पुरोवाक्
'शास्त्रचूड़ामणि-विद्वान्'- केन्द्रिय संस्कृत विश्वविद्यालय जनकपुरी, नव दिल्ली द्वारा संस्तुतः ।
भारतीयदर्शन परम्परा में माधवाचार्य का योगदान 'सर्वदर्शनस्ग्रह' के रूप में दार्शनिकों द्वारा प्रशस्य माना जाता है। इन्होंने इस ग्रन्थ में सभी प्राचीन भारतीय दार्शनिकों का मन्तव्य स्पष्टतः उद्घाटित किया है। अतः एक दार्शनिक रुचि वाले पाठक को इस ग्रन्थ को पढ़ लेने से सभी प्राच्य दर्शन-सिद्धान्तों का स्वारस्य समझ में आ जाता है। परन्तु ग्रन्थ आकार में काफी बड़ा है। इसलिए पाठकों के लिए सुकर नहीं है।
विदित ही है कि तत्त्वज्ञान भारतीय प्राचीन सभ्यता और धर्म का मूलाधार माना जाता है। सभी भारतीय मनीषियों को इस तत्त्वज्ञान से परिचित होना स्वयं को समझना जैसा है। अतः इसका पठन पाठन भी अनिवार्य अपने आप प्रतीत होता है। इसलिए सर्वदर्शन संग्रह का महत्व है। उपर्युक्त इन्हीं दो तथ्यों को ध्यान में रखकर प्रातः स्मरणीय गुरुजी स्वनामधन्य श्री इन्द्रदत्त उनियाल जी ने भारतीय प्राच्यविद्या के अध्येता संस्कृत के छात्रों के उपकार के लिए 'भारतीय दर्शनलघुमञ्जूषा' नामक ग्रन्थ का परिणयन किया है। यद्यपि ग्रन्थ संस्कृत भाषा में निबद्ध है तथापि सभी संस्कृत और संस्कृतेतर छात्रों की प्रवृत्ति ग्रन्थ में सुकर हो सके इस निमित्त ग्रन्थ की भूमिका हिन्दी में लिखने का गुरु जी प्रदत्त आदेश हुआ है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह उपक्रम किया जा रहा है जो कि मनीषी लेखक गुरुजी को श्रद्धा-सुमन ही समझयेगा। ग्रन्थ के वर्ण्य विषय पर जाने से पूर्व निम्न लिखित कुछ मुख्य विन्दुओं पर सर्वप्रर्थम विचार किया जाना उचित होगा- ऐसा मेरा मानना है। पुरोवाक् दर्शन शब्द का तात्पर्यार्थः पुरोवाक् 'सत्वानुरूपस्य सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ।।पुरोवाक् (गीता-१७.३) तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति की अथवा समाज की अपने-अपने श्रद्धानुरूप व्यक्तित्व के विकास में 'श्रद्धा' तत्त्व अर्थात् भावना मुख्यकारण होती है। उसी के अनुरूप मनुष्य द्वारा आचरण हुआ करता है, स्वयं के आचरण से संस्कृति का विकास अथवा ह्रास देखा गया है। इसी भावना/श्रद्धा को दर्शन की कोटी में समझना चाहिए। इसीलिए व्यक्ति अथवा समाज विभिन्न धर्मों या सम्प्रदायों में विभक्त देखा जा सकता है। अतः सभी के मूल में यही श्रद्धानुरूप 'दर्शन' कारकतत्त्व के रूप में विद्यमान होता है। आगे चलकर यही विद्यानुराग 'दर्शन' अथवा 'फिलोसफी' नाम से ख्यात हो जाता है। धीरे धीरे यही 'दर्शन' मनुष्य जीवन के साथ आचरण में इस प्रकार ओत प्रोतः हो जाया करता है-कि, मनुष्य उसे जाने या न जाने, इस से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वहाँ भावना का प्राधान्य जो हुआ करता है। आगे जाकर यही 'दर्शन' तर्क, आचार, आशा, सौन्दर्य और मनो-विज्ञान जैसे 'शास्त्र' के नाम से अभिहित हो जाता है।
भारतीय दर्शनशास्त्र पर एक विहङ्गम दृष्टिः
मुण्डकोपनिषत् में एक प्रसङ्ग में ऋषि अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को सभी विद्याओं के मूल 'ब्रह्मविद्या' को प्रदान करता है-स ब्रह्मविद्यां सर्व-विद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह (मुण्डकोपनिषत्१/१), क्योंकि भारतीय जनमानस के अनुसर सुचिन्तित आध्यात्मिक तथ्यों पर ही कोई भी धर्म प्रतिष्ठित हो सकता है अन्यथा नहीं। इस दृढ विश्वास के फलस्वरूप ही समस्त विश्व में आज भारतीय उपनिषत् के वर्ण्य विषय मार्गदर्शक का काम करते हैं। इनमें वर्णित तथ्यों को नकारना कोई हिम्मत नहीं कर सकता। ब्रह्मविद्या में सभी विद्याओं का समावेश हो जाता है। भारतीय परम्परा में पूर्वपक्ष उपस्थित कर सिद्धान्त के रूप में उत्तर पक्ष प्रस्तुत करने की परिपाटी रही है। यही कारण है कि सभी विचारको ने अपने-अपने विचार अपनी शिष्यपरम्परा में आगे बढ़ाये; जो बाद में शास्त्र के रूप में उभर कर आये। इसी परम्परा में आगे चलकर सांख्य, योग, मीमांसा जैसे आस्तिक तथा नास्तिक परम्परा वाले दर्शन शास्त्रों का विकास होता चला गया जिनमें भारतीय प्राचीन संस्कृति के बीज निर्बाधगति से पल्लवित तथा पुष्पित होते चले गये। दृष्टान्त के रूप में बृहद् आरण्यकोपनिषत् (२/४) में याज्ञवल्क्य तथा मैत्रेयी संवाद आज भी उतना ही प्रासंङ्गिक है जितना कि आज से कम से कम २५०० वर्ष पूर्व था।
Astrology (123)
Ayurveda (114)
Gita (79)
Hinduism (1466)
History (148)
Language & Literature (1872)
Learn Sanskrit (26)
Mahabharata (45)
Performing Art (72)
Philosophy (473)
Puranas (122)
Ramayana (53)
Sanskrit Grammar (272)
Sanskrit Text Book (32)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist