प्राचीन काल में उज्जैनी नगरी अखंड भारत की विश्व-प्रसिद्ध प्रा राजधानी थी। गुप्त-वंश सहित कई प्रमुख राजवंशों ने उज्जैनी की पावन नगरी से भारत पर शासन किया। राजनैतिक महत्व के साथ-साथ इस नगरी को धर्म, कला और विज्ञान का भी प्रमुख केंद्र होने का गौरव प्राप्त था। आज भी इस नगरी के निकट उस युग के अनेक अवशेष प्राप्त हैं जो इन तथ्यों के प्रमाण हैं।
ऐसा ही पुरातन प्रतीक है उज्जैनी का महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जो भगवान महादेव के १२ ज्योतिर्लिंगों में एक है। 'काल' समय का पर्यायवाची शब्द भी है, अतः 'महाकाल' का शाब्दिक अर्थ है 'समय के भगवान'। अर्थात पूरे विश्व का समय भगवान महाकाल के अधीन था। उज्जैनी से जाने वाली देशांतर रेखा ही पूरे विश्व की काल निर्धारण रेखा हुआ करती थी, जैसे कि आज ब्रितन की ग्रीनविच रेखा। जबकि सहस्रों वर्षों तक भारत ने समस्त विश्व को समय का संदर्भ प्रदान किया, अंग्रेजों ने उस अधिकार को उस समय हड़प लिया जब उन्होंने भारत का उपनिवेश किया। विश्व भर की तिथि और समय रेखा ही उनके अधीन नहीं थी, बल्कि संवत का संचालन भी यहीं से होता था। हिंदू समाज आज भी विक्रमी संवत का पालन करता है, जिसका नाम गुप्त वंश के चंद्रगुप्त 'विक्रमादित्य' के नाम पर रखा गया। भले ही ईसाई कैलेंडर अब विश्व भर में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता हो, हिंदू त्योहारों और अनुष्ठानों को विक्रमी संवत द्वारा ही निर्देशित किया जाता है जो प्राचीन वैदिक संवत से भी मेल खाता है।
हमारे स्वर्णिम इतिहास की बहुत सी रोचक कथाएँ उज्जैनी से जुड़ी हैं। इनमें से ही एक है सम्राट चंद्रगुप्त 'विक्रमादित्य' व उनकी सम्राज्ञी ध्रुवस्वामिनी की कथा - जिसे काव्य-रूप में कहने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है। इन दो प्रमुख पात्नों के अतिरिक्त इस कथा के मुख्य पात्र हैं, चंद्रगुप्त के पिता सम्राट समुद्रगुप्त व उनकी सम्राज्ञी दत्तादेवी, समुद्रगुप्त की ज्येष्ठ संतान दासीपुत्त्र रामगुप्त, और विदेशी आक्रमणकारी शकों का सेनापति ।
यह तत्कालीन भारत का सौभाग्य ही था कि भले ही ज्येष्ठ होने के नाते रामगुप्त अपने पिता का प्रथम उत्तराधिकारी बना, विदेशी आक्रमण के रूप में आई घोर विपदा ने उसकी कायरता और अयोग्यता को समय रहते सिद्ध कर दिया। और साथ ही साथ चंद्रगुप्त की वीरता और परिपक्वता को प्रकट किया, जिसके परिणामस्वरूप जनता ने चंद्रगुप्त को अपना सम्राट माना। अन्यथा उसी समय से भारत विदेशी शासन के अधीन रहा होता।
परोक्ष रूप से यह कथा संतान के चरित्न निर्माण में उसकी माता के चिर योगदान का महत्व भी दर्शाती है। यद्यपि रामगुप्त और चंद्रगुप्त दोनों ही परम पराक्रमी सम्राट समुद्रगुप्त के पुत्न थे, रामगुप्त का पालन-पोषण एक संस्कारहीन दासी ने किया और चंद्रगुप्त का उसकी सुसंस्कारी धर्मज्ञ माँ दत्ता देवी ने, और इस कारण दोनों के चरित्न में धरती व आकाश का अंतर रहा। यदि पिता की वीरता का अंश ही पर्याप्त होता तो हमारे इतिहास में वीर जननियों को वह सम्मानित स्थान न मिला होता जो श्रीराम की माता देवी कौशल्या और श्रीकृष्ण की माता यशोदा को मिला, जो छत्त्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई और महाराणा प्रताप की माता जयवंता बाई को मिला।
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