कार्ल मार्क्स का एक कथन है कि धर्म लोगों के लिए अफीम का नशा है। इस विचार का खण्डन इस नाटक की सत्य कथा बड़ी प्रचण्डता से करती है। यह खण्डन विश्व में केवल भारत के सनातन हिन्दू धर्म के द्वारा ही किया जा सकता था और यह खण्डन विष पान की इस सत्य कथा के द्वारा शाब्दिक कल्पना से नहीं अपितु क्रियात्मक व्यवहार से किया गया था।
इस नाटक की कथा-वस्तु कल्पना और वास्तविकता पर आधारित है। इसका कथानक, पात्र, संवाद, घटनाक्रम आदि सभी सत्य और कल्पना पर आश्रित हैं। इसके महत्त्वपूर्ण पात्र जीवन्त हैं अर्थात् जीवन की घटनाओं से लिए गए हैं। यह सत्य कथा आज से चार सौ वर्ष पूर्व इस पृथ्वी पर घटित हुई थी।
इसके तीन पात्र भगवान्, नारायण और जहाँगीर उस समय के हाड़-माँस युक्त मानव थे। जहाँगीर तो इतिहास-पुरुष था। अहंकारी बादशाह था। भगवान् अपने समय के उच्च कोटि के योगीराज थे और नारायण महानात्मा थे। चमत्कारों को नाटक की आवश्यकता के अनुसार लिया गया है। भगवान् के ज्येष्ठ शिष्य और नारायण के गुरु भाई महेशदास के चमत्कारों को बिल्कुल भी स्पर्श नहीं किया है। बहुत से अन्य चमत्कारों का भी परित्याग किया गया है। मृत नारायण को जीवित करने के चमत्कार को अपने ढंग से प्रस्तुत किया है।
हिन्दू संस्कृति के संरक्षक भगवान् जी का जन्म एक महात्मा के आशीर्वाद से हुआ था। यह महात्मा नाथ-सम्प्रदाय के एक योगी थे। इनका नाम योगी तारानाथ था। नाथ जी एक अन्तर्यामी योगी थे। वैसे तो वह सिद्ध-पुरुष थे और रमते राम थे, परन्तु राजपूतों के प्रेम और भगवान् जी के पिता की सेवा ने उन्हें कहीं और नहीं जाने दिया। उन्हें शहर से बाँध लिया था।
पिंडोरी के घने जंगल में 'पिंडोरी धाम' की स्थापना म्लेच्छ बादशाह जहाँगीर के द्वारा की गई थी। बादशाह द्वारा बनाये गए मस्जिदाकार मन्दिर में भगवान् जी की पावन समाधि है। जहाँ हिन्दू पद्धति से प्रातः-सायं पूजा-आरती होती है। पिंडोरी धाम में जहाँगीर ने भगवान् जी की तपस्या के लिए गुफा का भी निर्माण करवाया था। वहाँ जो 'श्वेत संगमरमर का एक सिंहासन है। पंजाब के श्री महाराज रणजीत सिंह की धर्मपत्नी महारानी ज़िन्दां ने श्रद्धापूर्वक नवम श्रीगादी आचार्य स्वामी श्री नरोत्तमदास जी के समय में दरबार को भेंट किया था।' [पिंडोरी धाम (इतिहास), पृष्ठ 4, लेखक प्रीतम ज्याई, भूतपूर्व प्रधान सम्पादक, दैनिक 'वीर भारत', देहली।
भगवान् जी के शिष्य नारायण जी अद्भुत योगी थे। वह कालकूट विष पीकर भी जीवित रहे। उन पर विष का कु-प्रभाव कुछ भी नहीं हुआ था। यह देखकर उनके गुरु के सम्मुख अहंकारी जहाँगीर बादशाह नत-मस्तक हुआ था। नारायण योगी थे। हठयोगी थे। नाथ सम्प्रदाय के हठ योग के अभ्यासी थे। उनकी इस तपोबल की शक्ति को जनता जानती थी। 'श्री नारायण जी को लोग हठी नारायण भी कहते थे। कारण यह था कि आपने चिरकाल तक हठ-योग का अभ्यास किया था।' [पिंडोरी धाम (इतिहास), लेखक- प्रीतम ज्याई, पृष्ठ 47]
कालकूट विष-पान के उपरान्त जहाँगीर बादशाह अपनी पारिवारिक और राजसिक बहुत सी समस्याओं से पीड़ित हुआ, तो उसे नारायण जी की याद आई। वह उस घने पिंडोरी नामक वन में उन्हें खोजता हुआ आया, तो भगवान् जी के ज्येष्ठ शिष्य महेशदास जी से मिला और यह जानकर आश्चर्य चकित हुआ कि नारायण जी जीवित ही नहीं अपितु स्वस्थ भी हैं। यह सुनकर जहाँगीर को विस्मित और अवाक् देख कर महेशदास जी के मुँह से निकला, "इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है, नारायण तो योगी हैं। उनमें करामात होनी ही चाहिए।" [पिंडोरी धाम (इतिहास), लेखक प्रीतम ज्याई, पृष्ठ 34] नारायण जी योगी थे और हठयोगी थे। हठयोग के प्रवर्तक गोरखनाथ जी माने जाते हैं। हठयोग पर लिखित सर्वप्रसिद्ध ग्रन्थ 'हठयोग प्रदीपिका' के लेखक स्वामी स्वात्माराम थे। वह गोरखनाथ जी के शिष्य थे।
'गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर ने 'दी मुग़ल एण्ड सिक्ख रूलर्ज एण्ड दी वैष्णवाज ऑफ दरबार पिंडोरी' नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखकर इस स्थान की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करके इसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्रदान की है।' [योग-लीलायें, लेखक चरणदास शास्त्री, भूमिका, पृष्ठ ख] विष-पान की 'इस घटना के सम्बन्ध में पंजाब सरकार का जो गजेटीयर (Gazetteer) - सन् 1914 ई. में प्रकाशित हुआ था, उसमें लिखा है कि बादशाह जहाँगीर वन में शिकार खेलने आया करता था। काहनूवान में श्री भगवान् की ख्याति सुनकर उसके मन में उनके दर्शन की इच्छा उत्पन्न हुई। ये महात्मा बादशाह से मिलना नहीं चाहते थे। इसलिए भूमि के अन्दर ही अन्दर पिंडोरी की ओर चले गए। । जहाँगीर ने पिंडोरी में उनके शिष्य नारायण जी से भगवान् का पता पूछा... उन्होंने कोई उत्तर न दिया। इस पर बादशाह उन्हें लाहौर ले गया।' [पिंडोरी धाम (इतिहास), लेखक प्रीतम ज्याई, पृष्ठ 31-32.] वहाँ उन्हें हलाहल विष दिया गया।
इस सत्य कथा पर लेखनी चलाने का प्रयास मैंने तीन बार किया था। प्रथम बार एक दीर्घ कविता की रचना करनी चाही थी, परन्तु अभिलाषा पूर्ण न हो सकी। कुछ वर्ष पश्चात् इस पर एक कहानी कहने का प्रयत्न किया, किन्तु पुनः असफलता हाथ लगी थी। अब अन्तिम बार यह नाटक लिखा है। आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस विष पान की सत्य कथा पर लिखने की अभीप्सा मुझ में कितनी प्रबल रही होगी। काहनूवान गुफा की छत के जल से मैंने लड़कपन में कई बार टीका लगाया था, पर अब जल सूख चुका है। धर्म यदि अफीम का नशा होता तो इस सत्य कथा का नायक पिंडोरी वन के किसी कोने में पड़े पड़े विलुप्त हो गया होता। धर्म केवल स्वयं जाग्रत ही नहीं रहता अपितु अपने युग के समाज को भी जाग्रत करता है तथा उसे दिव्य अमृत प्रदान करता है।
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