प्राक्कथन
योगवासिष्ठ के अध्येताओं और मननकर्ताओं से यह बात छिपी नहीं है कि यह ग्रन्थ भारत ही नहीं, विश्वसाहित्य में ज्ञानात्मक, सूक्ष्मविचार-तत्त्वनिरूपक तथा श्रेष्ठ सदुक्तिपूर्ण ग्रन्थों में सर्वश्रेष्ठ है यह महारामायण, वासिष्ठरामायण आदि नामों से भी विख्यात है। स्वयं महर्षि वासिष्ठ ही कहा है कि 'संसार-सर्प के विष से विकल तथा विषयविषूचिका से पीड़ित मृतप्राय प्राणियों के लिए योगवासिष्ठ परम पवित्र अमोद्य गरूड़-मंत्र है। इसे सुन लेने पर जीवन्मुक्ति सुख का अनुभव होता है। यह ग्रन्थ महर्षि वशिष्ठ और श्रीराम के संवादों का संकलन है। इस ग्रन्थ में महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम को तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया है। इस ज्ञानोपदेश में वह सबकुछ सन्निहित है, जिससे मनुष्य सच्चे अर्थों में सुखी बन सकता है। सारे विश्व का जिसमें कि अनन्त जीव और उनके संसार हैं-सृष्टिकर्ता ब्रह्मा है। ब्रह्मा का वास्तविक स्वरूप मन है। ब्रह्मा की उत्पत्ति परम ब्रह्म से होती है। यह ब्रह्मारूपी मन ब्रह्मा का स्वाभाविक लीला-जनित स्पन्द है। इस स्पन्दन द्वारा ब्रह्म ब्रह्मा का आकार धारण कर लेता है। यह आकार ब्रह्म की संकल्प-शक्ति का, हेतु-रहित, संकल्पमय रूप में प्रकट होता है। ब्रह्मा की उत्पत्ति किसी पूर्व कर्म के अनुसार नहीं होती। उसका आकार सूक्ष्म है, स्थूल नहीं है। ब्रह्मा इस प्रकार उदय होकर सृष्टि की रचना करता है, और उसकी रची हुई सृष्टि मनोमय है। प्रत्येक कल्प की सृष्टि अपूर्व और नई है। ब्रह्म की जिस स्पन्दन-शक्ति का प्रकाश ब्रह्मा के आकार में होता है उसको ही प्रकृति और माया कहते हैं। ब्रह्म में और भी अनन्त और अनेक शक्तियाँ हैं। ब्रह्म और उसकी शक्ति दो पदार्थ नहीं हैं। ब्रह्म की स्पन्दन-शक्ति सदा ही ब्रह्म के आश्रित रहती हैं, और उससे अनन्य है। सृष्टि के समय वह आकार धारण करती हैं और प्रलय के समय वह ब्रह्म में लीन हो जाती हैं उस परम ब्रह्म का, जिसकी एक मात्र शक्ति से जगत् की सृष्टि, रक्षा और प्रलय होते हैं। क्या स्वरूप है यह कहना मनुष्य के लिये प्रायः असम्भव सा ही है- क्योंकि मनुष्य के पास जितने शब्द, भाव और विचार हैं। वे सब द्वन्द्वात्मक जगत् की वस्तुओं के द्योतक हैं। जो तत्त्व दोनों प्रतियोगी पदार्थों का आत्मा है और जगत् के भीतर और बाहर है और जिससे जगत् के सब दृश्य पदार्थ और उनको जानने वाले द्रष्टाओं की उत्पत्ति हुई, वह भला उन शब्दों द्वारा कैसे वर्णन किया जा सकता है जो इन सबके ही वर्णन करने के लिये बने हैं? इसलिये ब्रहा का वर्णन नहीं हो सकता। वह न यह है और न वह है, इसमें भी है, उसमें भी है, और इस और उस दोनों से परे भी है। ब्रह्म को न एक कह सकते है और न अनेक, क्योंकि दोनों सापेक्षिक हैं। ऐसे ही न ब्रह्म को भावात्मक कह सकते हैं न अभावात्मक, ब्रह्म न ज्ञान है और न अज्ञान, न तम है न प्रकाश, न जड़ है और चेतन, न आत्मा है न अनात्मा। ब्रह्म का क्या स्वभाव है यह कहना भी असम्भव है। ब्रह्म का कोई विशेष नाम भी नहीं हो सकता। ब्रह्म के सम्बन्ध में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह वह परम तत्त्व है जिससे जगत् के सभी पदार्थ उत्पन्न होते हैं, जिसमें स्थित रहते हैं, और जिसमें विलीन हो जाते हैं, जिससे दृष्य, द्रष्टा और दृष्टि उदय होकर उसमें स्थित रहकर उसी में विलीन हो जाते हैं, जो अनुभव में आने वाले सभी प्रकार के आनन्दों का उद्गम है। ब्रह्म अपने उत्पन्न हुए प्रत्येक पदार्थ से कहीं सुन्दर और परिपूर्ण होना चाहिये.
