पुस्तक परिचय
प्राण-प्रतिष्ठा (22 जनवरी 2024 के पावन अवसर पर) पुण्यधरा रघुवर की अवध अवधि दुःख जिसने बरसों बिताई, अश्रु की धार छुपा उसकी सरयु ने प्रभुकुल रीत निभाई। धन्य हुई वो आज अयोध्या सजकर इक दुल्हन की नाई, विश्व करे जयघोष श्रीराम है प्राण प्रतिष्ठा घड़ी शुभ आई ।। भाव विभोर भया भव भारत के हर घर ने खुशियां मनाई, राम विराजेंगे निज मंदिर में जन जन ने थी ये आस जगाई। सैंकड़ों वर्ष से इसकी प्रतीक्षा में जग ने थी अपनी पलकें बिछाई, देश करे जयघोष श्रीराम है प्राण प्रतिष्ठा घड़ी शुभ आई ।। श्यामल वर्ण लटें घुंघराली अलकन चंद्रप्रभा है सुहाई, उन्नत मस्तक कुण्डल कानन नैनन दिव्यसुजोत समाई। कांत किरीट कटिबंध कंकण हार सिंगार सजे रघुराई, देश करे जयघोष श्रीराम है प्राण प्रतिष्ठा घड़ी शुभ आई।
लेखक परिचय
आचार्य सुरेश शर्मा 'भारद्वाज' पिता का नाम: स्व. श्री जीतराम शर्मा शास्त्री माता का नाम: श्रीमती लक्ष्मी देवी जन्मतिथि: 08 मई सन् 1984 शिक्षा: • विशिष्ट शास्त्री, आचार्य साहित्य, दर्शन व ज्योतिष (तीन स्वर्ण पदक प्राप्त). M.A. & Sanskrit, UGC-NET, HPPSC-SET, TET सम्प्रति : सहायक प्रोफेसर साहित्य विभाग, गोरक्षनाथ राजकीय संस्कृत महाविद्यालय नाहन, जनपद- सिरमौर (हिमाचल प्रदेश)-173001 रचनाएँ: 01. देवीचरितम् (खंडकाव्यम्) पंचसर्गात्मक सानुवाद संस्कृतखण्डकाव्यग्रन्थ, 02. श्रीमानणेश्वरचरितम् : स्वेष्टदेवस्तुतिपरक हिन्दी संस्कृतकाव्यग्रन्थ, 03. स्तुतिसप्तशती देवदेवीमुनिभक्तावतारतीर्थमहापुरुषशतकोपेतम्, 04. स्तोत्रमंजरी: विभिन्न देवी देवताओं के 40 स्वरचित स्तोत्र, 05. अभिनवस्तस्तुतिरत्नाकर देवता व छन्दपरक सहस्त्राधिक स्तुतिसंग्रह, 06. अभिनवस्तवमुक्तावली: दिल्ली संस्कृत अकादमी के आर्थिक सहयोग द्वारा प्रकाशित, 07. श्रीरामचरितमानस : मानव जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य, 08. प्रेमाञ्जलि: विशुद्धप्रेमपरक एक अनुपम हिन्दी काव्यग्रन्थ, 09. प्रार्थनाञ्जलि गुरुभक्तिपरक स्वरचित छात्रोपयोगी प्रार्थनाएं, 10. मङ्गलम् शुभमंगलकार्यों में प्रयुक्त होने वाली माङ्गलिक स्तुतियों का संग्रह, 11. हिमाचल की देवगाथाएं (यन्त्रस्थ) : देवभूमि हिमाचल प्रदेश के देवी देवताओं की लोकविख्यात गाथाएं, 12. लघुवृत्तमंजरी (यन्त्रस्य): छात्रोपयोगी महत्वपूर्ण संस्कृत छन्द संग्रह, 13. अन्तर्व्यथा (यन्त्रस्थ) स्वानुभूत हिन्दी कविताओं का अनुपम संग्रह. 14. हिमाचल संस्कृत दर्पण (यन्त्रस्थ): हिमाचल प्रदेश में संस्कृत भाषा की गति व स्थिति पर आधारित शोध ग्रन्थ का संपादन।
भूमिका
भारतीय लोकु, चिंतन में गम कथा' आस्था और प्रेम' का हेतु है। राम लोकरक्षक हैं। राम-उस में निर्मान्जत होकर जीवन निःकलुषित हो जाता है। राम कथा के पुनि पुनि पारायण- ब्रवण से तुष्टि मिलती हैं और तृषा बढ़ती हैं। यही कारण है आदिकवि वाल्मीकि से लेकर आज तक विविध विधाओं में राम से जुड़ी कथाओं के आश्रय में साहित्य फला- फूला है। गम वे हैं जिनमें रमण किया जाता है। अन्तस् के रमण की छटा जब वैखरी के परिधान में शोभित होती है, तो ये अभिव्यक्ति ही कविता कहलाती है। वाल्मीकि रामायण और गोस्वामी तुलसीदास विरचित रामचरितमानस के विविध कथा प्रसंगों का हर कालखण्ड में किसी सहदय के आश्रय में दुर्व प्रणयन होता है तो व्यष्टिचैतन्य के भावों में मंश्लिष्ट होकर कविता नवीन लगती है, गम अतीत की आस्था मात्र नहीं, अपितु वर्तमान बन जाते हैं। राम लोक-संस्कृक्ति में रचे बसे हैं। राम जन-जन के मन में बिवरते हैं। राम जान ही नहीं प्रेम का विषय हैं, तभी तुलसीदास जी लिखते हैं कि 'रामहि केवल प्रेम पिआरा।' राम-प्रेम एक तरह की निर्भरा भक्ति है। प्रस्तुत काव्य-संग्रह राम-कथा के विविध रूप, सृष्टि के चमत्कृत करने वाले वैविध्य में किञ्चित् भी न्यून नहीं हैं। तन्त्वतः राम निर्विकार निराकार परंब्रहम हैं, जिनसे यह संसार मृजित है, तभी तुलसीदास जी ने लिखा है-जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। राम-माहात्म्य यद्यपि अवचनीय है, मानव सामध्यं से परे का विषय है। तथापि कोई भी मनुष्य राम के जीवन के किसी भी अंश को अपनी भावनाओं में उतारने के उपक्रम कर सकता है। राम परंब्रहम का सहजप्राप्य रूप हैं, जिन्हें विशिष्टाद्वैत के मर्म में समझा जा सकता है।
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