा ही की गई थी। वैदिक ऋषियों में गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज और वशिष्ठ मुख्य हैं। इन छह ऋषियों व इनके वंशजों ने ऋग्वेद के दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठे और सातवें मण्डलों की रचना की थी। आठवें मण्डल के ऋषि काण्व और अंगिरस वंशों के थे। प्रथम मण्डल के पचास सूक्त भी काण्व वंश के ऋषियों द्वारा रचे गये थे। अन्य मंडलों एवं प्रथम मण्डल के शेष सूक्तों की रचना विविध ऋषियों द्वारा की गई थी, जिन सबके नाम इन सूत्रों व मन्त्रों के साथ में मिलते हैं। इन ऋषियों में वैवस्वत मनु, शिवि, औशीनर, प्रतर्दन, मधुच्छन्दा और देवापि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं; क्योंकि इनके सम्बन्ध में पुराणों तथा महाभारत से भी बहुत-सी बातें ज्ञात होती हैं। जो विद्वान् वेदों को ईश्वरकृत मानते हैं, उनके मत में वैदिक ऋषि सूक्तों के रचयिता न होकर 'द्रष्टा' मात्र थे। उनके द्वारा मन्त्रों के अभिप्राय का दर्शन किया गया था।
यदि वेदों को अनादि और अपौरुषेय मान लिया जाय, तो वैदिक संहिताओं को इतिहास के लिए प्रयुक्त करने का प्रश्न ही नहीं उठता। उस दशा में वैदिक युग इतिहास के उस काल को कहा जायगा, जबकि लोग वेदों की शिक्षा के अनुसार जीवन-यापन किया करते थे। उस प्राचीन काल के धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन का प्रतिपादन करने के लिए वेदों का प्रयोग अवश्य किया जा सकेगा, क्योंकि तब लोगों का जीवन वेदों के अनुरूप था। पर उस युग की राजनीतिक घटनाओं तथा सांस्कृतिक विकास आदि का निरूपण करने के लिए वेदों को आधार बना सकना सम्भव नहीं होगा।
इतिहास के प्रयोजन से वेदों का उपयोग किस अंश तक व किस प्रकार किया जा सकता है, इस प्रश्न पर हम अगले प्रकरण में विचार करेंगे। यहाँ हम यह स्पष्ट करेंगे कि आधुनिक इतिहास-लेखकों को भारतीय इतिहास का कौन-सा काल वैदिक युग के रूप में अभिप्रेत है। जिस प्रकार वैदिक संहिताओं में प्राचीन आर्यों की धार्मिक अनुश्रुति संग्रहीत हैं, वैसे ही पुराणों में राजनीतिक अनुश्रुति को संकलित किया गया है। अयोध्या, विदेह, पौरव, काशी, कारुष आदि आर्य राज्यों के राजाओं की वंशावलियाँ पुराणों में दी गई हैं, जिसका प्रारम्भ मनु से हुआ है। इन वंशावलियों में अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं की वंशावली सबसे पूर्ण है। उसमें मनु से लगाकर वृहद्वल तक 94 राजाओं के नाम दिये गये हैं। अयोध्या का राजा वृहद्दल हस्तिनापुर के कौरव राजा धृतराष्ट्र तथा पाण्डवों का और यादववंशी कृष्ण का समकालीन था। इस प्रकार मनु से प्रारम्भ कर महाभारत के समय तक अयोध्या में 94 राजा हुए थे। हस्तिनापुर के पाण्डव राजाओं की वंशावली महाभारत के युद्ध के कुछ समय बाद तक की भी दी गई है। पाण्डवों के बाद वहाँ परीक्षित और जनमेजय ने शासन किया था, और उसके दो पीढ़ी बाद अधिसीम कृष्ण ने। पुराणों से जहाँ भारत के प्राचीन राज्यों के राजवंशों और राजाओं का परिचय मिलता है, वहाँ साथ ही कतिपय ऋषियों और ऋषिवंशों के सम्बन्ध में भी उनसे जानकारी प्राप्त होती है। इनमें से अनेक ऋषि ऐसे भी हैं, जिनके नाम वैदिक सूक्तों और मन्त्रों के ऋषियों के रूप में दिये गये हैं। ये ऋषि किस राजवंश के किस राजा के समकालीन थे, इस विषय में भी कुछ संकेत पुराणों में विद्यमान हैं। ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल के सब सूक्तों के ऋषि गृत्समद हैं। पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार से काशी के राजवंश के संस्थापक राजा काश के भाई थे, और यह राजा काश अयोध्या के राजवंश की ग्यारहवीं पीढ़ी का समकालीन था। ऋग्वेद के तीसरे मण्डल के ऋषि विश्वामित्र अयोध्या के राजवंश की तैंतीसवीं पीढ़ी के राजा हरिश्चन्द्र के समकालीन थे, और छठे मण्डल के ऋषि बार्हस्पत्य भारद्वाज 54वीं पीढ़ी के। आठवें मण्डल के ऋषि कण्व का समय भारद्वाज को एक पीढ़ी बाद है। ऋषि वशिष्ठ विश्वामित्र के समकालीन थे, और इस प्रकार उन्हें भी उस समय का मानना होगा, जबकि अयोध्या पर राजा हरिश्चन्द्र का शासन था। कितने ही अन्य वैदिक ऋषियों का भी पौराणिक साहित्य में उल्लेख है, और उनमें ऐसे संकेत भी विद्यमान हैं जिनसे यह जाना जा सकता है कि वे किस राजा के समकालीन थे। वैदिक ऋषि मधुच्छन्दा अयोध्या के राजा हरिश्चन्द्र के समय में, ऋषि लोपामुद्रा राजा अंशुमान के समय में, ऋषि दीर्घतमा राजा सगर के समय में और ऋषि वामदेव राजा सहदेव (उत्तर पंचाल) के समय में हुए थे। प्राचीन राजवंशों के कतिपय राजा एवं उनसे सम्बद्ध कतिपय व्यक्ति भी वेद मन्त्रों के ऋषि हैं। ऋग्वेद के पाँच सूक्तों (मण्डल 8, सूक्त 24-31) के ऋषि वैवस्वत मनु हैं, पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार जिनके द्वारा भारत में राज्य संस्था का सूत्रपात किया गया था, और जिनसे मानव राजवंश का प्रारम्भ हुआ था। मनु की पुत्री इला थी, जिसके वंशजों ने प्रतिष्ठान को राजधानी बनाकर अपने स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की थी। प्रतिष्ठान का राजा ऐल पुरुरवा भी ऋग्वेद का एक ऋषि है (10/95)। मनु के अन्यतम पुत्र नाभानेदिष्ट ने वैशाली में एक पृथक् राजवंश का आरम्भ किया था। यह मानव नाभानेडिष्ट भी एक वैदिक ऋषि हैं (ऋग्वेद 10/61-62)। मनु के अन्य पुत्र शार्यात को भी वैदिक ऋषियों में स्थान प्राप्त है (ऋग्वेद 10/92)। नाभानेदिष्ट के वंशजों में भालन्दन (9/88) और वात्सप्रि (10/45-43) भी वैदिक ऋषि हैं। आर्य राजाओं की जिन 94 पीढ़ियों का पौराणिक अनुश्रुति द्वारा परिचय मिलता है, मनु, नाभानेदिष्ट, ऐल पुरुरवा और वात्सप्रि आदि उनमें प्रारम्भ के राजाओं में से थे। इनके बनाये हुए या दर्शन किये हुए बहुत ही कम मंत्र ऋग्वेद में संकलित हैं। गृत्समद, विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि जिन ऋषियों के मन्त्र ऋग्वेद में बहुत बड़ी संख्या में हैं, उनका समय प्रायः 26वीं पीढ़ी से शुरु कर 40वीं पीढ़ी तक का है। इसके बाद के समय के भी कतिपय व्यक्ति वैदिक ऋषि हैं, पर उनकी संख्या अधिक नहीं है। ऐसे ऋषियों में देवापि का नाम उल्लेखनीय है, जो पौरव वंश के राजा शान्तनु का भाई था। देवापि की भी कतिपय ऋचाएँ ऋग्वेद में संकलित हैं (10/98), जिनमें शान्तनु का भी नाम आया है।
वैदिक ऋषियों के सम्बन्ध में इस विवरण से उस काल का एक धुंधला चित्र हमारे सम्मुख उपस्थित हो जाता है, जबकि वैदिक सूक्तों की रचना या 'दर्शन' का प्रारम्भ हुआ था। वैवस्वत मनु के समय में इनका निर्माण शुरु हो गया था, जो राजा शान्तनु (जो महाभारत में कौरव-पाण्डवों के पितामह थे) के समय तक जारी रहा। महाभारत के समय में या उससे कुछ पूर्व महर्षि वेदव्यास द्वारा इन सूक्तों एवं ऋचाओं को संहिता के रूप में संकलित कर दिया गया। जिस काल में इनकी रचना हुई, उसी को भारतीय इतिहास का वैदिक युग कहा जाता है। इस युग का प्रारम्भ वैवस्वत मनु के समय से हुआ था, और यह राजा शान्तनु के समय में समाप्त हो गया था। जो विद्वान् वेदों को अपौरुषेय और ईश्वरकृत मानते हैं, उन्हें भी वैदिक युग के इस अभिप्राय से कोई विप्रतिपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि गृत्समद, नाभानेदिष्ट, वशिष्ठ आदि ऋषियों को वे वेदमन्त्रों का दर्शन करने वाला या उनके अभिप्राय को स्पष्ट करने वाला प्रतिपादित करते हैं। जिस काल में इन ऋषियों द्वारा ईश्वरकृत वैदिक ऋचाओं का दर्शन कर उनके अन्तर्निहित अभिप्राय को प्रगट किया गया, उसे वैदिक युग मानना सर्वथा उचित व युक्तिसंगत है।
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