पुस्तक परिचय
प्रस्तुत संकलन में बहुस्तरीय सामाजिक स्थितियों में नारी के विविध प्रतिमानों की विवेचना की गई है। भारतीय परम्परा में नारी की छवि, नारीत्व की अवधारणा, प्रतीक और प्रतिमानों के साथ ही अनुभूत आदर्शों का उल्लेख है। मनुस्मृति के समय में स्वतन्त्र नारी की छवि को संभ्रान्त समाज में सम्मान नहीं दिया गया है। समय के साथ पर्दा एकांतता और बालविवाह के कारण मध्यकाल में आर्थिक स्वतंत्रता और समानता की मांग के फलस्वरूप स्त्री पुरूष के बीच प्रतिद्वन्द्विता की प्रवृति बढ़ रही है। प्रस्तुत पुस्तक में भारतीय नारी के प्राचीन, मध्ययुगीन, आधुनिक, भविष्य एवं वर्तमान स्वरूप समेत नारी के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व बौद्धिक विषयों पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला गया है।
यह रचना ग्रन्थ हिन्दी में एम.ए. के विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम पर आधारित पहला प्रयास है। इस रचना में नारी की कोमलतम भावनाओं व भारतीय संस्कृति एवं समाज तथा राष्ट्र की प्रगति एवं नवनिर्माण में नारी योगदान समेत उनकी शूरता वीरता, दृढ़ता व विद्वता का बड़ा ही हृदयकारी चित्रण हुआ है। यह पुस्तक एम.ए. इतिहास के विद्यार्थियों के लिए विशेष उपयोगी साबित होगी। इसके अलावा भारतीय संस्कृति और समाजशास्त्र के लिए विशेष उपयोगी साबित होगी इसके अलावा भारतीय संस्कृति और समाजशास्त्र के विद्याथियों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगी।
लेखक परिचय
डॉ. कमला गुप्ता राँची विश्वविद्यालय से (इतिहास) 1975 में प्रथम श्रेणी से पास की। 1977 में राँची विश्वविद्यालय से ही स्नातकोत्तर की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की। तत्पश्चात 1981 में राँची विश्वविद्यालय में व्याख्याता के पद पर नियुक्त हुई । 1985 में राँची विश्वविद्यालय से ही पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त की। मध्यकालीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति से सम्बन्धित अनेक लेख विभिन्न शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित करने के अतिरिक्त इन्होंने पी-एच. डी. की उपाधि भी दिलायी है। इनकी मौलिक ग्रन्थ की रचना सोशल स्टेटस आफ हिन्दू वीमेन इन नार्दन इण्डिया (1206-1707) नामक पुस्तक इन्टर इंडिया पब्लिकेशन द्वारा 1987 में प्रकाशित हुई। इसका दूसरा संस्करण वीमेन इन हिन्दू सोशल सिस्टम, इन्टर इंडिया पब्लिकेशन द्वारा 2002 में प्रकाशित हुई। बिहार ग्रन्थ अकादमी के द्वारा इनकी पुस्तक "मध्यकालीन उत्तर भारत में हिन्दू महिलाओं की स्थिति" 2008 में प्रकाशित हुई। 1989 में डॉ. कमला गुप्ता मेरिट प्रोमोशन के द्वारा रीडर के पद पर स्थापित हुई। "अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टीच्यूट बोर्ड ऑफ इण्टरनेशनल रिसर्च" ने डॉ. गुप्ता को समाज के प्रति महत्वपूर्ण योगदान के लिए "वीमेन ऑफ दि इयर 2000 से सम्मानित किया है। वर्तमान में डॉ. गुप्ता राँची विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग में रीडर के पद पर कार्यरत हैं।
प्रस्तावना
पुरातन काल से नारी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्था की धुरी रही है। इतिहास साक्षी है, नारी किसी भी पुरूषों से पीछे नहीं रही हैं। नारी ने अपनी कार्य कुशलता, दक्षता व पौरुषत्व के बल पर यह सिद्ध कर दिया है कि यदि वे चाहें, एक बार संकल्प कर ले तो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता एवं विशिष्टता सिद्ध कर सकती है। भारतीय नारियों में वह शक्ति अभी भी मौजूद है, जिसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। नारी शोषण की समाप्ति व अत्याचार का खात्मा नारी चेतना व नारी जागरण से ही सम्भव है। नारी चेतना के प्रस्फुटन से ही पुरुष प्रधान समाज के वर्चस्व की समाप्ति होगी। नारी समाज में परिवर्तन से ही भारतीय समाज में परिवर्तन आयेगा।
नारी और नर दो वर्ग या दो पक्ष नहीं हैं, बल्कि एक ही सत्ता के दो पहलू हैं। दोनों को समान अधिकार समेत विकसित, पुष्पित व पल्लवित होने का अवसर प्रदान करना आज समय की अनिवार्यता है। दोनों की उपयोगिता व महत्ता को स्वीकार किया जाना चाहिए। कोई भी राष्ट्र स्त्री व पुरूष में से किसी एक वर्ग द्वारा समुन्नत नहीं हो सकता। नारी भारतीय समाज की आधी जनसंख्या है। नारी समाज की आधी शक्ति भी है। यह केवल सन्तान सम्पादिक नहीं, बल्कि पालिक व संचालिका भी है। नारी ने समय-समय पर धर्म रक्षार्थ अपने प्राणों की आहुति भी दी है।
पुरूष प्रधान समाज की बर्बरता की वजह से वह अपनी पहचान खोती जा रही है। पुरूष वर्ग का नारी वर्ग के प्रति संकुचित धारणाओं की वजह से वह स्वाबलम्बन की ओर कदम बढ़ाने का साहस नहीं जुटा पा रही है। अनगिनत कुरीतियाँ मूढ़ता व अन्ध विश्वास उनकी स्वतन्त्रता में बाधक है।
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