इस उपन्यास की लेखन प्रक्रिया और परिस्थिति के बारे में अगर विस्तार से लिखूँ तो अलग से एक नया उपन्यास बन जाएगा। क्योंकि इसके लेखन की कथा में भी अनेकानेक पाठकों के लिए रुचिकर और मेरे लिए पीड़ादायक मोड़ हैं। फिर भी संक्षेप में कुछ बातें लिखने का प्रयास कर रहा हूँ।
'त्यागमूर्ति हिडिम्बा' पूरा करने के बाद 2018 में ही इसे लिखने की सोचने लगा। 4-5 पृष्ठ काला करने के बाद बंद कर दिया। क्योंकि अपने महानगरीय संघर्ष और त्यागमूर्ति हिडिम्बा को लेकर प्रकाशकों की हीलाहवाली ने भी परेशान-सा कर दिया था। 2019 में पुनः लिखना आरंभ किया, उसी समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया। दाहिना हाथ 6 महीने तक दुखी रहा। इसलिए 100 पृष्ठ से आगे का लेखन हो न सका। स्वस्थ होने के पश्चात् अनेक साहित्यिक यात्राओं ने लिखने का अवसर निगल लिया।
उसके बाद 2020 की तिमाही आते-आते वैश्विक महामारी कोरोना ने ऐसी विकट परिस्थितियाँ मेरे लिए (विश्व के भी लिए) निर्माण की, जिसके कारण घर में बंद होना पड़ा। ऐसे में विचार आया कि पुनः इसका लेखन आरंभ करूँ। इस तरह एक दिन मन बना तो लिखना आरंभ किया। दूसरे दिन लिख ही रहा था कि बिटिया आराध्या के रोने की तेज पीड़ामय ध्वनि कानों में पड़ी। लिखना छोड़कर दौड़ा तो पता चला कि बिटिया का बायाँ हाथ दो जगहों से टूट गया है। नंगे पाँव कंधे पर लिटाकर रुग्णालय की ओर दौड़ा। भीषण कोरोना काल, कोई रुग्णालय में लेने को तैयार नहीं, बिटिया और पिता दोनों रोये जा रहे थे। कुछ समझ में नहीं आ रहा, जेब में केवल नौ सौ रुपये ! फेसबुक पर लिखा, तो मित्रों से मदद मिली।
2 महीने पश्चात् पुनः लिखना आरंभ किया तो, मुझे कोरोना हो गया। आर्थिक स्थिति भयानक हो गई और जीवन भयाक्रांत ! इसलिए हमें दो वर्षों के लिए परिवार के साथ मुंबई त्याग कर अपने पैत्रिक गाँव जाना पड़ा। जब 2022 में लौटे तो अकेले लौटे। मेरा लगभग सब कुछ उजड़ गया था। मुझे नए सिरे से छत के लिए संघर्ष करना पड़ा। यहाँ आकर मैंने पुनः शुक्राचार्य पर अध्ययन, चिंतन करना आरंभ किया। मेरी शोध की पुरानी दैन्दिनी खो गई थी। इसलिए कई दिनों तक या कहूँ महीनों तक परेशान रहा। तब मैंने तय किया कि अब मैं हाथ से कागज पर नहीं लिखूँगा।
इसलिए नया संगणक लिया और उस पर नए सिरे से लिखना आरंभ किया। लिखने और सोचने का कुछ ढंग भी बदल गया। जैसे मन बनता थोड़ी देर लिखता कि तभी बिजली कट जाती। कभी संगणक चलते-चलते अकस्मात् बंद हो जाता। बिजली की समस्या के निदान हेतु मैंने अबाधित विद्युत् आपूर्ति यंत्र (यूपीएस) लिया। दो ही दिन हुए थे लिए हुए, वह भी खराब हो गया। जिन दुबे जी के यहाँ से लिया था। वो दो दिन बाद आये और मरम्मत हेतु ले गए और एक महीने तक नहीं दिए। इधर बीच-बीच में अचानक बार-बार बिजली कटने से विडोज खराब हो गई।
पुनः बदलकर नया संगणक लिया। फिर लिखना आरंभ किया। उसी समय अम्मा-बाऊ का स्वास्थ्य अधिक दयनीय हो गया। एम्स में भर्ती होना पड़ा। इसलिए आपात स्थिति में गाँव जाना पड़ा। लौटने के बाद किराए के घर का अनुबंध समाप्त हो गया था। इसलिए दो महीने किराये का मकान ढूँढ़ने में निकल गए।
पुनः लिखना आरम्भ किया तो संगणक की स्क्रीन हिलने लगी। 6 महीने में 6 नई बीमारियों ने घेर लिया। किसी ने कहा- आरंभमें विघ्न-विनाशक की स्तुति करनी चाहिए थी, ऐसा ग्रन्थ बिना मंगलाचरण के नहीं लिखते, मंगलाचरण लिखकर ही ऐसे विषय पर लिखना आरंभ करना चाहिए था। मैंने फिर 8 पंक्तियों की प्रार्थना लिखी, तब जाकर कुछ दिन आराम मिला।
किंतु, एक माह बाद मैं पुनः विपत्तियों से घिर गया। तब लगा कि शायद इसे पूरा करने से पहले ही यह शरीर छूट जाए तो, मैंने इसे संक्षिप्त में समेटने का प्रयास किया। तब भी रुग्णालय के सघन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में पहुँच गया। वहाँ से बाहर आया तो पुनः शोध और लेखन आरंभ किया। पुनः स्वास्थ्य निर्बल हुआ और पुनः एक बड़े निजी रुग्णालय के सघन चिकित्सा इकाई की शरण लेनी पड़ी, जिससे मैं बचना चाह रहा था।
मित्रों एवं शुभचिंतकों की सहायता से रुग्णालय का शुल्क कुछ दिनों का समय लेकर चुका सका, किंतु तब भी मैंने पराजित होना स्वीकार नहीं किया। इस बीच मुझे स्वास्थ्य लाभ के लिए गाँव जाना पड़ा। क्योंकि यहाँ अकेले अपनी देखभाल कठिन थी। फिर अम्मा-बाऊ का आदेश भी था, वे भी घबराए हुए थे।
अनेक झंझावातों से जूझते हुए जब इसका प्रथम प्रारूप लिख दिया। तब ऐसा संतोष हुआ कि अब यह शरीर छूट जाए तो कोई दुःख या निराशा नहीं होगी। 42 वर्ष का जीवन भी कम नहीं होता। इधर के चार वर्ष मेरे जीवन संघर्ष के उच्चतम वर्ष रहे। इस समय ने मुझे थोड़ा और सहज बनाया। यह ग्रंथ मेरे आठ वर्षों की सघन साधना और चिंतन का मूल है।
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