आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कालजयी निबंध 'कविता क्या है ?' के सभी प्रारूपों को एक ही जिल्द में विन्यस्त करके नागरीप्रचारिणी सभा प्रसन्नता और आत्मविश्वास का अनुभव कर रही है। ये सभी प्रारूप 1908 से 1930 के बीच बाइस वर्षों की अवधि में लिखे गए। पहला प्रारूप लिखते समय शुक्लजी महज़ 24 वर्ष के थे और यही प्रारूप आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा किए गए प्रभूत संशोधनों के साथ 'सरस्वती' के अप्रैल, 1909 अंक में प्रकाशित हुआ। शुक्लजी के हस्तलिखित प्रारूप और द्विवेदीजी द्वारा उसी प्रारूप पर किए गए संशोधनों के बाद अप्रैल, 1909 की 'सरस्वती' में प्रकाशित प्रारूप में बहुत फ़र्क़ है। इस पुस्तक में हमने शुक्लजी द्वारा हस्तलिखित प्रारूप को 'पहला' और द्विवेदीजी द्वारा किए गए संशोधनों के साथ 'सरस्वती' में प्रकाशित प्रारूप को 'दूसरा' माना है।
नागरीप्रचारिणी सभा के संग्रह में से आचार्य शुक्ल के मूल हस्तलेख और उस पर द्विवेदीजी द्वारा किए गए संशोधनों को पहली बार हिंदी-संसार के सामने प्रस्तुत करते हुए हम बहुत संतुष्ट हैं। 'परिशिष्ट' के अंतर्गत हस्तलेख की मूल प्रति तो प्रकाशित है ही, द्विवेदीजी द्वारा उस पर किए गए संशोधनों के साथ वही प्रति 'पहले प्रारूप' के तौर पर टंकित-मुद्रित रूप में भी पढ़ी जा सकती है- जहाँ शुक्लजी के वाक्य काली सियाही से अंकित हैं और उस मजमून पर द्विवेदीजी द्वारा किए संशोधनों को लाल रंग से दर्शाया गया है। हमें यक़ीन है कि अपनी अनमोल अंतर्दृष्टियों की वजह से यह 'पहला प्रारूप' विज्ञ पाठकों, अनुसंधाताओं और साहित्य के विद्यार्थियों के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।
लेखन एक सामूहिक प्रयत्न है और लेखन का अनिवार्य एकांत अनेक उपस्थितियों से मिलकर संपूर्ण होता है- इस धारणा के सत्यापन के लिये हिंदी साहित्य के इन दो मूर्धन्यों की आपसदारी से बढ़कर भला और कौन सा साक्ष्य चाहिए।
वर्तनी हमारा सबसे मुश्किल सरोकार है। अलग-अलग प्रकाशित प्रारूपों में अलग-अलग वर्तनियाँ मिलीं- हमने यथासंभव उन भेदों का समाधान किया है। लंबे समय से चली आ रही भूलों-चूकों को सुधारा है, यथास्थान नुक्ते लगाए हैं- गौरतलब है कि अपने मजमूनों में शुक्लजी नुक़्ते लगाना कभी नहीं भूलते और उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशकों को नुक़्ते लगाना कभी याद नहीं आता। बहरहाल, शुक्लजी द्वारा उद्धृत कविताओं और वचनों को भी मूलपाठ से मिला लिया गया है और ज़रूरत पड़ने पर पाद-टिप्पणियाँ दे दी गई हैं।
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