रवीन्द्रनाथ अनेक अर्थों में अद्वितीय थे। उनके मस्तिष्क की सृजनात्मक उर्वरा शक्ति अद्वितीय थी। नौ वर्ष की अवस्था में उन्होंने कविता लिखना आरंभ कर दिया। १२-१३ वर्ष की अवस्था में उन्होंने 'पृथ्वीराज पराजय नामक नाटक लिखा और शेक्सपियर के 'मैकवेध' का बंगला में अनुवाद किया। उसके पश्चात बंगला साहित्य का कोई भी अंग उनसे अछूता नहीं रह गया। उन्होंने उसके प्रत्येक अंग को अपनी प्रतिभा से सुशोभित किया।
यद्यपि वे मुख्यतः एक कवि थे, उन्होंने ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र के संबंध में लिखा और उपदेश किया क्योंकि मिल्टन की तरह उनका भी यह विश्वास था कि कवि का क्षेत्र व्यापक ज्ञान का क्षेत्र है।
वे संगीतज्ञ एवं अभिनेता थे। वे दार्शनिक, धर्म एवं समाज-सुधारक शिक्षा विशेषज्ञ, राष्ट्रवादी एवं देशभक्त, मानवादी तथा 'वसुधैव कुटुम्ब-कम' सिद्धान्त के प्रतिपादक थे ।
उन्होंने विज्ञान पर एक ग्रंथ लिखा। जीवन के अंतिम काल में वे चित्रकारी भी करने लगे। प्रत्येक क्षेत्र में उन्होंने अन्द्भूत सफलता प्राप्त की। कहा जाता है कि उनके जैसा महान गीतकार विश्व में कभी कोई नहीं हुआ। प्रधानया, वे प्रेम एवं सौंदार्य के कवि थे। उनकी दृष्टि में अंत और अनंत के बीच सौंदर्य का आदान प्रदान हुआ है। वे सौंदर्य को स्वर्ग एवं धरती के बीच वैवाहिक संबंध का प्रतीक मानते थे ।
साहित्य में बहुमुखीपन, सजीवता एवं दिन प्रति दिन नये विचारों का सृजन तथा उनकी अभिव्यक्ति उनकी प्रतिभा की विषशेता है।
उनके द्वारा लिखे गये उन गीतों की ही संख्या लगभग दो हजार है जिन्हे संगीत की ध्वनि प्रदान की गई है और प्रत्येक गीत के लिये संगीत की रचना भी उन्होंने स्वयं की। उनके पहले शूबर्ट को सभी युगों का सबसे बड़ा गीतकार समझा जाता था; परंतु शूबर्ट ने लगभग ६०० गीत ही लिखे थे। रवीन्द्रनाथ ने हमें अपना राष्ट्रीय गान 'जन गण मन'दिया । उन्होंने संगीत एवं कविता में नयी मात्राओं तथा नये रूपों को जन्म दिया ।
रवीन्द्रनाथ बंगला आलोचना साहित्य के पिता थे। उन्होंने नयी साहित्यिक अभिव्यक्तियों का सूर्जन किया। उनकी रचनायें विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित हुईं और १९१३ में, साहित्य में उन्हें 'नोवेल' पुरस्कार देकर पाश्चात्य देशों ने भी उनकी प्रतिभा को मान्यता प्रदान की।
वे एक महान उपदेशक, कट्टर मानववादी तथा सत्य एवं न्याय के महान अग्रदूत थे ।
वे १९२५ में प्रथम भारतीय दार्शनिक कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये और इस प्रकार दार्शनिक विचारक के रूप में उन्हें मान्यता प्रदान की गई। इसके बाद उनसे "हीबर्ट" भाषण करने को कहा गया। ये भाषण एक पुस्तक के रूप में 'मानव धर्म' के नाम से प्रकाशित हुये हैं।
उन्होंने यूरोप, अमेरिका तथा एशिया में दूर दूर तक यात्रायें कीं और वे अंतर्राष्ट्रीय कवि, साहित्यिक विभूति एवं मानव धर्म के उपदेशक के रूप में सारे विश्व में प्रख्यात हो गये ।
उनकी अंतर्राष्ट्रीयता का यह अर्थ नहीं कि वे राष्ट्रवादी तथा देशभक्त नहीं थे। जलियानवाला बाग के वीभत्स काण्ड के पश्चात वे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी 'सर' की उपाधि को तिलांजलि दी ।
इलाचन्द्र जोशी एक पीढ़ी से रवीन्द्रनाथ की रचनाओं एवं उनके दर्शन के विद्यार्थी रहे हैं। आपने उनका गहरा अध्ययन किया है और प्रस्तुत पुस्तक उसी का परिणाम है। इस पुस्तक को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि मानों लेखक रवीन्द्रनाथ के चिर साथी रहे हैं और वे उन्हें बड़े निकट से जानते थे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि हिन्दी प्रेमी जनता इस पुस्तक का स्वागत करेगी।
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