पुस्तक परिचय
डॉ० प्रभु नारायण विद्यार्थी एक साथ कई विधाओं पर कार्य करने वाले लेखक और शोधी विद्वान हैं। उन्होंने हिन्दी जगत में कथाकार, कवि, जीवनी लेखक एवं व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान बनाई है। वे राहुल साहित्य के गम्भीर अध्येता और लेखक हैं। आदिम जनजाति बिरहोर पर वर्षों उनके जीवन से जुड़कर शोध कार्य किया है। प्राचीन भारत के इतिहास और भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के विशिष्ट अध्येता और गवेषक हैं। आजीवन क्षेत्रीय इतिहास पर अनुसंधान कर, कई पुस्तकें प्रकाशित करवाई है। कई विशिष्ट पुस्तकों के सम्पादक डॉ० विद्यार्थी की दर्जनों प्रकाशनाधीन रचनाएँ उनके विपुल रचनात्मक प्रवृति के द्योतक हैं।
'स्मृतियों में प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था' प्राचीन भारत के आर्थिक अध्ययन पर केन्द्रित एक विरल कृति है ।
स्मृतियाँ प्राचीन काल से भारतीय जन-जीवन का अपरिहार्य अंग बनकर रही हैं। प्रच्छन्नतः इनके विचार भारतीय समाज में अद्यावधि परिव्याप्त हैं। भारतीय आर्थिक चिन्तन-संदर्भ में स्मृतियाँ हमारी मार्गदर्शिका रही हैं। अब तक इसका धार्मिक, सामाजिक एवं नैतिक पक्ष का अध्ययन होता आया है, इसका आर्थिक मूल्यांकन उपेक्षित रहा है।
डॉ० विद्यार्थी ने पहली बार स्मृतियों में अर्थशास्त्र के भूमि, राजस्व, उद्योग, व्यापार, ऋण, मुद्रा, श्रम तथा अर्थदण्ड विषयक अनुसंधान कर यह कृति प्रस्तुत की है। आज हम समाजशास्त्र तथा अर्थ चिन्तन स्रोत की तलाश पाश्चात्य विचारकों की कृतियों में करते हैं। सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, एडम स्मिथ, मार्शल, मार्क्स एवं केन्स के बिना अर्थ चिन्तन की कल्पना नहीं कर सकते, जबकि वेद, स्मृति, पुराण एवं अन्य प्राचीन ग्रंथों में अर्थ चिन्तन
लेखक परिचय
जन्म- २२ अप्रैल, १९४४ ई० जन्म-स्थान - ग्राम-अलीगंज, जिला जमुई (बिहार) स्थायी पता: बी/१४०, हरमू हाउसिंग कॉलनी, राँची-१२ (झारखण्ड) शिक्षा- अध्ययन: एम.ए., बी.एल., पीएच.डी. : संगीत प्रभाकर (प्रयाग), अदीबे कामिल (अलीगढ़), ट्रेनिंग फॉर ट्रेनर एण्ड ट्रेनिंग मैनेजमेंट (इंग्लैंड) सम्प्रति: बिहार प्रशासनिक सेवा के वरीय पदाधिकारी संयुक्त सचिव, झारखंड, राँची के पद पर पदस्थापित । शोध कार्य: "स्मृतियों में प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था" शोध प्रबंध पर राँची विश्वविद्यालय से पीएच.डी. प्राप्त । 'आदिम जनजाति बिरहोर के विकास की चुनौतियाँ' विषय पर विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग से डी. लिट. हेतु शोधरत ।
प्राक्कथन
वैदिक वाङ्मय भारतीय चिन्तन धारा का आदि स्त्रोत है। इसमें भारत के सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं आर्थिक नियमन के ऐतिहासिक मूलतत्व समग्रतः सूत्र स्वरूप विद्यमान हैं। इसकी चिंतनधारा कभी भी गतिहीन एवं रूद्ध नहीं रही, प्रत्युत देश, काल एवं परिस्थितिजन्य आवश्यकताओं के अनुरूप परिवर्तनीय बनी रही। इसकी इसी विशेषता ने इसे अविच्छिन्न स्थानित्व प्रदान किया। चिन्तन की यह मन्दाकिनी परम्परा से समर्थित सूत्र - साहित्य, बौद्ध जैन दर्शन, कौटिलीय अर्थशास्त्र, रामायाण, महाभारत इत्यादि प्राचीन ग्रन्थों से संस्पर्शित निःसृत स्मृतिसागर में समाहित हो गई । इसकी ऊर्मिमयों पुराणों, तत्कालीन संस्कृत ग्रन्थों, कामन्दीकीय नीति सार, ख्यात - अख्यात स्मृतियों, स्मृतियों के भाष्य, एवं उनके निबन्धों में भी प्रतिबिम्बित हैं और इसकी प्रतिच्छाया समग्र समाज में परिव्याप्त हैं। स्मृतियों में मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, विष्णु स्मृति, नारद स्मृति, वृहस्पति स्मृति और पराशर स्मृत्ति प्रमुख है। इसके अतिरिक्त दर्जनों की संख्या में यथा शंख स्मृति, देवल स्मृति, यम स्मृति इत्यादि उपस्मृतियाँ हैं। इतिहासकारों एवं चिन्तकों ने गुनस्मृति को आदि स्मृति निर्विवादत्तः माना है। मनुस्मृति का संकलन सम्पादन शुंग काल में प्रारम्भ माना गया है। इस प्रकार दूसरी शदी ईसा पूर्व से मनुस्मृति की रचना मानी गई है। याज्ञवल्क्य, विष्णु, नारद और वृहस्पत्ति स्मृतियाँ प्रथम ईसवी से पाँचवीं सदी की रचना हैं। शेष स्मृतियाँ 6ठी से दसवीं सदी की रचित हैं।
भूमिका
प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध 'स्मृतियों में प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था स्मृतियों में उपलब्ध आर्थिक चिन्तन पर केन्द्रित है। स्मृतियाँ भारतीय समाज एवं जीवनधारा की आधारशिला रही हैं। इनका मात्र धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अनुशीलन एकांगी है। इनमें राजनयिक और अर्थ चिन्तन के मूल तत्त्व समृद्धतः विद्यमान हैं, जो अपेक्षाकृत उपेक्षित एवं अदृष्ट रहे हैं। यहाँ इन्हें श्रम - नियोजन, सम्पत्ति, भूमि व्यवस्था, राजस्व एवं अन्य कर, श्रम एवं पारिश्रमिक, बाजार एवं मूल्य नियंत्रण, उद्योग एवं व्यापार, ऋण, मुद्रा प्रणाली एवं अर्थ-दण्ड जैसे आर्थिक सन्दर्भों में अवलोकन किया गया है।
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