पुस्तक परिचय
अखिल भारतीय सन्तमत सत्संग' एक आध्यात्मिक संस्थान है। इसकी स्थापना परम सन्त महात्मा श्री यशपाल जी महाराज ने अगस्त 1969 में की। आनन्दयोग द्वारा सभी मनुष्यों का आध्यात्मिक व मानसिक उत्थान करना इस संस्था का उद्देश्य है।आनन्दयोग महर्षि अष्टावक्रजी के समय से चली आ रही प्राचीन ब्रह्मविद्या है। हमारी परंपरा के सत्गुरुओं ने कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, राजयोग व सहजयोग का समन्वय करके गृहस्थधर्म के अनुकूल ऐसी सार्वभौमिक साधना पद्धति का विकास किया जिसे सभी धर्मों के अनुयायी सहजता से अपनाकर अपना जीवन आनन्दमय बना सकते हैं। सन्तों की एक लम्बी श्रृंखला रही है जिसमें 19 वीं सदी में मौलाना फज़ल अहमद खाँ साहिब कुद्दूसरूह व उनके भाई मौलाना अब्दुल गनी खाँ साहिब कुद्दूसरूह तथा परम सन्त महात्मा रामचन्द्र जी महाराज रहे। परम सन्त श्री रामचन्द्र जी महाराज ने इस ब्रह्म विद्या को हिन्दुओं में भी प्रस्थापित किया। इस सिलसिले के सत्गुरुओं महात्मा श्री रघुवर दयाल जी महाराज, महात्मा श्री बृजमोहन लाल जी महाराज, महात्मा श्री यशपाल जी महाराज, महात्मा श्रीमती रूपवती देवी जी ने इस विद्या द्वारा मानवता की निष्काम सेवा की। परम सन्त महात्मा श्री सुरेश जी महाराज आनन्द योग की क्रियात्मक साधना कराते हुए मानवता की सेवा में अहर्निश संलग्न हैं।प्राणी मात्र की सेवा इस संस्था का लक्ष्य है। निश्छल प्रेम व निष्काम सेवा ही आध्यात्मिक उन्नति का मूल है।
लेखक परिचय
बीसवीं सदी के महान् सन्तों में प्रतिष्ठित महात्मा श्री यशपाल जी महाराज का जन्म 5 दिसम्बर 1918 को बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। आपको अपने आर्यसमाजी पिता श्री सोहनलाल जी व सनातनी माता श्रीमती भगवती देवी के धार्मिक संस्कार स्वतः जन्मजात ही प्राप्त हो गये। बुलन्दशहर व इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर, आप पी० एण्ड टी० डिपार्टमेंट में कार्यरत हुये और उत्तरोत्तर पदोन्नति करते हुए डाइरेक्टर, टेली कम्युनिकेशन रिसर्च सेन्टर, नई दिल्ली के पद से सेवानिवृत्त हुए। आपको फेलो आई०ई०टी०ई० से भी सम्मानित किया गया। आप महात्मा श्री बृजमोहन लाल जी महाराज द्वारा दीक्षित होकर महर्षि अष्टावक्र प्रदत्त इतिमार्ग पर आधारित ब्रह्म-विद्या (आधुनिक काल में 'आनन्द-योग' के नाम से विदित) की महान् गौरवशाली गृहस्थ सन्त परम्परा के प्रतिनिधि सन्त हुए। आपने आनन्द योग से सम्बन्धित मौलिक साहित्य का सृजन व संकलन किया तथा आनन्द-योग के क्रियात्मक पक्ष का लाभ जन-जन तक सुलभ कराने हेतु अगस्त 1969 में अखिल भारतीय सन्तमत सत्संग की स्थापना की जिसका आश्रम अनंगपुर, फरीदाबाद (हरियाणा) में है। आप स्वयं कष्ट उठाकर भी अपनी मासिक आय वेतन और पेंशन में से उपयुक्त सहयोग धनराशि सत्संग को दिया करते थे। आनन्द योग की पद्धति का सम्पूर्ण भारत अर्थात् उत्तर में जम्मू व हिमाचल प्रदेश से लेकर दक्षिण में केरल व कन्या कुमारी तक, तथा पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में आसाम आदि सभी प्रान्तों में प्रचार-प्रसार कर आपने अनेक आनन्द योग साधना सत्संग केन्द्रों की स्थापना की।
अपनी बात
आत्म आहुति का तात्पर्य है तवज्जह यानी सत्गुरुदेव द्वारा शक्तिपात । शक्ति का स्रोत परमात्मा है। जो सन्त परमात्मा के प्रेम में दिन-रात आनन्द -मग्न रहते हैं उनमें यह विशेषता पाई जाती है कि उनके प्रेम भरे दृष्टिपात से साधक की आत्मा पर पड़े मल-विक्षेप दूर होने लगते हैं और आत्मा की सोई शक्ति जागने लगती है और प्रेमी साधक आत्मानन्द का अनुभव करता है। आनन्द योग के सन्त सत्गुरुओं का आदर्श यही रहा है कि जो मानव अपनी मानसिक और आत्मिक निर्बलता के कारण स्वयं अपनी दीन-हीन अवस्था से मुक्ति पाने में असमर्थ हैं उन्हें सहारा दिया जाय और उनकी आन्तरिक शक्ति को जगा कर और उन्हें आन्तरिक साधन का अभ्यासी बना कर उनका उद्धार किया जाय। इन सन्तों ने अपना अहंकार परमात्मा में ऐसा विलीन कर लिया कि संपूर्ण सृष्टि उनके लिये आत्मवत् हो गई। धर्म, जाति, लिंग, नस्ल आदि किसी तरह का भेद-भाव उन्हें छू भी नहीं सकता। हर मानव उनके लिये लख्ते जिगर (अपने हृदय का टुकड़ा) है। सबसे उन्हें निःस्वार्थ अगाध प्रेम है। इस प्रेम में पगे सत्गुरु और साधक किस तरह व्यवहार करते हैं, क्या सोचते हैं, साधक कैसे कमजोरियों पर विजय पाते हैं, कैसे अदृश्य शक्ति आवश्यकता होने पर उनकी रक्षा करती है आदि-आदि बातें देखने, समझने और समझ कर अपनाने का अवसर ये पत्र सुलभ कराते हैं। पूर्ण विश्वास है कि अनुभव ज्ञान के बाद जो साधक विश्वास पूर्वक अध्ययन करेंगे वे प्रेरणा की यथेष्ट सामग्री इसमें उपलब्ध कर सकेंगे। वास्तविक लाभ तो सत्गुरुदेव की आत्म आहुति से ही होगा।
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