पुस्तक परिचय
छठी सदी ई० पू० में विभिन्न प्रकार के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक परिवर्तनों ने समाज में एक अव्यवस्था फैला दी थी, साथ ही बलि प्रथा ने आर्थिक संसाधनों पर काफी दबाव बढ़ा दिया था। इस बीच लौह तकनीक के उपयोग ने कृषि उत्पादन में अधिशेष को काफी वृद्धि की, जिससे दस्तकारी और व्यापार पर आधारित नगरों का उद्भव हुआ। इस परिवर्तन ने समाज में दो अनुत्पादक वर्ग की स्थिति मजबूत कर दी और उन्हें उत्पादक वर्ग के विरूद्ध संजीदगी से खड़ा कर दिया। राजतंत्रीय राज्यों के उदय से जनजातियों का अस्तित्व खतरे में था और नीच लोभ, निर्मम व्यभिचार, घृणित धनलोलुपता, सार्वजनिक सम्पत्ति की लूट जैसे नये कारक उभर रहे थे। जनजातीय एकात्मकता का अंत, निरंकुश राजतंत्र का उद्भव, हिंसा, लोभ, गिरवी, कर, सूदखोरी जैसी प्रवृतियों और संस्थाओं के अस्तित्व में आने से जन-साधारण दिग्भ्रमित और भयभीत था। ऐसे समय में ऐसी विचार धारा की आवश्यकता थी, जो जनसाधारण को मनोवैज्ञानिक शांति प्रदान कर सके। इस परिस्थिति में बुद्ध की विचारधारा ने रिकता को भरते हुए जनमानस को अहिंसा और शांति का संदेश दिया। इन्हीं कारणों से बौद्ध धर्म की उत्पत्ति हुई।
नगर सेठी और राजघरानों के संरक्षण एवं सहयोग ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। महात्मा बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् बौद्ध धर्म में उभरे मतभेद को सुलझाने हेतु प्रथम बौद्ध-संगीति का राजगृह में आयोजन किया गया। उसी तरह जब-जब विरोध और मतभेद उभरे उन्हें सुलझाने का प्रयास द्वितीय और तृतीय बौद्ध संगीतियों द्वारा दिया गया।
लेखक परिचय
डॉ० (श्रीमती) अनुपमा कुमारी, शैक्षाणिक वातावरण में पली-बढ़ी। प्रारम्भिक शिक्षा सेंट जॉसेफ कन्वेन्ट हाई स्कूल, पटना से, तत्पश्चात् स्नातक तक की पढ़ाई पटना कालेज से एवं स्नाकोत्तर प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना से बी० एड० की पढ़ाई महिला प्रशिक्षण महाविद्यालय पटना वि० वि० से एवं एम० एड० की पढ़ाई, शिक्षा विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना से, Ph. D मगध विश्वविद्यालय, बोधगया से सम्पन्न की। मैट्रिक से एम० ए० और एम० एड० तक विशिष्ट अंको के साथ उत्तीर्ण तथा विशिष्टता (Distinction) की प्राप्ति। इतिहास के प्रतिष्ठित Journals में कई शोध-लेख प्रकाशित। अखिल भारतीय इतिहास काँग्रेस, एशियाटिक सोसाईटी, बिहार की सदस्या। सम्प्रति R.P.S. B.FA. कॉलेज, पटना में गत पाँच वर्षों से कार्यरत।
प्राक्कथन
छठी सदी ई० पू० में बौद्ध धर्म का उद्भव एक महान क्रांतिकारी घटना थी, यद्यपि कि इसके लिए तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों का महत्त्वपूर्ण योगदान था, फिर भी सदियों तक उत्तर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बड़े भूभाग के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को इसने न सिर्फ प्रभावित किया, बल्कि एक नई दिशा दी।
