पुस्तक परिचय
हिन्दी के मध्यकालीन भक्ति साहित्य को सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन के रूप में देखा जाता है। भक्ति आन्दोलन न केवल तत्कालीन सामन्तवाद पर चोट करता है अपितु सामाजिक रूप से नई शक्तियों के उदय की ओर भी संकेत करता है। कबीर, रविदास, दादू, पीपा, रज्जब जैसे संत कवियों ने न केवल सामाजिक जड़ता को तोड़ने का प्रयास किया अपितु हिन्दू-मुस्लिम एकता को भी सुदृढ़ किया। इस मामले में संत साहित्य जहाँ एक ओर जातियों, वर्णों एवं वर्गों में बटे हुए मनुष्य की एकता के लिए संघर्ष का शंखनाद करता है वहीं सदियों से त्रसित जनता में विश्वास भी पैदा करता है। यह साहित्य ऊँच-नीच की अभेद दीवार को ध्वस्त कर 'जात-पात पूछे न कोई, हरि को भजे सो हरि का होई' का कायल है। संतों ने अभेद की दीवार को ध्वस्त कर कर्मकाण्डों एवं अंधविश्वासों पर गहरी चोट की। अतः भक्तिकालीन संत साहित्य को सामाजिक पुनर्जागरण एवं आधुनिक चेतना के बीजवपन का साहित्य कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। डॉ. बंशीलाल जी ने 'भक्तिकालीन संत एवं सामाजिक चेतना विविध आयाम' विषयक इस पुस्तक का सम्पादन कर अति सराहनीय कार्य किया है। इस पुस्तक में प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी (सागर), प्रो. करुणा शंकर उपाध्याय (मुंबई), डॉ. दलपत सिंह राजपुरोहित (अमेरिका), डॉ. विभा ठाकुर (दिल्ली) जैसे चर्चित विद्वानों के लेख भी हैं, जिससे पुस्तक वैचारिक रूप से समृद्ध हुई है।
लेखक परिचय
डॉ. बंशीलाल जन्म तिथि : 12 दिसम्बर 1986 शिक्षा : एम.ए., नेट-जेआरएफ़, पीएच.डी. (हिन्दी) प्रकाशित पुस्तक : रामानंदी द्वादश शिष्यों की प्रामाणिकता संत पीपाजी विशेष सहभागिता : 32 राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में, 25 ऑनलाइन एवं वेबिनार संगोष्ठियों में सहभागिता एवं पत्रवाचन। प्रकाशन : विभिन्न राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में शोध आलेखों का प्रकाशन। हिंदी एवं राजस्थानी भाषा, संस्कृति, साहित्य अकादमी की पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन। सम्प्रति : सहायक आचार्य (हिंदी विभाग), राजकीय महाविद्यालय - शिवगंज, जिला-सिरोही (राजस्थान)
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