लेखक परिचय
डॉ. मनोज कुमार तिवारी जन्म-1975. काशी विश्वविद्यालय, वाराणसी से बीए ऑनर्स (1995), एम०ए० (1997). पी-एच०डी० (2003) की उपाधि प्राप्त की है। इन्हों ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उतीर्ण की तथा शोध हेतु कनिष्ठ एवं वरिष्ठ वृत्ति प्राप्त की। अपने शोध के दौरान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया। अतिथि प्रवक्ता के रूप में तुलनात्मक धर्म एवं दर्शन विभाग, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में योगदान दे चुके हैं। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के जेनरल फेलो भी रह चुके हैं। अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के संयुक्त मंत्री के रूप में भी योगदान दे चुके हैं। ये कई दार्शनिक संस्थाओं / परिषदों के आजीवन सदस्य है। साठ से अधिक संगोष्ठियों में शोध पत्र प्रस्तुत कर चुके हैं तथा तीस से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हैं। वर्तमान में डॉ० तिवारी सिन्दरी कालेज सिन्दरी, बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय, धनबाद, झारखण्ड में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक एवं अध्यक्ष, दाराणसी से प्रकाशित पत्रिका हाथनिक विमर्श के सम्पादक है।
पुस्तक परिचय
योगवासिष्ठ संस्कृत साहित्य में एक अद्भूत, महान और अनुपम आध्यात्मिक ग्रन्थ है। भारतीय मस्तिष्क की सर्वोत्तम कृतियों में से यह ग्रन्थ एक है। बड़ा ज्ञान प्राप्त करने और बड़ा भाव में स्थित रहकर संसार में व्यवहार करने के निमित्त इस ग्रन्थ का पाठ, मनन और निदिध्यासन सर्वोतम साधन है। इस ग्रन्थ के विषय में कहा गया है कि यह असम्भव है कि कोई इस ग्रन्थ का अध्ययन कर ले और उसको बहाभावना न हो और वह सबके साथ एकता का अनुभव न करे। वेदान्तियों में तो यह उक्ति प्रचलित है कि यह ग्रन्थ सिद्धावस्था में अध्ययन करने योग्य है और दूसरे ग्रन्थ भगवद्गीता, उपनिषद् और ब्रहासूत्र साधनावस्था में अध्ययन किए जाने योग्य है। योगवासिष्ठ में किसी प्रकार की भी साम्प्रदायिकता नहीं है। यह सर्वथा एक दार्शनिक ग्रन्थ है, किन्तु अन्य दार्शनिक ग्रन्थों की तरह रूखी और सूत्रमयी भाषा में नहीं लिखा गया, बल्कि इस ग्रन्थ में रसमय काव्य के रूप में उपाख्यानों और दृष्टान्तों द्वारा उच्च से उच्च और गूढ़ से गूढ़ दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन है। प्रस्तुत कृति में योगवासिष्ठ का परिचयात्मक विवरण प्रस्तुत करते हुए ब्रह्म, जगत्, नियति, पुरुषार्थ, मन, मानसी चिकित्सा, बन्धन, मोक्ष, जीवनमुक्त और सिद्धियों आदि का विश्लेषण एवं सर्वांगीण व्याख्या कर योगवासिष्ठ दर्शन में नवीन दृष्टिकोण समाविष्ठ किया गया है। इस प्रकार यह दर्शन-विषयक समन्वयात्मक रचनाओं की श्रृखला के अन्तर्गत एक मुख्य उपयोगी कड़ी है।
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