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नैनन में आन-बान- Nainan Mein Aan-Baan (Heritage and Understanding of Indian Classical Music)

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A book that bears testimony to Yatindraji's deep commitment and service to the world of music and will only become more valuable with time. Shankar Mahadev
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Specifications
Publisher: Penguin Random House India Pvt. Ltd.
Author Yatindra Mishra
Language: Hindi
Pages: 195
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 inch
Weight 230 gm
Edition: 2026
ISBN: 9780143481812
HCH440
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Book Description
पुस्तक परिचय
शास्त्रीय और लोक संगीत को समावेशी ढंग से समझने के लिए यह किताब एक मार्गदर्शी है। यहाँ परंपरा और नवाचार के मध्य उस महीन फाँक को सहेजने का जतन किया गया है, जो हमारी पारंपरिक प्रदर्शनकारी कलाओं और भारतीय परंपरा के बीच एक सेतु का निर्माण करती है। यह पुस्तक बारह मूर्धन्य शास्त्रीय गायकों के सांगीतिक स्वरूप को समझने का वैचारिक प्रयास है, जिसमें केसरबाई केरकर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ, रसूलनबाई, सिद्धेश्वरी देवी, उस्ताद अमीर खाँ, पंडित भीमसेन जोशी, बेगम अख्तर, पंडित कुमार गंधर्व, गंगूबाई हंगल, गिरिजा देवी, किशोरी अमोनकर और पंडित जसराज शामिल हैं। पुस्तक उस मार्ग पर भी जाती है, जहाँ देसी और मार्गी, शास्त्रीय और लोक से लेकर फिल्म संगीत की ज्यामिति में परंपराएँ साँस लेती हैं। यहाँ अयोध्या की सांगीतिक परंपरा और अवध क्षेत्र से लेकर पुष्टिमार्गीयों का हवेली संगीत और बृजमंडल का सलोना उत्सव, ओडिसी नृत्य और भरतनाट्यम की वैचारिक छवियाँ, बाईयों का ज़माना और उपशास्त्रीय गायन के प्रकारों ठुमरी, टप्पा, चैती, कजरी से लेकर ध्रुपद की विवेचना, रागदारी का शिल्प, सभी कुछ मौजूद हैं। इस किताब में, एक ओर राग मालगूँजी या देव गंधार की पुकार है, तो दूसरी तरफ कर्नाटक शैली में गाए जाने वाले भजन-कृष्णानी बेगने बारो की गूंज सुनाई देती है।

लेखक का परिचय
कलाओं में गहरी रुचि रखने वाले कवि, संपादक और संगीत अध्येता यतीन्द्र मिश्र के अब तक पाँच कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं तथा उनकी शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी, नृत्यांगना सोनल मानसिंह, उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ और फिल्मकार गुलज़ार पर प्रामाणिक जीवनियाँ प्रकाशित हुई हैं। उन्होंने बेगम अख़्तर के जीवन पर पुस्तक अख़्तरी भी संपादित की है। उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 'स्वर्ण कमल', 'मामी फिल्म पुरस्कार', 'आजतक साहित्य जागृति लोकप्रिय लेखक पुरस्कार', 'महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार', 'उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार', 'कलिंग बुक अवॉर्ड', 'अंतरराष्ट्रीय वातायन कविता सम्मान', 'भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार' तथा अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं। वे उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार की निर्णायक समिति के सदस्य, 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की फीचर फिल्म श्रेणी में सेंट्रल पैनल के जूरी सदस्य व सर्वश्रेष्ठ सिनेमा लेखन के 69वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जूरी के चेयरमैन रहे हैं। संप्रति वे अयोध्या में कला और साहित्य के उत्सव 'टाइमलेस अयोध्या' के संस्थापक हैं।

अपनी बात
अब मोरी नैया पार करो... पिछले तीस वर्षों में संगीत को लेकर मेरी जो समझ विकसित हुई, उसके तहत कई बार ऐसे मौके आए, जब मैं शास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत के बड़े कलाकारों के संपर्क में न सिर्फ आया, बल्कि उनसे सीखते हुए कुछ किताबें भी लिख सका। इनमें शास्त्रीय संगीत को लेकर मेरी पहली किताब ठुमरी गायिका गिरिजा देवी पर आधारित थी। इसके बाद ओडिसी और भरतनाट्यम नृत्यांगना सोनल मानसिंह से संवाद की देवप्रिया, उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ पर सुर की बारादरी, अयोध्या की संस्कृति और मंदिरों के संगीत-उत्सवों पर अयोध्या की संगीत परंपरा, हिंदी फिल्म संगीत में फिल्म संगीतकारों के योगदान पर हमसफ़र राज़ल गायिका बेगम अख़्तर पर अख़्तरी और महान पार्श्वगायिका लता मंगेशकर की आधिकारिक जीवनी और सांगीतिक यात्रा पर लता : सुर-गाथा जैसी पुस्तकें पिछले पच्चीस सालों में प्रकाशित हुईं। यह कहना चाहिए कि इन पुस्तकों ने समझ के दायरे को विस्तृत करने के साथ संगीत प्रेमी समाज और बौद्धिक जगत में मेरी एक पहचान भी बनाई। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, लगता है कि इसकी नींव में कहीं अयोध्या राजपरिवार के सदस्य के रूप में एक उन्नत सांगीतिक विरासत हासिल हुई, जिसमें मेरी दादी राजकुमारी स्व. विमला देवी, माँ ज्योत्स्रा मिश्र, मंझली बुआ ज्वलन्ती मिश्र एवं छोटी बुआ अपर्णा मिश्र का अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा योगदान रहा।

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