पुस्तक परिचय
उत्तर आधुनिक सामयिक वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह का निबन्ध संग्रह 'जिन्दगी के दस्तावेज' गद्य में लिखी गई उनकी उन रचनाओं का संकलन है जिनमें उनकी विचारधारा, जीवन-दर्शन और सामाजिक चिन्तन की अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से उभरकर आती है। साहित्य की विभिन्न विधाओं में अब तक तिरसठ प्रकाशित पुस्तकों के लेखक डॉ० सिंह ने अपने निबन्धों के माध्यम से भी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान हासिल किया है। आपके निबन्ध जीवन की अनुभूतियों को गहराई से अभिव्यक्त करते हुए मानव-जीवन पर ऐसा विमर्श प्रस्तुत करते हैं जिसे पढ़कर पाठक जीवन की सार्थकता और उसकी निस्सारता पर चिन्तन करने के लिए प्रेरित होता है। उनके निबन्ध उनके विचारों के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत करते हैं। सामाजिक राजनीतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक विमर्श से भरे हुए ये निबन्ध हिन्दी-साहित्य में अपने किस्म के अनूठे ही कहे जा सकते हैं। उनके निबन्धों में विचारों का सतत प्रवाह पाठक को शुरू से अन्त तक अपने साथ प्रवाहित करता हुआ उसे चिन्तन की उस उच्चभूमि तक ले जाता है जहाँ से जीवन की खूबसूरती का दर्शन सहज ही उपलब्ध होने लगता है। डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह के निबन्ध सहज, सरल और सुस्पष्ट शैली में लिखे गये हैं। आपके संस्मरणों को पढ़कर कहानी-विधा जैसी आनन्दानुभूति होने लगती है। आपने अपने निबन्धों के विषय में स्वयं लिखा है- 'जिन्दगी के दस्तावेज' मेरे उन निबन्धों का संग्रह है जिसमें मैंने अपने जीवन के कई अनखुले पृष्ठों को सार्वजनिक करने की पहल की है। साथ ही समाज, शिक्षा, जीवन और भारतीय संस्कृति तथा नैतिक मूल्यों की अनिवार्यता पर अपने विचारों को भी मैंने इन निबन्धों में अभिव्यक्ति प्रदान की है.
लेखक परिचय
डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह उत्तर आधुनिक साहित्यकारों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुके हैं। एक जनवरी, सन् 1960 में वाराणसी के बैजलपट्टी, हरहुआ वाराणसी में पिता चन्द्रमा सिंह और माता श्रीमती केवलपत्ती देवी के घर में प्रथम सन्तान के रूप में आपका जन्म हुआ। आपने अंग्रेजी के महान कवि डब्ल्यू०एच०ऑडेन पर अपना शोधकार्य काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सन् 1985 में सम्पन्न किया। आपने अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवायें उत्तर प्रदेश के विभिन्न महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में देते हुए जून 2021 में महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ वाराणसी से सम्बद्ध श्री एस०बी० पी०जी० कॉलेज से अंग्रेजी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्ति प्राप्त की। आपकी आज की अवधि तक तिरसठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बारह उपन्यास, सात कहानी संग्रह, बीस कविता संग्रह, चार निबन्ध संग्रह, तीन अनूदित पुस्तकें तथा अंग्रेजी में भी उपन्यास, कविता तथा निबन्ध विधा में रचनायें सम्मिलित हैं। दहशत, जुर्म, नेपथ्य के अतिथि, खोया हुआ आकाश, अंधेरा चुभता है और टेढ़ा चाँद आपके प्रमुख प्रकाशित उपन्यास हैं। मिट्टी का मकान, प्लीज बिहेव योरसेल्फ, एक दार्शनिक की चूक, खामोश, नीली झील, वह लड़की कहाँ गई और उपन्यास की नायिका आपके प्रमुख कहानी संग्रह हैं। डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह अनेक प्रमुख सामाजिक साहित्यिक और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा विभूषित किये जा चुके हैं। आप वर्तमान समय में ए-55, 212, गौतम गार्डेन कालोनी, शिवपुर बाईपास, वाराणसी, उत्तर प्रदेश में सपरिवार रहते हुए अपनी काव्य साधना में निरन्तर प्रवृत्त हैं। डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह की कृतियाँ निबन्ध संग्रह: अस्तित्व के शाश्वत आयाम परमेश्वर से साक्षात्कार मेरी सोच: मेरी दृष्टि सृजन के वैचारिक आधार जिन्दगी के दस्तावेज मार्क्स का अजायबघर मुहावरे टूट रहे हैं कहानी संग्रह: प्लीज बिहेव योरसेल्फ मिट्टी का मकान एक दार्शनिक की चूक खामोश नीली झील वह लड़की कहाँ गई? उपन्यास की नायिका उपन्यास : दहशत • हस्तक्षेप विक्षोभ अँधेरा चुभता है रास्ते कभी खत्म नहीं होते नेपथ्य के अतिथि जुर्म परिन्दे खोया हुआ आकाश वसन्त की प्रतीक्षा में टेढ़ा चाँद कैंचीधाम के सहयात्री आलोचना : डॉ० राघवेन्द्र नारायण सिंह : सर्जना और आलोचना पुस्तकें बोलती हैं किस देवता की उपासना करें हम ईश्वर उदास है कविता संग्रह : परियों के उस मधुर द्वीप पर पागलों की भीड़ में आकाश को अधिकार जब हम नहीं होंगे है आओ कहीं और चलते हैं फिर उगेंगे पंख मेरे अजनबी इस शहर में जहाँ पर झील बहती है शहर से दूर थी वह झील करो मत झील तुम कलुषित झील के उस पार क्या है कभी तुम झील से मिल लो कहो मत झील से कुछ भी समन्दर बन गई वह झील उसे बस झील मत समझो तुम्हारे पक्ष में नीला आकाश अपना है अँधेरों की खिलाफत मे.
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