जीवन का प्रथम सुख है-नीरोगी काया, यानी आरोग्यता। स्वास्थ्य प्रकृति की अनुपम देन है। इस स्वास्थ्य को बनाए रखना ही जीवन का मूल है। मानव के द्वारा औषधीय पेड़-पौधों के उपयोग का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना कि स्वयं मनुष्य की उत्पत्ति का इतिहास। आदिकाल में सब प्रकार के ज्ञान को मौखिक प्रक्रिया के द्वारा जीवंत रखा गया। जड़ी-बूटियों से चिकित्सा का ज्ञान गुरु से शिष्य, घर के बड़े-बुजुर्गों से अगली पीढ़ी को स्थानांतरित होता रहा। कालांतर में और हजारों वर्ष पूर्व यह ज्ञान ताड़पत्र, भोजपत्र या शिलालेखों के माध्यम से सुरक्षित रखा जाने लगा। लेखन और छापाखानों के विकास के साथ बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे गए और यह प्रक्रिया आज तक अबाध रूप से जारी है। मानव शरीर का बीमारियों से चोली-दामन का साथ रहा है। ऐसा व्यक्ति मिल पाना असंभव-सा है, जो कभी किसी व्याधि से पीड़ित नहीं हुआ हो। मनुष्य का पेट 'बीमारियों का घर' कहा जाता है। मनुष्य जब-जब प्रकृति के विपरीत जाता है, तब-तब रोग और व्याधियाँ उसे जकड़ लेती हैं। पंच-भौतिक शरीर में वात-पित्त-कफ के वैषम्य असंतुलन से रोगों की उत्पत्ति होती है। प्रत्येक व्यक्ति में ये तीनों (वात-पित्त-कफ) विद्यमान रहते हैं, परंतु प्रत्येक शरीर में इनमें से किसी एक तत्त्व की प्रधानता रहती है। वर्तमान में व्यस्ततम दिनचर्या, तरह-तरह के तनाव, खाद्य-वस्तुओं में मिलावट, नाना प्रकार के प्रदूषण, कृषि में रासायनिक खाद तथा कीटनाशकों के अधिकाधिक प्रयोग से विभिन्न प्रकार की बीमारियों का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। प्रकृति ने मानव को स्वस्थ पर्यावरण के साथ-साथ कुछ अनमोल उपहार भी दिए हैं; ये अमूल्य उपहार हैं-पेड़-पौधे-लताएँ अर्थात् वनस्पतियाँ-जड़ी बूटियाँ। जीवन की बहुलांश चीजें इन पेड़-पौधों से ही प्राप्त होती हैं। इन सबका उपयोग हम अपने दैनिक जीवन में किसी-न-किसी रूप में करते ही हैं। परंतु उस समय हम इनके औषधीय और आरोग्यकारी गुणों से अनभिज्ञ रहते हैं। अगर हम सब इनके बारे में थोड़ी-सी जानकारी रखें या इनके गुणों से परिचित हो जाएँ तो घर-परिवार में, दैनिक जीवन में होने वाली छोटी-मोटी बीमारियों तथा कटने, फटने, जलने आदि के उपचार के लिए डॉक्टरों के पास दौड़ना न पड़ेगा, उनकी क्लीनिकों में घंटों इंतजार न करना पड़ेगा तथा धन का अपव्यय भी न होगा। पेड़-पौधों के रूप में जड़ी-बूटियों का चिकित्सा के रूप में उपयोग हमारी घरेलू चिकित्सा का एक अभिन्न हिस्सा है, जो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे घर-परिवार में प्रचलित रहा है। आधुनिकता के चक्कर में पड़कर और तुरंत फायदे के लालच में हमने अपने घरेलू उपचारों को भुला दिया है। सब ओर अंग्रेजी दवाओं का बोलबाला हो गया। परंतु आज हम ही क्यों, सारी दुनिया के लोग अंग्रेजी दवाओं के दुष्प्रभावों से तंग आ गए हैं और अब वे आयुर्वेद तथा देसी चिकित्सा की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इन अंग्रेजी दवाओं से विमुख होने का एक कारण तो यह है कि ये दवाइयाँ रोग में क्षणिक और त्वरित आराम तो दिलाती हैं, परंतु इनका शरीर पर साइड इफैक्ट अवश्य होता है। इसके ठीक विपरीत जड़ी-बूटियों यानी देसी चिकित्सा में इतनी निश्चितता अवश्य है कि आप दवा कम मात्रा में खाएँ या ज्यादा, कोई चिंता की बात नहीं; रोग में आराम भले ही देर से मिले, लेकिन शरीर पर दुष्प्रभाव बिल्कुल नहीं होते। आयुर्वेदिक दवाइयाँ रोग को दबाती नहीं बल्कि धीरे-धीरे जड़ से समाप्त कर देती हैं। आज पश्चिम के अनेक देश आयुर्वेदिक चिकित्सा को अपने यहाँ भरपूर प्रोत्साहन दे रहे हैं। प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ रोग निवारण एवं स्वास्थ्य-लाभ में अत्यंत उपयोगी हैं
प्रेमपाल शर्मा जन्म : 5 जुलाई, 1963 को बुलंदशहर (उ.प्र.) के मीरपुर-जरारा गाँव में। कृतित्व : विश्वप्रसिद्ध वनस्पतिविद् एवं वन्यजीव विज्ञानी डॉ. रामेश बेदी के सान्निध्य में अनेक वर्षों तक शोध सहायक के रूप में कार्य एवं 'बेदी वनस्पति कोश' (छह खंड) का सफल संपादन। 'सवेरा न्यूज' साप्ताहिक में स्वास्थ्य कॉलम एवं संपादकीय लेखन के साथ-साथ आकाशवाणी (मथुरा व नई दिल्ली) से वार्ता आदि प्रसारित; 'टू मीडिया' मासिक पत्रिका द्वारा 'प्रेमपाल शर्मा : साहित्य के दीपक' शीर्षक व्यक्तित्व कृतित्व पर विशेषांक प्रकाशित। रचना-संसार : 'निबंध, पत्र एवं कहानी लेखन', 'सुबोध हिंदी व्याकरण', 'जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियाँ', 'स्वास्थ्य के रखवाले, शाक-सब्जी-मसाले', 'सचित्र जीवनोपयोगी पेड़-पौधे', 'संक्षिप्त रामायण', 'स्वस्थ कैसे रहें?', 'स्वदेशी चिकित्सा सार', 'घर का डॉक्टर', 'शुद्ध अन्न, स्वस्थ तन', 'नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे' (यात्रा संस्मरण); 'हिंदी काव्य धारा' (संपादन), 'स्मृतियों के मोती' (संस्मरण), 'डॉ. स्मरजीत जैना अँधेरी जिंदगियों में रोशनी के मसीहा' (जीवनी)। पुरस्कार-सम्मान : श्रीनाथद्वारा की अग्रणी संस्था साहित्य मंडल द्वारा 'संपादक-रत्न' एवं 'हिंदी साहित्य मनीषी' की मानद उपाधि। संप्रति : आयुर्वेद पर शोध एवं स्वतंत्र लेखन।
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