लेखक परिचय
डॉ. राजा भोज शर्मा एक प्रखर शिक्षाविद्, कॉरपोरेट विशेषज्ञ और राष्ट्रचिंतक विचारक हैं, जिनका जीवन शिक्षण, शोध और सामाजिक चेतना को समर्पित है। उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय के वाणिज्य संकाय (एबीएसटी विभाग) से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है और वे भारतीय कंपनी सचिव संस्थान (ICSI) के फैलो सदस्य हैं। इसके अतिरिक्त वे कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय व्यावसायिक संगठनों से जुड़े हुए हैं। कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR), कॉरपोरेट गवर्नेस, आयकर नीति, सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं आदि पर उनका गहन शोध और व्यावहारिक अनुभव उन्हें वाणिज्य और नीति निर्माण के क्षेत्र में एक सशक्त स्तंभके रूप में स्थापित करता है। उन्होंने कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोधपत्र प्रस्तुत किए हैं और राजस्थान विश्वविद्यालय के शोध प्रतिनिधि के रूप में भी चयनित रहे हैं। वर्तमान में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज में वाणिज्य विभाग में सह-आचार्य के रूप में कार्यरत हैं। डॉ. शर्मा आज के भारत को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि संस्कार, विचार और संगठन के स्तर पर जागरूक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं। इसी भावनात्मक प्रतिबद्धता और वैचारिक स्पष्टता का परिणाम है उनकी वर्तमान पुस्तक "विकसित भारत में पंच परिवर्तन की संकल्पना जो भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं नीति संबंधी पुनरुत्थान का मार्ग सुझाती है। उनका मानना है कि सशक्त राष्ट्र का निर्माण केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि संगठित चिंतन, समरस समाज और सक्रिय नागरिकता से होता है। यह पुस्तक उनके उसी चिंतन की साहित्यिक अभिव्यक्ति है।
पुस्तक परिचय
भारत की प्राचीन सांस्कृतिक, सामाजिक और दार्शनिक विरासत को आधुनिक विकास की दृष्टि से जोड़ने का सार्थक प्रयास प्रस्तुत करती यह पुस्तक "विकसित भारत : पंच परिवर्तन (एक महत्वपूर्ण पहल)" आज के भारत के समग्र राष्ट्रनिर्माण का एक वैचारिक दस्तावेज है। पुस्तक का मुख्य आकर्षण पंच परिवर्तन के सिद्धांत, उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि तथा समाज, परिवार और राष्ट्र पर उनके दूरगामी प्रभावों पर केंद्रित है। वर्तमान वैश्विक और राष्ट्रीय परिदृश्य में भारत तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में पंच परिवर्तन केवल नीतिगत या वैचारिक अवधारणा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय दायित्व का समन्वित मार्ग है। यह पुस्तक स्पष्ट करती है कि पंच परिवर्तन व्यक्तिगत विकास से लेकर सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय उन्नति तक, प्रत्येक स्तर पर दिशा प्रदान करते हैं। इस पुस्तक के मुख्य अध्याय पंच परिवर्तन के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आयामों को सशक्त रूप से प्रस्तुत करते हैं - > समरसता अभिनव भारत का सामाजिक एकीकरण के प्रति दृष्टिकोण » परिवार एक धरोहर सांस्कृतिक एकता और निरंतरता की कहानी (कुटुंब की जड़ेंः संस्कृति और मूल्यों का संरक्षण) » स्वावलंबन और आत्मनिर्भरताः भारत की प्रगति की कुंजी > भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण (पंच परिवर्तन की अवधारणा के संदर्भ में) नागरिक कर्त्तव्य और राष्ट्रीय चरित्रः एक स्वस्थ समाज की नींव वास्तव में पंच परिवर्तन की मूल अवधारणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा प्रतिपादित की गई है, जिसे उन्होंने सेवा, संस्कार और राष्ट्र निर्माण की दीर्घकालिक दृष्टि के साथ विकसित किया। संघ के सामाजिक कार्य, मूल्य-आधारित चिंतन और राष्ट्र चेतना के प्रयासों के बिना पंच परिवर्तन की संपूर्ण समझ अधूरी रहती है। इसी कारण इस पुस्तक में "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघः राष्ट्र निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ" नामक अध्याय का समावेश अत्यंत आवश्यक और सार्थकता हेतु किया गया हैं, जिससे पाठक को सेवा-भाव, मूल्य शिक्षा और सामाजिक उत्तरदायित्व की गहन समझ प्राप्त हो सके।
