लेखक परिचय
नृत्य मयूरी एवं सुप्रसिद्ध गुरु डॉ. कनका सुधाकर एक प्रतिष्ठित भरतनाट्यम कलाकार, मार्गदर्शक, कोरियोग्राफर, लेखिका और शोधकर्ता हैं, जो पिछले 4 दशकों से शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में कार्यरत हैं। मानद डॉक्टरेट, राष्ट्रीय स्वामी विवेकानंद पुरस्कार, गुरु सम्मान, अटल श्री सम्मान और भारत एक्सीलेंस जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित डॉ कनका सुधाकर ने स्वय 1000 से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित किया है। चिकित्सा विज्ञान में उनकी गहरी रुचि, उनके अनुभव और विश्लेषणात्मक कौशल के संगम ने ही इस अध्ययन को जन्म दिया है। वह SUNAINA- Society for the Upliftment of National Arts of India की संस्थापक अध्यक्ष हैं, जिसका प्राथमिक उद्देश्य प्रस्तुतियों के माध्यम से कला रूपों को बढ़ावा देना है। महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम के रूप में उन्होंने 1000 से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित किया है, जिनमें से कई आज पेशेवर कोरियोग्राफर, शिक्षक और कलाकार हैं। उन्होंने राष्ट्रीय अखंडता पर आधारित कई प्रस्तुतियाँ तैयार की हैं, जैसे 'कृष्ण गंगा', 'कृष्ण मयी मीरा अंडाल' और 'लीजेंड्स ऑफ ज्योतिर्लिंगम'। भारतीय शास्त्रीय नृत्य के चिकित्सकीय मूल्यों (Therapeutic values) पर उनके शोध कार्य के लिए उन्हें संस्कृति मंत्रालय से फेलोशिप, सीनियर स्कॉलरशिप और कई विशेष मान्यताएँ प्राप्त हुई हैं। वह स्कूलों, कॉलेजों और सांस्कृतिक संगठनों में इस विषय पर जागरुकता बढ़ाने के लिए सेमिनार और कार्यशालाएं आयोजित करती रहती हैं।
पुस्तक परिचय
भारतीय शास्त्रीय नृत्य के अभ्यास से नर्तक के मन और शरीर पर होने वाले आकस्मिक लाभओं पर आधारित यह शोधकार्य सर्वप्रथम वर्ष 1994 में स्टर्लिंग पब्लिशर्स द्वारा अंग्रेजी संस्करण "Indian Classical Dance - Therapeutic Advantages" के रूप में प्रकाशित हुआ। यह कृति गुरु डॉ. कनका सुधाकर द्वारा प्रस्तुत परिकल्पना और सैद्धांतिक विश्लेषण पर आधारित थी। वर्ष 2024 में यह पुस्तक शुभी पब्लिकेशन द्वारा पुनः प्रकाशित की गई, जिसमें शोधकर्ता द्वारा किए गए प्रयोगात्मक परिणामों को आधार बनाया गया है। यह पुस्तक अपने 12 अध्यायों के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय नृत्य के अभ्यास का मांसपेशीय-कंकाल तंत्र, तंत्रिका तंत्र, मस्तिष्क, परिसंचरण एवं श्वसन तंत्र, एक्यूप्रेशर प्रभाव, मनोवैज्ञानिक संबंध तथा योगिक लाभों पर पड़ने वाले प्रभावों का गहन अध्ययन प्रस्तुत करती है। 11वें अध्याय में लेखिका ने लाबान के सिद्धांत के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि इस अत्यंत लाभकारी कला रूप को भारत की शिक्षा प्रणाली में किस प्रकार सम्मिलित किया जा सकता है। पुस्तक में विषय को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करने के लिए व्याख्यात्मक छायाचित्रों, आरेखों और ग्राफों का समावेश किया गया है। चूँकि नृत्य के प्रमुख लाभार्थी युवा वर्ग हैं, अतः पुस्तक में बच्चों के छायाचित्र भी सम्मिलित किए गए हैं।
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