छठी सदी ई० पू० में विभिन्न प्रकार के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक परिवर्तनों ने समाज में एक अव्यवस्था फैला दी थी, साथ ही बलि प्रथा ने आर्थिक संसाधनों पर काफी दबाव बढ़ा दिया था। इस बीच लौह तकनीक के उपयोग ने कृषि-उत्पादन में अधिशेष की काफी वृद्धि की, जिससे दस्तकारी और व्यापार पर आधारित नगरों का उद्भव हुआ। इस परिवर्तन ने समाज में दो अनुत्पादक वर्ग की स्थिति मजबूत कर दी और उन्हें उत्पादक वर्ग के विरूद्ध संजीदगी से खड़ा कर दिया। राजतंत्रीय राज्यों के उदय से जनजातियों का अस्तित्व खतरे में था और नीच-लोभ, निर्मम व्यभिचार, घृणित धनलोलुपता, सार्वजनिक सम्पत्ति की लूट जैसे नये कारक उभर रहे थे। जनजातीय एकात्मकता का अंत, निरंकुश राजतंत्र का उद्भव, हिंसा, लोभ, गिरवी, कर, सूदखोरी जैसी प्रवृतियों और संस्थाओं के अस्तित्व में आने से जन-साधारण दिग्भ्रमित और भयभीत था। ऐसे समय में ऐसी विचार धारा की आवश्यकता थी, जो जनसाधारण को मनोवैज्ञानिक शांति प्रदान कर सके। इस परिस्थिति में बुद्ध की विचारधारा ने रिकता को भरते हुए जनमानस को अहिंसा और शांति का संदेश दिया। इन्हीं संदर्भों को रेखांकित करते हुए मैंने प्रस्तुत पुस्तक की रचना की।
भूमिका
लगभग 2500 वर्ष पूर्व भारत में बौद्ध धर्म का उद्भव एक दर्शन के रूप में हुआ। बौद्ध धर्म के उद्भव का काल गहन चिंतन, आध्यात्मिक उथल-पुथल तथा बौद्धिक विमर्श से परिपूर्ण था। वेदों की नित्यता और पुरोहितों के प्राधिकार को खारिज किया जा रहा था। कुछ लोग तो ईश्वर के अस्तित्व को भी नकार रहे थे। वे सदाचरण को ही कर्म से मुक्ति का एकमात्र मार्ग घोषित कर रहे थे। बलि की भर्त्सना करते हुए वे अहिंसा का पाठ पढ़ा रहे थे। एच. जी. वेल्स के अनुसार, (बुद्ध की) यह शताब्दी सचमुच समस्त इतिहास में सर्वाधिक उल्लेखनीय है। मानव मष्तिस्क सर्वत्र नए साहस का प्रदर्शन कर रहा था। वे राजतंत्र, पुरोहिततंत्र और बलि परंपरा को नकार रहे थे और मर्मभेदी प्रश्न पूछ रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो मानव जाति किशोरावस्था में प्रवेश कर चुकी थी।" पालि ग्रंथों में हमें इस कालखंड के धार्मिक जगत के आंदोलनों का ठोस वित्रण मिलता है, जिसमें अनेक धार्मिक और दार्शनिक संप्रदायों, सन्यासी समुदायों, तपस्वियों और परिव्राजकों ने अपनी-अपनी भूमिका निभाई थी। इस समय प्रचलित नाना प्रकार की धार्मिक आस्थाओं की तस्वीर हमें अंगुत्तर निकाय, महानिदेश तथा चुल्लनिद्देश जैसे बौद्ध ग्रंथों में मिलती है। इनमें से कई दार्शनिक और धार्मिक मत कुछ समय के उपरांत काल कवलित हो गए। परंतु कुछ मत चिरस्थायी हुए और भारतीय धार्मिक चिंतन पर उनका स्थायी प्रभाव पड़ा। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण थे जैन और बौद्ध धर्म, क्योंकि वे दोनों वैदिक परंपरा से अलग रहते हुए शास्त्रविरुद्ध आंदोलन की प्रशाखाओं के रूप में विकसित हुए थे। ये दोनों धर्म दो अलग-अलग चिंतकों की खोज की परिणत्ति थे।
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