प्रस्तावना
तुशिता महायान ध्यान केंद्र की स्थापना स्व. लामा येशे तथा आदरणीय लामा झोपे रिनपोचे, जो वर्तमान में उसके आध्यात्मिक निदेशक हैं, ने की थी। सन् 1950 के दशक में तिब्बत पर आई त्रासदी और कई निर्वासित तिब्बतियों के भारत व अन्य स्थानों पर बस जाने के बाद तिब्बती बौद्ध धर्म की सभी धाराओं, जो अपनी आध्यात्मिक धरोहरों को सुरक्षित रखने हेतु प्रयासरत हैं, के लिए हमारे महागुरु परमपावन दलाई लामा प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। लामा येशे के अनुसार, दिल्ली के 'तुशिता केंद्र' की स्थापना के पीछे जहाँ एक तरफ तिब्बतियों के प्रति दरशाई गई उदारता और सहयोग के लिए भारतवासियों के प्रति कृतज्ञता रही है वहीं दूसरी तरफ भगवान् बुद्ध एवं अन्य महान् आत्माओं की पुण्यभूमि को नमन करने की पवित्र भावना रही है।
तुशिता की यह पच्चीसवीं वर्षगाँठ है। तुशिता प्रतिवर्ष धर्मोत्सव के अवसर पर प्रवचन आयोजित करता है, जिसमें परमपावन दलाई लामा बौद्ध धर्म पर व्याख्यान देते हैं। यही स्व. लामा येशे का स्वप्न था। पिछले पच्चीस वर्षों में ऐसे सत्रह धर्मोत्सव आयोजित हुए हैं।
यह पुस्तक धर्मोत्सव प्रवचनों के संकलन 'रूपांतरित मन' की अगली कड़ी है। 'चार महान् सत्य' नामक व्याख्यान, जो संभवतः '80 के दशक के किसी आरंभिक वर्ष में दिया गया था, को छोड़कर इसमें सम्मिलित सभी व्याख्यान वर्ष 1999 और बाद के हैं। 'बौद्ध मत में चार सूत्र', 'छह पूर्णताओं के माध्यम से स्व-विकास', 'नकारात्मक भावनाओं पर विजय पाना' और 'समचित्तता का विकास' आदि सब निर्वाण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
परमपावन ने अपने व्याख्यानों में, भगवान् बुद्ध ने 2500 वर्ष पूर्व जो सिखाया था, उसे अधिक सुगम और प्रभावी बनाने के लिए आधुनिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया है। विषय के विश्लेषण और व्याख्या पर अधिक जोर दिया गया है, क्योंकि बौद्ध धर्म के अनुयायी उसे आज के बुद्धि और विश्लेषण-प्रधान युग के अनुकूल पाते हैं। परमपावन धर्म को युद्ध, शांति, राजनीति, विकास, यौन, नीतिशास्त्र, मीडिया और पारिवारिक जीवन से भी जोड़ते हैं। यह पुस्तक मुख्यतः उन पाठकों के लिए है, जो धार्मिक अनुष्ठानों से परे धर्म के वैज्ञानिक और दार्शनिक पहलुओं में अधिक रुचि रखते हैं। परमपावन भगवान् बुद्ध के वचनों को ही विस्तार देते हैं तथा अंतर्धर्मीय संवाद के महत्त्व को रेखांकित करते हैं। आज के अशांत युग में जनसाधारण को भौतिक सुखों के पीछे भागने और अपूरणीय इच्छाओं की मरीचिका में भटकने की बजाय अपनी आंतरिक शक्तियों के विकास और दायित्व बोध की अधिक आवश्यकता है।
आज मनुष्य ने जहाँ एक ओर समुद्र की गहराई और आकाश की ऊँचाई को माप लिया है, वहीं दूसरी ओर पृथ्वी से दूर अनंत अंतरिक्ष में अपना कदम रखा है, बुद्धिमत्ता का निवास, हमारा मनोलोक अब भी रहस्यमय और अबूझ है। लेकिन 2500 वर्ष पूर्व बुद्ध शाक्य मुनि ने ध्यान के माध्यम से मन के सारतत्त्व को अनुभव किया था। उन्होंने आग्रह किया है कि हम अपने अंतस में विराजमान प्रकाश-पुंज को पहचानें तथा अज्ञानता से बचते हुए सर्वग्राही बुद्धिमत्ता तथा संवेदना का विकास करें।
Hindu (हिंदू धर्म) (14094)
Tantra (तन्त्र) (1052)
Vedas (वेद) (732)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2142)
Chaukhamba | चौखंबा (3457)
Jyotish (ज्योतिष) (1637)
Yoga (योग) (1213)
Ramayana (रामायण) (1311)
Gita Press (गीता प्रेस) (714)
Sahitya (साहित्य) (25525)
History (इतिहास) (9432)
Philosophy (दर्शन) (3737)
Santvani (सन्त वाणी) (2600)
Vedanta (वेदांत) (120)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist