लेखक परिचय
श्री श्री 1008 स्वामी साँवरदेवाचार्य महाराज का संक्षिप्त जीवन परिचय: श्री साँवरदेवाचार्य महाराज का जन्म सीकर जिले के ग्राम पनलावा में पिता श्री रत्तीराम जी, माता श्रीमती सुन्दरी देवी के यहाँ 15 जनवरी सन् 1942 को हुआ। आपका बाल्यकाल माता के दुलार व शुभ संस्कार में विकसित हुआ। बाल्यकाल में ही प्रभु-भक्ति की बातें- भगवान के बारे में अधिकाधिक जानने की जिज्ञासा तथा सदैव मननशील प्रवृत्ति के भाव को जानकर माता-पिता ने श्री महामाया शक्ति पीठ नवलगढ़ के पीठाधीश्वर श्री लक्ष्मणदास जी की शरण में लाये। आपका भक्तिभाव देखकर मात्र छह वर्ष की अल्पायु में ही आपको विधिवत निरन्जनी संप्रदाय में दीक्षित कर अपना शिष्य बना लिया। शिक्षा- आपने संस्कृत में शास्त्री-जयपुर दादू महाविद्यालय से तथा साहित्याचार्य एवं आयुर्वेद रत्न की उपाधि हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस से प्राप्त की। आपका आयुर्वेद शास्त्र का ज्ञान विलक्षण है। आप जटिल से जटिल रोगों को भी अपनी प्रतिभाबल व त्यागबल से उपचार करने में सक्षम हैं। आप सदैव मरीजों की सेवा में संलग्न रहते हैं। गरीब व असहाय रोगियों से कुछ नहीं लेते। आपके तेजस्वी व्यक्तित्व और मृदुल व्यवहार से शीघ्र ही आप विख्यात हुए जिसके कारण 28 मई 1985 को निरंजनी संप्रदाय की प्रधान पीठ दयाल आश्रम गाढ़ा धाम, डीडवाना (द्वारापीठ) के आचार्य पद पर आसीन हुए।
पुस्तक परिचय
मेरा पाठकों से अन्तिम निवेदन है यह "आयुर्वेद दिव्य योग चिन्तामणि" आप पाठकों को मैं अर्पित कर रहा है। इसमें प्रायः कर नक्से. बनाने में आसान तथा उपयोग करने में अत्यन्त लाभकारी हैं। चूर्ण, गोली व क्वाथ बनाकर प्रयोग करने से किसी भी प्रकार की हानि की भी सम्भावना नहीं है। रस, धातु, भस्म आदि का प्रयोग करना हो तो किसी योग्य वैद्य से तैयार करवाकर उनकी देखरेख में ही प्रयोग करें। आज विश्व में अनेक प्रकार की असाध्य बीमारियों का दौर चल रहा है। आज का मानव स्वयं इन व्याधियों का जिम्मेदार है क्योंकि प्रत्येक मानव का मन विकृत हो गया है। मन-इन्द्रियों के वश में होकर अशुद्ध आचरण करता है, अहितकर भोजन करता है तथा दिनचर्या का उल्लंघन कर जीवन को दुःखमय बनाकर रोगों को निमंत्रण देता है। इसलिए जिस जीवन शैली से भविष्य अशुभएवं रोगोत्पादक हो ऐसे कर्म नहीं करने चाहिए। अनैतिक आचरण करने वाला, दिव्य आत्माओं द्वारा स्थापित शुद्ध व सत्याचरण को नष्ट करने वाला व्यक्ति जहां निवास करता है, वहाँ का वातावरण ही विषैला हो जाता है। पृथ्वी भी विकार ग्रस्त हो जाती है। हवा-पानी में संक्रमण फैल कर महामारी का प्रकोप उत्पन्न हो जाता है। ऐसी स्थिति में भगवत्स्मरण, आयुर्वेद की दिव्य औषधियों का सेवन तथा हमारी सनातन संस्कृति में लिखित जीवन पद्धति से जीना ही एकमात्र उपाय है। आने वाला समय अति कष्टकर है, अतः यदि जीना चाहते हो तो पाँच-चार सौ वर्ष पहले हमारे पूर्वजों की जीवनशैली में लौट जावो, इसीमें हम सबका कल्याण है। इस पुस्तक प्रकाशन में अनेक प्रकार की कठिनाई सामने आई, जिसमें इसकी टाईप करने में कुछ अशुद्धियाँ रह सकती हैं, जिनका निराकरण करने में श्री नवरतन चायल ने बहुत सहयोग किया है, अतः वह धन्यवाद के पात्र हैं।
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