पुस्तक में पंच परिवर्तन की अवधारणा को और अधिक व्यापक तथा प्रभावी बनाने हेतु तीन विशेष अध्याय भी सम्मिलित किए गए हैं - > पंच परिवर्तन एवं महिलाएँ समाज में महिलाओं की निर्णायक भूमिका, उनके सशक्तिकरण और नेतृत्व क्षमता को रेखांकित करता है। > डिजिटल युग में पंच परिवर्तन अवसर और चुनौतियाँ - वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गत्यात्मक तकनीकी परिवर्तन, डिजिटल सशक्तिकरण तथा उससे उत्पन्न अवसरों और चुनौतियों का यथार्थपरक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। » विकसित भारत में युवा पंच परिवर्तन का उत्प्रेरक युवा शक्ति को परिवर्तन का मार्गदर्शक और राष्ट्र निर्माण का सक्रिय आधार स्तंभमानते हुए उनकी भूमिका को स्पष्ट करता है। इन सभी अध्यायों के माध्यम से पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि समरस समाज, सशक्त परिवार, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण और कर्त्तव्यनिष्ठ नागरिक ही विकसित भारत की वास्तविक पहचान हैं। यह पुस्तक केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पाठकों में क्रियाशील चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र के प्रति आत्मीयता का संचार करती है। इसमें प्रस्तुत विचार, उदाहरण और विश्लेषण पाठकों को यह विश्वास दिलाते हैं कि एक नागरिक के रूप में उनके छोटे-छोटे सकारात्मक प्रयास भी व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय परिवर्तन का आधार बन सकते हैं। विशेष रूप से यह पुस्तक युवाओं, शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों के लिए उपयोगी है, जो नई सोच के साथ राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं। यह स्पष्ट करती है कि व्यक्तिगत विकास और सामाजिक सुधार परस्पर जुड़े हुए हैं और दोनों मिलकर ही एक सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर सकते हैं। अंततः, "विकसित भारत: पंच परिवर्तन (एक महत्वपूर्ण पहल)" केवल एक वैचारिक या शैक्षणिक ग्रंथ नहीं, बल्कि राष्ट्र चेतना, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक उत्तरदायित्व को जागृत करने वाला प्रेरणास्रोत है। यह पुस्तक प्रत्येक पाठक को यह आत्मविश्वास देती है कि पंच परिवर्तन के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तीनों को एक नई दिशा और ऊँचाई प्रदान की जा सकती है।
विकसित भारतः पंच परिवर्तन (एक महत्त्वपूर्ण पहल) इसके अंतर्गत विकास के उचित रूप को स्पष्ट करके पाठक एवं श्रोता की विशिष्ट जिज्ञासाओं का समाधान करने का प्रयास किया गया है कि - विकास किसके लिए, किस दिशा में और किन मूल्यों के साथ हो? आज जब भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब सामाजिक समरसता, सशक्त परिवार, स्वावलंबन, पर्यावरण-संतुलन और नागरिक कर्तव्य जैसे प्राचीन भारत के सार्थक चिंतन वर्तमान में और भी प्रासंगिक हो गए हैं। यह पुस्तक समाज के माध्यम से पंच परिवर्तन के द्वारा इन्हीं चिंतनों का उत्तर खोजने का प्रयास करती है। यह कृति बताती है कि विकसित राष्ट्र का निर्माण केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के विचार, व्यवहार और दायित्व बोध से होता है। जब समाज में समरसता होती है, परिवार मजबूत होते हैं, नागरिक स्वावलंबी बनते हैं और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित होती है, तभी विकास स्थायी और सर्वसमावेशी बनता है। सरल भाषा, समकालीन संदर्भों, वैश्विक चिंतन पर आधारित भारतीय दृष्टि के साथ लिखी गई यह पुस्तक छात्रों, शिक्षकों, युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विचारशील पाठकों सभी को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। आइए मिलकर सोचें, विचार बनाएं -॥ घर, समाज, परिवार में पंच परिवर्तन लाएं ॥
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