आसमान में घटित होने वाली घटनाएं आज भी हमें आश्चर्य और कौतुहल से भर देती है। आदिम मनुष्यों के द्वारा भी इन घटनाओं जैसे-दिन-रात का होना, सूर्य और चन्द्रमा की रोशनी, सूर्य का उदय और अस्त होना, चन्द्रमा का अपने स्वरूप में परिवर्तन, सूर्य व चन्द्र ग्रहण, ऋतुओं में परिवर्तन इत्यादि घटनाओं का कितने कौतुहल व आश्चर्य से अवलोकन किया गया होगा। इसकी कल्पना करना सहज है। एक समय ऐसा भी रहा होगा, जब इस ज्ञान की परिधि में विस्तार हुआ होगा और इस ज्ञान का साधारण ज्ञान की सीमा से ऊपर उठकर, राज्यों के प्रश्रय में, प्राचीन ज्ञान एवं विज्ञान कि परिधि में पदार्पण हुआ होगा। खगोल विज्ञान भी एक विषय के रूप में विकसित होने से पूर्व रहस्य, निरीक्षण, धार्मिक चिंतन, नक्षत्र गणना, वैज्ञानिक खोज, गणना के लिए उचित यंत्रों के आविष्कार जैसी अवस्थाओं से भी गुजरा होगा। आकाश की ओर दृष्टि डालते ही मानव मस्तिष्क में उत्कण्ठा उत्पन्न होती है कि ये ग्रह-नक्षत्र क्या है? तारे क्यों टूटकर गिरते है? पुच्छल तारे क्या है? और ये कुछ दिनों में क्यों विलीन हो जाते हैं? सूर्य प्रतिदिन पूर्व दिशा में ही क्यों उदित होता है? आदि। मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है जो कौतुहल से भरा होता है। वह केवल प्रत्यक्ष बातों को ही जानकर सन्तुष्ट नहीं होता, बल्कि जिन बातों से प्रत्यक्ष लाभ होने की सम्भावना नहीं है, उनको भी जानने के लिए उत्सुक रहता है। जिस बात को जानने की मानव को उत्कट इच्छा रहती है उसके अवगत हो जाने पर उसे जो आनन्द मिलता है, जो तृप्ति होती है, उसी प्रवृत्ति से वह मानव कहलाता है।' आदिम मानव ने आकाश की प्रयोगशाला में सामने आने वाले ग्रह, नक्षत्र और तारों का अपने कुशल चक्षुओं द्वारा पर्यवेक्षण करना प्रारंभकिया और अनेक रहस्यों का पता लगाया। कालांतर में उसने भोज्य पदार्थों, पशुओं और उनकी गतिविधियों को ऋतुओं द्वारा नियंत्रित होते देखा। इससे खगोलीय घटनाओं एवं ऋतुओं के बारें में उसका कौतुहल बढ़ा। परंतु आश्चर्य की बात है कि तब से अब तक विश्व की रहस्मयी प्रवृत्ति के उद्घाटन करने का प्रयत्न करने पर भी यह और उलझता जा रहा है। नित्य नये रहस्योद्घाटन ने इस क्षेत्र में प्रबुद्ध जनों के आकर्षण को तो बढ़ाया ही है। आमजन भी इस आकर्षण के मोहपाश से स्वयं को दूर नहीं कर पाते है। प्रश्न अगर यह हो कि वर्तमान समय में हमें खगोल विज्ञान के सम्बन्ध में कितनी जानकारी उपलब्ध है? तो निःसंदेह इसका उत्तर देने में हम अवश्य सक्षम है। क्योंकि सूचना क्रांति के जिस वैज्ञानिक युग में हम रह रहे है, विविध स्त्रोतों से प्राप्त सूचनाओं द्वारा लाभान्वित है। इस बात की कल्पना करना सहज है कि प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों द्वारा केवल अवलोकन के आधार पर जिन खगोलीय तथ्यों का प्रतिपादन किया गया। वह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। निःसंदेह वर्तमान खगोलीय गणनाओं और सिद्धांतों के सापेक्ष वे गणनाएं और सिद्धान्त पूर्ण परिष्कृत रूप में नहीं थें, लेकिन कालान्तर में आर्यभट जैसे महान् खगोलविद् द्वारा ज्ञान से संबंधित जिन तथ्यों की स्थापना की गयी उसे नकारा नहीं जा सकता है। इस प्रकार इस बात पर हमें अवश्य अभिमान हो सकता है कि प्राचीन काल में हम एक जटिल विज्ञान से संबंधित विद्या में पारंगत थे।
प्राचीन भारत में खगोलीय ज्ञान की परंपरा अत्यंत विस्तृत एवं समृद्ध थी। प्रस्तुत पुस्तक 'प्राचीन भारत में खगोल विज्ञान' की परिसीमा खगोलविद् ब्रह्मगुप्त तक ही प्राप्त खगोलीय ज्ञान तक परिसीमित है। प्राचीन भारत में खगोल विज्ञान का सम्बन्ध ज्योतिषशास्त्र के सैद्धांतिक पक्ष से जुड़ा था जिसके अंतर्गत ग्रहों एवं अन्य आकाशीय पिण्डो की स्थिति का अध्ययन किया जाता है किन्तु इसमें इस तथ्य का अध्ययन नहीं किया जाता है कि ये आकाशीय पिंड किस प्रकार हम पर एवं संपूर्ण समाज पर प्रभाव डालते है अर्थात् ये किस प्रकार हमारे हितैषी होते है और अगर नहीं है तो किस प्रकार बताये जा सकते है। इन तथ्यों का अध्ययन ज्योतिष शास्त्र के व्यवहारिक पक्ष (फलित ज्योतिष) के अंतर्गत किया जाता है। इस प्रकार खगोल विज्ञान जहां एक तरफ ज्योतिषशास्त्र के सैद्धांतिक पक्ष से जुड़ा है तो वही दूसरी तरफ इसके व्यवहारिक पक्ष से भी जुड़ा है। प्रस्तुत पुस्तक में दोनों पक्षों को समावेशित करते हुए इस विषय की उपयोगिता को समझने का प्रयास किया गया है।
लेखिका के बारे में प्रस्तुत पुस्तक डॉ. प्रियंका गुप्ता के शोध कार्य का ही प्रकाशित रूप है। लेखिका वर्तमान समय में एस. एस. खन्ना महिला महाविद्यालय, प्रयागराज के प्राचीन इतिहास विभाग में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत है। उन्होंने अपनी डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी की उपाधि इतिहास विषय में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राप्त की है।
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