भूमिका
यह छोटी-सी दिखने वाली पुस्तिका हमारी विस्मृति के समक्ष एक घोषणापत्र है। इस पुस्तिका का उद्देश्य गड़े मुर्दे उखाड़ना नहीं है और ना ही हर मस्जिद में विग्रह खोजना है। यह पुस्तिका तो उन ऐतिहासिक इमारतों की गवाही है जो चीख चीख कर यह बता रही हैं कि कोई हमारी भी सुधि ले लो... किसी उन्मादी के बर्बर आघात खाकर बेसुध पड़ी इन इमारतों और ढांचों में जो अवशेष चिह्न अपनी पहचान बता रहे हैं यह उन्हीं की एक मद्धिम सिसकी है। भारत भर में ऐसे हजारों उदाहरण हैं जहां मंदिरों को ध्वस्त किया गया। कुछ की ऊपरी संरचना बदलकर उन्हें विद्रूप बनाया गया और कुछ को मिसमार या ध्वस्त करके उनके मलबे से एक ऐसी रचना की गई जो जिजिया देने वाली जनता के सीने में कील की तरह चुभती रहे। बंगाल ने भी इस बर्बरता को करीब से देखा है। काशी की ज्ञानवापी भारतीय संदर्भ में इसका शर्मनाक उदाहरण है। उसे ही प्रतिमान मानकर यह पुस्तक या पुस्तिका बंगाल के ध्वस्त या विकृत किए गए आस्था केंद्रों की छोटी सी झलकी है। जिनकी आँखों में शर्म का पानी अभी सूखा नहीं है, जिनकी हिन्दू अस्मिता विस्मृत नहीं हुई उनके लिए यह पुस्तिका एक शस्त्र की तरह है, छोटी किंतु मारक शस्त्र। संघ शताब्दी के क्रम में जब एकता और हिन्दू जागरण के तमाम आयोजन हो रहे हैं ऐसे समय में इस पुस्तिका का महत्व और भी बढ़ जाता है। विद्वत समाज से आग्रह है कि इसके आकार पर इसका मूल्यांकन न किया जाए। इसकी आकारगत लघुता का कारण यह नहीं है कि लेखक विस्तार से लिखने में सक्षम नहीं है अपितु इस बाहरी लघुता का कारण वर्तमान की रील जनरेशन है। वर्तमान पीढ़ी सोशल मीडिया की सेकेंड्स में संतुष्ट होने वाली पीढ़ी है। उसके पास इतना समय नहीं है कि वह एक वृहत शोध का अध्ययन करे। यही कारण है कि यह पुस्तिका वर्तमान की युवा पीढ़ी को ध्यान में रखकर लिखी गई है। हमारे जागरण या भारतबोध का भविष्य वर्तमान युवाओं पर ही है क्योंकि भविष्य उनके सम्मुख है। यह पुस्तिका इतनी ही बड़ी है कि कोई अपनी यात्रा के क्रम में गंतव्य तक पहुँचने से पहले ही इसे पूरा पढ़ सकता है। तथ्यात्मक विवरण के साथ यह पुस्तिका उन संदर्भों को भी उद्धृत करती है जिसे हमारे आदरणीय विचारकों ने समय समय पर व्यक्त किया है। जैसा पहले ही कहा है कि इस प्रयास का उद्देश्य किसी के प्रति घृणा का कदापि नहीं है बल्कि यह लघु प्रयास तो केवल इसलिए ही है कि भविष्य में सनद रहे कि हमारे पूर्वजों, हमारे आस्था केंद्रों ने कितना क्रूर ध्वंस झेला है। यदि सुधि पाठक वर्ग इस प्रयास से सहमत होंगे, उनके भीतर लेश मात्र भी कुछ परिवर्तन होगा तो यही इस पुस्तिका और प्रयास की सार्थकता होगी। एक लघु पुस्तिका की भूमिका भी इस मर्यादा के अनुकूल ही होनी चाहिए अतः पाठकों को समर्पित करते हुए इति करता हूँ।
पुस्तक परिचय
एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में दायित्व निर्वाह करते हुए बंगाल का यह पहलू सामने आया। जिन इमारतों को आज वहाँ पर्यटन स्थल के रूप में देखा जाता है उनका वास्तविक स्वरूप क्या है? यह समझने, जानने की जिज्ञासा हुई। इस जिज्ञासा के क्रम में ही ज्ञात हुआ कि हिंदू संहति नामक संगठन ने इस विषय पर गंभीर शोध किया है। हिंद संहति ने इन ऐतिहासिक भवनों का हिन्दू इतिहास बताया है और उनके चित्रों को संकलित करके एक कैलेंडर का रूप दिया है। उस कैलेंडर को देखते हुए यह विचार मन में आया कि यह इतिहास सभी हिंदुओं को ज्ञात होना चाहिए... यह पुस्तिका उस एक विचार का ही प्रतिफल है। यह पुस्तिका हमारी आत्मविस्मृति के समक्ष एक लघु दर्पण है। यह दर्पण इस भाव के साथ समाज को समर्पित है
लेखक परिचय
डॉ. अम्बा शंकर बाजपेयी ने भारत के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से M.A. अंतराष्ट्रीय राजनीति (अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध), M.Phil. व Ph.D. (मास्टर ऑफ फिलॉसफी व डॉक्टर ऑफ फिलोसोफी) सेंट्रल एशियन स्टडीज से किया है, जे.एन.यू में अध्ययन व शोध के दौरान विद्यार्थी राजनीति में सक्रीय भागीदारी रही है। छात्र राजनीति में 2001 से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् में सक्रीय भागीदारी रही है। 2002/03 में ABVP से JNUSU में SIS कौंसिलर का चुनाव लड़ने के बाद से छात्र राजनीति सक्रीय रहे। इसी सक्रियता ने संगठन में 2009 से 2013 तक ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्) में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में JNU विभाग संगटन मंत्री के दायित्व का निर्वहन किया। 2016 में लेखक ने अपना शोध कार्य पूरा (पीएचडी) कार्य पूरा किया। शिक्षा क्षेत्र में कार्य करने वाले संगठन "भारतीय शिक्षण मंडल" में 2017 से 2022 तक दक्षिणबंग प्रान्त संगठन मंत्री, केंद्र कोलकाता व 2022 से 2023 तक केरल प्रान्त संगठन मंत्री, भारतीय शिक्षण मंडल के दायित्यों का सफल निर्वहन किया है।
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